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Monday, February 11, 2013

मान गए अनारकली !


अच्छे दोस्त की एक पहचान ये भी है की आप कुछ भी अनाप-शनाप लिख दे, वह तारीफ़ ही करेगा. मैंने एक कंजूस मौलवी की कन्जूसियत की हद पर अपने दोस्त के फेसबुक में लिखा. फेसबुक भी क्या चीज़ है. दस सेकंड में "लाईक" दिखने लगा. जाहिर है उसने बिना पढ़े ही क्लिक किया था. तीसरे दिन बड़ी मुश्किल से उससे बात हुई. पूछने पर उसने तारीफ़ में यहाँ तक कह दिया कि मेरी लेखनी में के०पी०सक्सेना की खुशबू है. इंसान भी क्या चीज़ है. समझते देर नहीं लगी कि उसने मेरा मन रखने के लिए कह दिया है.पर हमलोग सब किसी न किसी बहलावे के कारण ही जीते रहते हैं. मैंने खुश होते पर झेंपते हुए पूछ ही लिया कि ऐसा उसे कैसे लगा. उसने कहा कि बस थोड़ी कमी है. जहां मैंने पान कि गिलौरी मुंह में दबाते लिखा था उसे सक्सेना घुसेड़ते हुए लिखते. मैं कभी सक्सेना जी का लिखा खोज-खोज कर पढता था. ऐसा लगता था कि वे जो देखते थे उसे हु-बहू कागज पर उतार देते थे.
मुझे घुसेड़ने शब्द पर एक वाकया याद आ रहा है जो मेरे बॉस शर्मा जी के साथ गुजरा था. बात तबकी है जब मैं ३० का और मेरे बॉस ४० के हुआ करते थे. उन्हें अपने मातहतों का दरबार लगा कर आपबीती सुनाने का काफी शौक था. उसमें वे अपनी बेवकूफी बताने में जरा सी भी कंजूसी नहीं करते थे. उनके निचले होंठ की दायीं तरफ एक कटने का निशान था बिल्कुल शत्रुघ्न सिन्हा जैसा. चूंकि बदन-काठी और तौर-तरीके से वे वैसे लतखोर नहीं लगते थे इसलिए एक दिन जब वे बेतकल्लुफ थे तो मैंने उस कटे निशान के बारे में पूछ ही लिया. शुरू हो जाने में उन्हें देर नहीं लगती थी, एक किक में बिल्कुल वेस्पा स्कूटर की तरह.
वाक्या उनके कालेज के दिनों का था. सिनेमा हॉल में बीना रॉय वाली अनारकली फिल्म लगी हुई थी.
जिसे देखो वही मुगलेआजम, सलीम या अनारकली बना कैम्पस में नजर आ रहा था. प्रोफेसर हाथ पीछे कर नापते पर भारी कदमो से चहल-कदमी करते दिख रहे थे. लड़के अचानक पैंट-शर्ट की जगह चूडीदार पहने दिख रहे थे. कालेज में लड़किया ऐसे भी बहुत कम थीं. जो थी वो या तो अनारकली की तरह शरमाई हुई पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदती दिख रही थी या लट बिखराए दीवारों के बीच चुनी जाती हुई महसूस कर रही थीं.
सबसे बुरा आलम शहर भर के गुलाब के पौंधो का था. सभी बिना फूल के विधवा लगते थे. गुलाब के झड़ने को तैयार फूल, जवान फूल और कलियाँ सभी कैम्पस के अंदर शोभा बढ़ा रहे थे. प्रोफेसर की पीठ के पीछे की हुई हथेलियों में दम तोडते, आकाश की ओर निगाहें किये हुए लडको के नाक के नीचे खुशबू बिखेरते और लड़कियों के बाल की सलवटो में अंगड़ाई लेते सभी तो गुलाब के फूल ही थे.
