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Thursday, May 17, 2012

रेडियो


हरेक माँ-बाप के लिए उनके बच्चे जीनियस पैदा होते है. मेरे से ठीक बड़े भाई बाबा के आँखों के तारे थे. उन्हें विश्वास था की अजय भैया में वे सभी गुण मौजूद थे जो उन्हें एक आई०ए० एस बना सकते थे . और अंततः वैसा कुछ हुआ भी . वे भाई को छत के कोने में छिपा कर पढाते थे और अपने साथ कभी-कभी जलेबी खिलाने बाज़ार ले जाते थे. इस कारण, दादी का दुलरुआ मैं होता जा रहा था. दादी हम सभी को अमर चित्र कथा और राम चरित की मदद से हिंदी पढाती थी. माँ हमलोगों के होमवर्क में मदद करती थी. बाबा का देहांत जनवरी १९५४ में हो गया. इसके बाद इंग्लिश पढाने की जिम्मेदारी पिताजी ने सम्हाल ली. पिताजी “ Spare the rod- spoil the child” पर पूरा विश्वास करते थे.
उसी वर्ष मेरे घर रेडियो का आगमन हुआ. उस समय किसी-किसी घर में ही रेडियो हुआ करता था. His master’s Voice (HMV) का रेडियो सबसे अच्छा माना जाता था. आकाश से रेडियो तरंगे ठीक-ठीक पकड़ने के लिए छत पर १५ फीट ऊँचे बांस के सहारे ३० फीट लंबा एरिअल लगाया गया. और अर्थिंग ! मिटटी के कुल्हड़ में भींगी मिटटी भरकर उसमे अर्थिंग का तार खोसा गया. किसी को क्या मालूम था कि एक ईमानदार मजिस्ट्रेट पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए क्या-क्या कर सकता है ?
अगले दिन सुबह और उसके बाद हर सुबह पिताजी ऊँचे रखे रेडियो के नीचे फर्श पर शेव करने का सामान फैला कर शेव करते थे. उनसे बाईं तरफ दो कदम के फासले पर अजय भैया और मैं बैठते थे. ठीक सुबह आठ बजने के कुछ पल पहले  १० बार पुक-पुक की आवाज़ आती थी. उसके बाद एक रोबदार आवाज़ आती थी, “ This is All India Radio. Here is the news in English read by Melville de-Mellow.”  कभी-कभी सुरजीत सेन भी समाचार पढते.
समाचार खत्म होने के बाद हमलोगों की ताजपोशी शुरू होती थी. पहला सवाल अजय भैया से होता था. समाचार में नेहरु जी के बारे में क्या बोला गया. दूसरा सवाल मुझसे होता था. पंचशील समझौते पर चीन ने क्या कहा. ऐसे ही समाचार से सम्बंधित दो-तीन सवाल जवाब होते थे जिसमे साहित्य और व्याकरण का समिश्रण भी रहता था. पिताजी को आफिस जाने की जल्दी होती थी इसलिए वे छड़ी लेकर ही बैठते थी. जरा सी गलती और दो-तीन दायें-बाएं सपाटा मिलना आम बात थी. उसके बाद हमलोग भी स्कूल जाने की तैयारी में लग जाते. जब कभी पिताजी समाचार सुने बिना जल्दी आफिस जाते तब तो हमलोगों की शामत ही आ जाती थी. समाचार सुनो, एक पन्ने का सारांश लिखो और शाम को चेक कराओ. हम बच्चे His master’s Voice का मतलब समझने लगे थे.
रेडियो दादी के कमरे में रखा गया था. दादी हर रोज सुबह सात बजे से २-३ मिनट पहले रेडियो आन करतीं. सबसे पहले All India Radio (AIR) का सिग्नल बजता . सुबह की शुरुआत भजन से आरम्भ होती . भजन में ठुमक चलत रामचंद्र और सुर की गति मैं क्या जानूउनके प्रिय थे. दोपहर में जब हमलोग स्कूल से लौटते तब फ़िल्मी गानों के साथ दादी झपकी लेते हुए मिलती. हिंदी गानों में उस समय नागिन फिल्म का मन डोलेबहुत सुना जाता था.