शर्मा जी का आय०क्यू० बचपन से ठीक-ठाक था. तुरत समझ गए ये सब कारस्तानी अनारकली फिल्म की है. देखना जरूरी हो गया. पर भीड़ का ये हाल कि कोई भूल-चूक होने की गुन्जायिश किसी को भी हाल के गेट के बाहर कर दे. दो दिन शर्मा जी मायूस लौट आये. तीसरी बार हनुमान चालीसा रटते-रटते फिर आजमाईश को निकले.
ग्रेजुएशन तक आते-आते उन्हें पान खाने की लत लग चुकी थी. पान की दुकान पर पंहुचे. पान वाले ने उनका घबड़ाया हुआ मायूस चेहरा देखकर समझा की शायद इस बार अचानक बेमौसम इम्तेहान शुरू हो गया है. पूछने पर मालूम हुआ की माजरा उतना मुश्किल नहीं था फिर भी शर्मा जी के लिए इम्तेहान से कम का नहीं था. कालेज के पढ़ाकुओं को गेट के बाहर पैर जमाये पानवालों और चाय की दुकान वाले भाईजी में फ्रेंड-फिलोसोफर-गाईड मिल ही जाता है नहीं तो मालूम नहीं ख़ुदकुशी करने वालो और पागलखाने में दाखिले का सालाना आंकड़ा क्या होता.
शम्भू पानवाले ने मुंह से पान के पीक बगल में पिचकारी मारते हुए तुरत हौसला दिया और कहा कि इन्तेजाम किये देते हैं. उसने शर्मा जी से उनका पेन और एक कागज माँगा. पेन तो मिल गया पर वहाँ हरे-भरे पत्तों के अलावा और कुछ भी नहीं था जिसपर टेंडर(हुक्मनामा) लिखा जा सके. लिहाजन, शम्भू ने शर्माजी की दाहिनी हथेली खींची और उसपर लिखा दिया,” शकूर मिया इन्हें घुसेड़ देना.बस इतना ही लिखा और कहा कि देखना क्या कमाल होता है.
शर्मा जी कहे मुताबिक़ १२ आने वाली सेकंड क्लास वाली गेट पर आ गए. शकूर मियाँ की खिजाब वाली बकरीनुमा दाढ़ी उनकी पहचान साबित कर रही थी. शर्मा जी ने हथेली शकूर मिया के आँखों के सामने कर दी. शकूर मिया ने पढ़ा. दुबारे गौर से पढ़ा और शर्मा जी को खींच कर बगल में खड़ा कर लिया.
तीसरी घंटी बज चुकी थी. लोग-बाग जिनको अंदर जाना था, जा चुके थे. जो बाहर रह गए थे वे ऐसे दौड़ कर अंदर घुस रहे थी जैसे ट्रेन छूट चुकी हो. तभी शकूर मिया ने अपने दाहिने हाथ से शर्मा जी का गला पीछे से भरपूर पकड़ा और बाएं हाथ से दरवाजा खोल उन्हें सही में अंदर जोर से घुसेड़ दिया.
अंदर घुप अँधेरा था. पहले तो सीढ़ियों ने धोखा दिया. गिरते-पड़ते शर्माजी की काया को कुर्सी  के हत्थे ने भरपूर संभालने की कोशिश की. पर होठ तो किसी और मकसद के लिए बनाया गया है. मुगलेआज़म के दरबार में जहाँ सलीम भी जलवाफरोश हों और अनारकली अपना जलवा बिखेरने वाली हो , वहाँ तो अदब से जाना था.

Monday, October 8, 2012

रेलगाड़ी


बीसवी सदी के लोगों के लिए बिजली से चलने वाली रेलगाड़ियाँ मेट्रो जैसी कृत्रिमता से ओतप्रोत है जबकि डीज़ल गाड़ियां शहरों के अभिमान से चूर दिखती हैं और कोयले से चलने वाली स्टीम गाड़ियों में गाँव की अल्हड़ता थी, खुशबू थी और था एक अजीब सा अपनापन जब हरेक यात्रियों के पास बात करने को समय था और बाँट कर खाने के लिए तरह-तरह के पकवान थे. गाड़ी के डिब्बे भी यात्रियों को झुलाते रहते थे. यात्रियों के शोरगुल के साथ-साथ पटरी पर दौड़ते पहियों की खटर-पटर, राख से भरे धुएं का गुब्बार, सब मिलजुल कर भी नींद बहुत अच्छी आती थी.  