शाम को सप्ताह के किसी दिन लोहा सिंह का नाटक आता जिसे हम सभी बड़े चाव से सुनते. यहाँ तक की घर के काम के लिए तैनात दो चपरासी भी दरवाजे के बाहर बैठ जाते. उतना लोकप्रिय कार्यक्रम 90 के दशक में टीवी पर रामायण का प्रसारण ही था. रेडियो से आते कुछ गानों को मेरा छोटा भाई अभय बहुत मगन होकर सुनता था . उसकी उम्र तब तीन साल रही होगी . रेडियो आन करने के क्रम में उसके ऊपर बक्सा ही गिर गया . उसका दाया हाथ काफी दिनों तक सूजा रहा.
मेरी माँ साहित्यरत्न थीं. उनके लेख, कवितायेँ, कहानियाँ और नाटक अख़बारों में छपा करते. इससे एक तो माँ को अपनी प्रतिभा कायम रखने में सहायता मिलती दूसरे जो पारिश्रमिक मिलता उससे घर चलाने में काफी मदद हो जाती. एक मजिस्ट्रेट को 50 के दशक में 300 रुपये मिलते रहे होंगे. उसपर आठ बड़े हो रहे बच्चों का लालन-पोषण . मेरे पिताजी को माँ की ये बातें बिलकुल अच्छी नहीं लगती थी. ऐसा शायद इसलिए कि कहानियों में घर की अंतरंग बातें अनजाने में अपना रंग दिखा जाती थीं. जैसे मेरी छोटी बहन ने किसी हमउम्र को लाल जूती पहने देखा था. इसे माँ ने लिली के जूतेमें बड़े ही मार्मिक तरीके से लिखा था. पिताजी को अपनी बेबसी पर ये घाव पर नमक छिड़कने जैसा लगता.
उसी समय किसी ने माँ को बताया की इस तरह कहानियों और नाटक का रेडियो बहुत अच्छा पारिश्रमिक देती है. माँ की रचनाएँ रेडियो पर तुरत स्वीकार ली गयीं बल्कि माँ को ज्यादा से ज्यादा रचनाएँ देने को कहा गया. ये बातें पिताजी से छिपा कर होती थीं. अतः, रेडियो पर इनका प्रसारण सुनना असंभव सा था. प्रसारण रात के सात-आठ बजे आता था.
पिताजी ज्यादातर उस समय घूमने या अपने दोस्तों के पास जाया करते थे अथवा उनके दोस्त मेरे घर आते थे. अगर पिताजी बाहर गए होते थे तो हम सभी रेडियो घेर के बैठ जाया करते. पराकाष्ठा तब होती जब वे घर पर होते. तब माँ पहले से पड़ोस में रहने वाले जज की श्रीमती (जिन्हें हम मम्मी कह कर बुलाया करते) से तैयारी करवा लेती. समय से पांच मिनट पहले मम्मी की जोरदार आवाज़ आती , “ नीरजा की माँ ! थोड़ी देर के लिए आईये ! लगता है मुझे ज्यादा बुखार हो गया है.माँ , नाना से बहुत से होमेओपैथ इलाज़ सीख रखा था और इसके चलते वह चारों तरफ बहुत मानी जाती थीं.
एक दिन जब ऐसा हुआ और माँ, मम्मी के रेडियो पर प्रसारित अपनी कहानी सुन रही थी  तब पिताजी ने भी रेडियो चालू कर दिया. माँ की कहानी आ रही थी. दादी से लेकर हम सभी को काटो तो खून नहीं वाली हालत हो गई. पिताजी पहले तो कुछ अनमने से और बाद में पूरी तन्मयता से कहानी सुनने लगे. पूरे घर में सन्नाटा था . केवल रेडियो की आवाज़ लाउडस्पीकर से निकलती मालूम पड़ रही थी. तभी पिताजी ने दादी को कहा की रेडियो पर आती कहानी को गौर से सुने.
प्रसारण खत्म होने के कुछ १० मिनट बाद माँ लौटी. पिताजी ने दादी को कहा की जरा अपनी बहू  को बताओ क्या लाज़वाब कहानी आ रही थी रेडियो में . क्या ऐसी सुन्दर कहानी ये नहीं लिख सकती ?
संक्षेप में कहानी इस प्रकार थी. एक गरीब किसान की जमीन ज़मींदार हडप लेता है. कोर्ट-कचहरी से कोई फायदा नहीं हुआ बल्कि उसकी औरत बिलखते बच्चे को छोड़ कर चल बसी. किसान ने ठान लिया की वह अपने बेटे को मजिस्ट्रेट बनाएगा और गरीबों को इन्साफ दिलाएगा. वह खुद भूखा रह जाता पर बेटे पर आंच नहीं आने देता. बेटे को आगे कि पढाई के लिए उसने उसका दाखिला शहर के स्कूल में करा दिया. खुद उसी शहर के दूर कोने के गाँव में एक स्कूल में दरबानी करने लग गया. वह क्या करता है , कैसे रहता है , इसकी ज़रा सी भी भनक बेटे पर नहीं होने दी. किसान को डर था कि अगर बेटे को उसकी माली हालत का पता चला तो वह पढाई छोड़ देगा. आख़िरकार लड़का मजिस्ट्रेट बन ही गया और उसकी नियुक्ति बगल के शहर में हो गयी. कुछ काम की जिम्मेदारी, कुछ नए रोब का मजा, और कुछ नासमझी, बेटे ने एक बार भी घर जाकर पिता की हालत का अंदाजा लगाने का ख्याल नहीं किया . एक साल बीत गए. चुनाव के दौरान  उसकी पोस्टिंग पेट्रोलिंग मजिस्ट्रेट की हुई . मजिस्ट्रेट की जीप दौरे के दरम्यान अपनी रफ़्तार से उसी स्कूल में अंदर आई जहाँ किसान दरबानी करता था. बाप ने बेटे को देख लिया. किसान उलटे पांव स्टेशन की और भागा. वह ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था कि उसके बेटे ने उसे ना देखा हो. अभी ट्रेन आने में दो घंटे की देर थी. तभी मजिस्ट्रेट की गाड़ी स्टेशन पहुँच गयी. बाप-बेटे के ममस्पर्शी मिलन की चर्चा आज भी लोग करते हैं.
तब तो नहीं पर कुछ दिनों बाद जब माँ ने हकीकत बताई तो पिताजी और माँ ने मिलकर एक कहानी लिखी अंतरिक्ष के उस पार” . वे कुछ दिन हम सभी के लिए आनंददायक था.
इसी रेडियो के द्वारा हमारा परिचय क्रिकेट से हुआ. या यों कहें कि इंग्लिश और क्रिकेट सीखने और समझने में रेडियो हमारी टीचर एवं कोच थी. क्रिकेट के खिलाडियों के अलावा एक और शख्शियत से हमारी जान-पहचान हुई. वह थे महाराजकुमार ऑफ विजयनगरम जिन्हें सभी उनके प्यारे नाम विज्जी से जानते थे. पिताजी को उनकी कमेंटरी बहुत अच्छी लगती थी. पर जब छोटे नवाब आफ पटौदी टेस्ट मैच में आने लगे तो वे कमेंटरी को बड़े नवाब के लिविंग रूम में ले जाते थे . मंसूर पटौदी के अब्बुजान से लेकर बेगम साहिबा की चाय परोसने की बारीकियों को बताते-बताते वे क्रिकेट कमेंटरी करना भूल जाते थे. कुछ १०-१५ मिनट बाद बताते," In the meanwhile Manjrekar and Sardesai have returned to the pavilion  and Nadkarni is on the crease. Am I correct, Berry?”