रेलगाड़ियों की जान सबसे सस्ते किराए वाला डिब्बा है. जैसे-जैसे किराया मंहगा होता जाता है उसमें यात्रा करने वाले यात्रियों की अकड़ बढती जाती है और बोल-चाल व् गहमा-गहमी में कमी आती जाती है, यहांतक कि प्रथम श्रेणी में एक अकेला यात्री पत्रिका पढता अथवा शराब पीता पाया जायेगा.
शायद १९५० की गर्मी रही होगी. मैं २-३ वर्ष का था. याद आता है कि तडके सुबह मुझे पोर्सेलीन के बाथटब में माँ उलट-पुलट कर नहला रही थी और एक अंग्रेज महिला से अंग्रेजी में बात कर रही थी. शायद वह जमशेदपुर के रेलवे स्टेशन का प्रथम श्रेणी का वेटिंग हॉल रहा होगा क्योंकि कुछ देर बाद लाल पगड़ीमय युनिफोर्म पहने एक आदमी ट्रे में पोर्सेलीन टी सेट में चाय लेकर आया था जिसकी एक ठंडी घूँट माँ ने मुझे भी पिलाई थी. अब समझ में आता है कि वह क्षण पिताजी का गया से जमशेदपुर तबादले के समय का था.
१९५३ के आस-पास मैं माँ के साथ पटना से बनारस गया था. रेलगाड़ी के सफ़र का तो ज्यादा कुछ याद नहीं है सिवा इसके कि ट्रेन में मुझे मूंगफली खाने को मिली थी और माँ ने घर का बनाया हुआ मीठा ठेकुआ आम के अचार के साथ दिया था. बनारस शाम को पहुंचा था और स्टेशन से रिक्शे पर अपने ननिहाल चेतगंज पलक झपकते पहुँच गया था. तब स्टीम इंजिन से गाडी चलती थी. पूरा कपड़ा काला पड़ जाता था और शरीर से धुंएँ की महक नहाने के बाद ही जाती थी.
१९६० में पिताजीके साथ कोडरमा स्टेशन से बनारस गया था. ९ बजे सुबह ट्रेन में बैठा था और शाम को पांच बजे बनारस पहुंचा था. सफ़र में पिताजी ने मूंगफली और खीरा खिलाया था. गया स्टेशन पर एक रोचक घटना घटी थी. पितृ-पक्ष का समय था . गया स्टेशन पर भारी भीढ़ उमड़ी थी. एक गेरुवा वस्त्रधारी , सर मुडाया , ४०-४५ वर्ष का आदमी खिड़की से अन्दर घुसा था जिसके साथ प्लेटफार्म पर खड़े लोग छेड़खानी कर रहे थे. एक-दो लड़के उसपर पत्थर भी फेंक रहे थे. देखने से अर्ध-विक्षिप्त सा लग रहा था. सर और चेहरे पर उस्तुरे से कटी जगह से खून झलकता हुआ. उसने मुझे घूर कर देखा. मैंने डरकर उसके लिए जगह छोड़ दी और स्वयम खड़ा हो गया. पर उसने बैठने के बाद मेरे लिए बैठने के लिए अपने बगल में जगह बना दी. हमलोग सभी सहम कर उसकी हरकत और हाथ में लाल कपडे से लिपटा किताबों का बण्डल देख रहे थे. उसने मेरे पिताजी से नजर मिलाई. पिताजी मुस्कुराए और उनके बीच शुद्ध इंग्लिश में वार्तालाप आरम्भ हुआ जो चौकाने वाला और बेहद रोचक था. मैं उसे हूबहू रखने की कोशिश करता हूँ.
The man :“ I am ………. Malviya, grandson of Pandit Madan Mohan Malviya”.