ये रेडियो हमलोगों के साथ १९७९ तक रहा. पूरे पच्चीस साल. ट्रांसिस्टर और इंटीग्रेटेड सर्किट ने बड़े प्यार से वाल्व रेडियो को कबाड़खाने का रास्ता दिखा दिया. अबतक उस रेडियो की रिसायिक्लिंग भी हो गयी होगी . पता नहीं कहीं वह मेरे सामने लैपटाप के अंदर तो नहीं छुपा है; मुझे देख मंद-मंद मुस्कुरा रहा है.

Wednesday, May 16, 2012

बचपन

“It was a childish ignorance,
But now 'tis little joy To know
I'm further off from heaven
Than when I was a boy।”
-Thomas Hood- 

बचपन कि एक खास बात है। उसमे डर नहीं होता। अंग्रेजी में एक कहावत है,” Ignorance is bliss।” मेरे बचपन का इतिहास इस पर खरा उतरता है। जब मैं चार बरस का था तो मैं बिना सीढ़ी के घर की छत पर चढ गया था। तीन फीट की बाउंड्री वाल पर, फिर पेड़ की डाल से होते हुए ढलान वाली गेरेज की छत पर और उसके बाद घर की पक्की छत पर। हाँ , उतरते समय पैर को गेरेज की छत नहीं मिल पाई और लोगों ने मुझे लटकते पैरों के साथ रोते बरामद किया।
ऐसे  कितने ही वाक्यात हैं जिसे याद कर मेरा खुद का दिल दहल जाता है।
1950 से 1952 तक हमलोग टाटानगर में थे। उसी दरम्यान, किसी दिन, माँ ने पिताजी की सफ़ेद फुलपैंट से मेरे बड़े भाई के लिए एक फुलपैंट और मेरे लिए एक हाफपैंट सिल दिया। दोनों को पहनाकर फिटिंग देखकर वह खुद भी बहुत खुश हुई और हमलोगों को बाहर घूम के आने की इजाजत भी दे दी। हमलोग घर की दायीं तरफ 100 कदम पर मोड़ तक गए। वहाँ कटीली तारों से घिरा PWD ऑफिस का फुटबाल के मैदान से दुगुना मैदान था।  हमलोग उसके छोर पर एक आदमी को , शायद सफाई कामगार रहा होगा, माचिस से जमा कचरे को जलाते देखते रहे। उसने माचिस वहीं दीवार के कोटर में छिपा दी और चला गया। हम दो भाईयों की आँखें चमकी। हमलोग वहाँ से माचिस निकाल लाए और बारी-बारी से उसकी तीलियां जला कर मैदान के अंदर फेंकने लगे। गर्मी की दोपहरी और मैदान में सूखी जंगली घास का 4-5 फीट ऊंचा जंगल।  आग लग गयी और देखते-देखते कैरम बोर्ड जितनी जगह में फ़ैल गयी। हमलोग डर गए और घर की तरफ निकल लिए। खाना खाया और सो गए। दो घंटे बाद बड़े जोरों का शोर सुनाई दिया। तभी दमकल गाड़ियों का भोपूं भी सुनाई दिया। दमकल गाड़ी 1951 के आस-पास सबके लिए अजूबा थी। माँ के लिए भी। माँ के साथ हमलोग भी बाहर आये तो देखा की काफी लोग मैदान की तरफ जा रहे हैं। माँ और उसके पीछे हमलोग भी हो लिए। दूर ही से मैदान धूं-धूं जलता दिखाई दिया। लपटें आसमान छू रही थीं। दमकल के पानी की बौछार के साथ बहुत से लोग डंडे और बोरों से भी आग बुझा रहे थे। माँ ने किसी से पूछा की आग कैसे लगी। उस आदमी ने सर हिला कर अनिभिज्ञता दिखाई और हम बच्चों की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए कहा कि इन्ही लोगों ने लगाई होगी। हमलोग बहुत ज्यादा डर गए। बहुत दिनों बाद हमलोगों को अक्ल आई की उसने ये शरारत से कहा था।
एक बार पिताजी शिकार पर गए और देर रात बाघ के दो बच्चों के साथ लौटे। रात भर दोनों कि गुर्राहट से हम बच्चो की नींद उड़ गयी। सुबह पिताजी बाघ के दोनों बच्चों को जंगल विभाग में सोंप आये। पिताजी के पास मैनचेस्टर की ०।२२ बोर की राईफल थी। उससे वे चिड़ियों और खरगोश को मारते थे। एक बार हमारी आदिवासी बाई ने उसके कारतूस की खाली खोली माँ से मांगी ताबीज बनाने के लिए । माँ ने खाली कारतूस दे दिए। अगले दिन सुबह हम भाई दीवाल पर लटकी राईफल के थैले से कारतूस की डिबिया निकाल कर बाहर पेड़ के नीचे इन्टे से मार-मार कर कारतूस की खोली अलग करने की कोशिश करने लगे । अगर समय पर पड़ोस की मासीमाँ  की नज़र नहीं पड़ी होती तो कुछ गंभीर जरूर घट जाता।
1952 से 1959 हमलोग पटना में रहे। एक बार मुझे एक कच्चा आम पेड़ की अंतिम ऊचायीं पर दिखा। छत से जो भी आम की डाल हाथ में पकड़ में आई, उसके सहारे आम के पेड़ पर चढ़ गया। धीमे-धीमे आम तक भी पहुच गया ।पर तभी मेरी माँ किसी काम से छत पर आई । उसे आसमान में आम के विशाल पेड़ की फुनगी कुछ ज्यादा ही हिलती नज़र आई।उसकी नज़र मुझ पड़ पड़ी । पेड़ की फुनगी मेरे वजन से दायें-बाएं झूल रही थी। मेरा तो नहीं पर माँ का डर से बुरा हाल हो गया। उसने अपनी आँखे हाथ से बंद कर ली और कहा-“बेटा ! बहुत सम्भल कर भगवान का नाम लेता हुआ नीचे आ जा। मैंने तब भी पहले आम तोड़ लिया और आराम से नीचे आकर माँ कि साड़ी हिलाता हुआ उसे आँख खोलने को कहा।
मेरे साथ दो बड़ी कमजोरियां थीं।एक तो मेरा कद औसत से कम था और दूसरे मैं बहुत ही पतला- दुबला था। इस कारण मुझे अपनी हैसियत कायम करने के लिए कुछ ज्यादा दिलेरी दिखानी पड़ती थी। 10 साल कि उम्र में मेरा वज़न 25  किलो और कद 4 फीट रहा होगा।
एक बार, क्रिकेट खेलते समय बाल पडोसी के घर कि तिमंजली छत पर चला गया। उस घर के लोग छुट्टियों में कहीं गए हुए थे। मुझे लोगों ने हिम्मत दिलाया । मैं ड्रेन पाइप के सहारे छत पर चढ़कर बाल ले आया।
इसी तरह , गर्मी कि छुट्टियों में हमलोग आम बगान पहुंचे । बगान आमों से लदा था पर एक पहलवान सा माली खाट पर लेट कर रखवाली कर रहा था। दो-तीन बार हमलोग मन मसोस कर लौट गए। बाद में मेरे साथियों ने मेरी बहादुरी को चुनौती दे डाली। फिर क्या था? माली की रखवाली करते हुए भी मैं आँख बचा कर आम के पेड़ पर चढ़ गया। औसतन हमलोग आम नीचे फेंका करते थे पर माली जग न जाये इसलिए मैं सारे आम अपनी निकर में खोंसी शर्ट में डालता जा रहा था। आम के भार से शर्ट एक जगह निकर से बाहर निकल गयी और एक आम नीचे गिर गया। माली की नींद खुल गयी। मेरे साथी तेज़ी से भागने लगे। माली की नज़र मुझ पर पड़ी। उसने डंडे को जमीन पर बजा कर मुझे ललकारा। मेरे साथी दूर खड़े नजारा देख रहे थे। मैं पेड़ के मोटे तने से अपने आपको छिपाता हुआ तरकीब सोचने लगा। माली खाट पर बैठ कर मेरे उतरने का इन्तजार करने लगा। कोई 15 मिनट बीते होंगे कि माली का धैर्य जवाब देने लगा। वह अब डंडा मेरी तरफ फेंक कर मुझे चोट पंहुचाने की कोशिश करने लगा। मैं पेड़ के तने के दायें-बाएं सरक कर अपने को बचाने लगा।