My father was utterly surprised,” You mean the great Pandit  Malviya who created the Banaras Hindu University !” My father took it as an introduction from an insane person.
“Yes ! But people take me as an insane person as my actions are somewhat not normal and on which I have little control.” He quipped and added : “ I come every year to  relive the rituals of shraddh.”
“But, one has to come only once to ordain Gaya rituals !” My father said.
He laughed loudly and said:” Isn't life a series of images that change as they repeat themselves?  Man is young as long as he can repeat his emotions …….”
My father seemed to be stunned for a while with his remarks which seemed to be quotations of great persons. The grandson of Malviya and my father talked on variuos subjects related with English literature and Jurisprudence. Then suddenly that man who, by then had earned respects of co-passengers, turned to me . My father told him that I was his son and was due to finish  school education at a very young age of 11 years.
Mr Malviya placed his right hand on my shoulder and  asked:” How many sisters and brothers you have ?”
I said:” We are nine in numbers.”
“Ha! Ha! Numbers ! Young boy ,”.he went on : Tell me not in mournful numbers life is but an empty dream. Numbers mean lines of a poem. You should use the word number in singular to indicate quantity.”   He taught some basics of grammar with vivid examples.
बाद में कुछ और लोग भी वार्तालाप में शामिल हो गए. उस अकेले ने सब पर अपनी काबलियत का जैसे जादू कर दिया था. वे हमलोगों से एक स्टेशन पहले काशी में ही उतर गए.
अकेले रेल में  सफ़र करने का मौक़ा मुझे तुरत बाद गर्मी की छुट्टियों में मिला. सबकुछ नया-नया और पैर में बाटा का टफी जूता पहन कर मुझमे कुछ ज्यादा ही आत्म विशवास आ गया था. तीसरी श्रेणी का टिकट लेकर मैं सीआल्दह-पठानकोट पैसेंजर पर सवार हो गया.  कुछ देर बाद टिकेट-चेकर आया. उसने सबका टिकेट देखा पर उसने मुझे अनदेखा कर दिया. ऐसा दो बार हुआ. जिस स्टेशन पर मौक़ा मिलता , मैं नीचे उतर कर कुछ भी खाने की चीज खरीद लेता. ऐसे ही एक मौके पर ट्रेन चल दी. मैं दौड़कर ट्रेन पर चढ़ गया. पर उस बोगी में सभी गद्देदार सीट थीं. वह सेकंड क्लास था. दूर से टिकेट चेकर बढ़ता आ रहा था. मेरा डर से बुरा हाल था. पर इस बार भी उसने मुझ पर ध्यान नहीं दिया. अगले स्टेशन पर मैं पुनः अपनी श्रेणी में चला गया.
६५ वर्ष की अवस्था आते-आते मैंने सैकड़ों बार रेलगाड़ी में सफ़र किया होगा. पर हर बार कुछ नयी अनुभूति होती है, कुछ नया अनुभव होता है. सबसे अच्छा लगता है नए लोगों से जान-पहचान करना, हँसना-बोलना, मिल-बाँट कर खाना-खिलाना और उतरने के बाद भूल जाना. कहीं भी जाऊं , चाहे वह मेरी बेटी-बेटों का परिवार हो, रिश्तेदार हों, दोस्त हों अथवा मात्र सैर-सपाटा हो , सबसे अच्छा लौट कर अपने से छोटे घर में आना लगता है. बिछुड़ने के समय दुःख अवश्य लगता है पर जैसे-जैसे गाडी तेज़ी पकड़ती है सब भूलता जाता है और कुछ देर बाद या तो आप हमसफर पा लेते हैं अथवा खिड़की से बाहर का दृश्य आप पर छा जाता है. बचपन से अबतक न जाने कितनी दोस्ती हुई, कितने रिश्ते बने, कितनों से नजदीकी बनाए रखने की कसम खायी. आज जो बचे हैं उन्हें आसानी से उंगली पर गिना जा सकता है. उसके अलावा कुछ अगर हैं भी तो नहीं हैं.