अंत में माली ने कहा कि अगर मैं सब आम नीचे गिरा दूं तब वह मुझे छोड़ देगा। पर हमलोगों ने माली के बारे में सुन रखा था। वह अपनी वायदे पर कायम नहीं रहता था और पकड़ कर बहुत मारता था। उससे भी बुरा कि वह घर आ जाता था और जमकर शिकायत करता । मेरे पिताजी “ SPARE THE ROD…” वाली कहावत का अक्षरशः पालन करते थे।
तभी मुझे तरकीब सूझी। मैं आमों को अपने साथियों कि तरफ फेंकना शुरू किया और उन्हें लेकर भागने को कहा । ऐसा होने पर माली आमों की तरफ भाग कर साथियों को आम चुनने से रोकने लगा। इतना मौका मेरे लिए काफी था।
आमिर खान के “ गुलाम” का सबसे अव्वल सीन था जिसमे वह तेज़ी से आती हुई ट्रेन के सामने दौड़ता है और तकरीबन ट्रेन से कट जाने की हद तक दौडकर बाज़ी जीतता है। यह दिलेरी भी हमलोगों ने 10-12 साल की उम्र में दर्ज करा ली थी। हमलोग ट्रेन की पटरी पर कान लगा कर ट्रेन आने की जानकारी ठीक-ठीक बताने पर साथियों की वाहवाही लूटते थे। साथ ही एक पैसे के ताम्बे के सिक्के को पटरी पर रखकर ट्रेन के पहियों से दबवा कर दुगना बड़ा कर लेते थे। तभी, एक दिन हमलोगों में बाजी लगी कि कौन सामने से आने वाली ट्रेन के सबसे करीब आकर पटरी छोड़ता है। मैं ये तो नहीं बताऊँगा कि किसने पटरी सबसे अंत में छोड़ी पर ये जरूर बताऊंगा कि उस कोयले वाली ट्रेन के ड्राईवर ने चुनी हुई गालियाँ हम सबों को दी और साथ ही कालिख से भरे कपड़े की गेंद बना कर हमलोगों की तरफ फेंका। गालियाँ बँगला में थीं। दो बजे दिन में उस समय सीआल्दाह एक्सप्रेस हावड़ा से पटना आती थी। इस वाक्ये के आधे घंटे बाद इंस्पेक्टर की चार पहिये वाली गाड़ी( जिसपर एक बड़ा छाता भी लगा होता था) आया और उस इलाके के लोगों को बच्चों को ऐसा करने से रोकने की कड़ी हिदायत देकर गया।
एक बार उन्ही दिनों मौत से सामना तब हुआ जब मैं , आस-पास खेलते वक्त, एक तहखाने के साथ वाले गेराज में जाले से छिपे , घुप अंधरे कोने में छिप गया था। उस तहखाने के अंदर सांप-बिच्छू के डर से कोई जाने की हिम्मत नहीं करता था। खोजने वाला लड़का मुझसे 5 साल बड़ा रहा होगा पर उसे उस अँधेरे में आकर खोजने में डर लग रहा था। उसने अंदर आने वाले दरवाजे से मुंह अंदर कर मुझे बाहर आने  को कहा। अंत में हार कर उसने लोहे का एक बड़ा नट उठा लिया और मुझे  दस तक की  गिनती खत्म होने तक बाहर निकल आने को कहा। मेरे ऐसा नहीं करने पर उसने अपनी बेइज्जती समझ कर, खीच कर भारी  नट मेरी तरफ मारा। नट बुलेट की तेज़ी से मेरी कनपटी पर लगा। कोई भी हरकत ना होते देख वह लौटने लगा। तभी मैं उसे पीछे छूकर आस-पास धप्पा कहकर बेहोश हो गया। मुझे उसी हालत में साथी उठाकर डॉक्टर के पास ले गए। मलहम-पट्टी हुई। आधे घंटे बाद होश आया होगा। तबतक साथियों ने मेरी खून से सनी कमीज बदल दी थी।
जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गयी, डर से दोस्ती बढ़ती गयी। अब तो खुद से भी डर लगता है।
इस डर से अब चिढ़ होने लगी है।

परिचय


आखिर चिरंतन काल से बचपन को ही पूरी जिंदगी का सबसे अच्छा काल क्यों कहा गया है. जितना ज्यादा मनुष्य अपने जीवन के अंतिम पड़ाव के पास पहुँचता जाता है उसे अपने बचपन की याद उतनी ही सताने लगती है. बचपन पर न जाने कितनी कवितायेँ ,कितने संस्मरण लिखे गए और लिखे जाते रहेंगे. पर मुझे सबसे अच्छा लगता है बचपन की यादों को दुबारे जीना और ये बहुत आसान है. पर सबसे आसान क्या है वह सभी को पता है.
बचपन की सबसे अहम आधारशिला है “Ignorance is Bliss”. कोई डर नहीं,किसी से डर नहीं. अभिभावकों का सारा दिन “ नहीं-नहीं” रटते ही गुजार जाता है. जिन्होंने जिंदगी भर नकारात्मकता को जीवन से दूर रहना सीखा हो वही बच्चों को “ ये नहीं करो, वहाँ नहीं जाओ, उससे बात नहीं करो “ करते-करते नहीं थकते.
 
बचपन की सबसे पहली याद सोते समय माँ से टाफी की जिद करना और माँ का यह कह के फुसलाना कि टाफी ऊपर घूमते पंखे में अभी बन रही है सुबह उठने पर मिलेगी . सुबह यह सपना देखना कि टाफी बनकर पंखे से बरस रही है और अचानक उठ जाना.
दूसरी याद आती है फिल्म का पर्चा लूटने के लिए विज्ञापन गाडी के पीछे भागना. क्या मंजर रहा होगा 3,4  और  6 साल के लड़के बाग के नल पर नहाना छोड़ कर गाडी के पीछे दौड़ते होगे जिनमे सबसे बड़े के पूरे शरीर में साबुन लगा हुआ और लपेटा हुआ टावेल रस्ते में कही गिरता हुआ. उम्र के हिसाब से उसके पीछे उसके दोनों छोटे भाई बिलकुल नंग-धड़ंग.
बेहद गर्मी की बाद बरसात की पहली बारिश और मोहल्ले के सभी लड़के और कुछ लडकियां भी हल्ला करते, बारिश में भीगते सड़क पर दौड़ते. ऐसे में कोई बच्चा कहाँ परवाह करता है अगर बारिश की तेज और भारी बूंदे उनके शरीर को चोट पहुंचाती हों और शरीर पर लाल चकत्ते निकल आते हों.
भारी बारिश से  घर के बाहर नाले में पानी का तेज बहाव और कभी-कभी पूरे सड़क पर घुटने भर पानी आनंद का चरमोत्कर्ष हुआ करता. उस दिन घर के बाहर जाने की कई बहाने निकल जाते. अगर गंदा पानी होने की वज़ह से जाने की सख्त मनाही हो जाती तब कागज के नाव की रेस सोने पे सुहागा बन जाती. बड़े भी इसका मजा लेते , ज्यादातर छोटों के लिए सही नाव तो बनाकर देते ही.
 
“Child is the father of the man”.विलियम वर्ड्सवर्थ की प्रसिद्ध कविता “ The Rainbow” की इस पंक्ति में न जाने कितने अर्थ छुपे हुए है. क्या ये पंक्तियाँ पुनर्जन्म को इंगित करती नहीं दिखती हैं?