क्या रेलगाड़ी का सफर एक पूरी जिंदगी का सफ़र नहीं लगता. एक सफ़र- एक जन्म ; दूसरा सफ़र-दूसरा जन्म. आज भी पटरी पर दौड़ती रेलगाड़ी उसी तरह लुभाती है जैसे बचपन में. समय-समय पर मैं पास के ओवरब्रिज के नीचे से गुजरती ट्रेन को देखने का लोभ नहीं छोड़ पाता हूँ. दूर से आते समय भविष्य का रोमांच देती है, पास से गुजरने समय वर्तमान का अनुभव देती है और दूर चली जाने पर अतीत का दुःख देती है. उसके बाद खाली पटरी , सिग्नल की हरी बत्ती गुल होती हुई और दूर तक सन्नाटा पर दूसरी गाड़ी आने का वादा ! मैं भरसक कोशिश करता हूँ कि किसी को विदा करने स्टेशन न जाना पड़े .  

Saturday, September 1, 2012

सिंगर 1933 !



मेरी उम्र तीन वर्ष रही होगी जब पिताजी का तबादला टाटा स्टील के शहर टाटानगर( जमशेदपुर) में हुआ. टाटा में हमलोग 1952 जून तक रहे. मेरी माँ आस-पड़ोस में बहुत कारणों से लोकप्रिय थीं. पहला कारण था कि उस जगह अधिकाँश बंगाली परिवार थे जो टाटा स्टील में काम करते थे और मेरी माँ एक मजिस्ट्रेट की पत्नी थी. दिन के समय हमेशा दो-तीन चपरासी मुस्तैद रहते थे और पड़ोसियों को छोटे-मोटे बाजार के कामों में और सरकारी कामों में मदद मिल जाया करती थी. दूसरा कारण था कि माँ एक अच्छी होमीओपैथ दवाईओं की जानकार थीं. यह विशेषता उन्हें उनके पिताजी से मिली थी जो स्वयं बहुत प्रसिद्ध होमीओपैथ डाक्टर थे. लोग कहते थे कि माँ के हाथों में जादू था, जिसे दवाई देती थी उसे अवश्य और अविलम्ब फायदा होता था. तीसरा और सबसे बड़ा कारण था कि मेरे माँ के पास हाथ से चलने वाली सिंगर सिलाई मशीन थी जिससे वह दूसरों को कपड़े सिलने के लिए सहर्ष दे देती थीं. उस समय सिलाई मशीन का होना दुर्लभ बात थी जैसे आज BMW गाड़ी होना. माँ बताती थी कि यह मशीन उनके माँ की थी और याद नहीं कबसे थी.
मशीन को मैंने तब बहुत गौर से और बहुत देर तक चलते देखा जब मेरी माँ उसपर पिताजी की एक पुराने सफ़ेद पैंट से मेरे बड़े भाई के लिए फूल पैंट और मेरे लिए हाफ पैंट सिल रही थीं. माँ उस मशीन पर हफ्ते में एक बार तो जरूर ही सिलाई करती होंगी. मेरे घर में दादा-दादी को लेकर दस प्राणी थे. 1950 के समय औरतों के कपड़े घर में ही सिले जाते थे, ज्यादातर हाथ से बिना सिलाई मशीन के.
1960 के आस-पास मेरी दो छोटी बहनें भी सिलाई का सारा काम उसी मशीन पर किया करती थी. मेरी सबसे छोटी तीसरी बहन तब तीन साल की रही होगी जब वह माँ के पास वैसे ही बैठ कर सिलाई होते देखती थी जैसे हमलोग उतनी उम्र में. फर्क सिर्फ इतना था की वह छोटी लड़की माँ को सिलाई में मदद भी कर दिया करती थी, जैसे सूई में धागा डालना, दूसरी तरफ बैठ कर कपड़े को सीधे आगे बढ़ने में हाथ का सहारा देना, दौड़ कर माँ के लिए पानी लाना इत्यादि. उस दरम्यान एक हादसा भी हुआ था जो भुलाए नहीं भूलता. मेरी छोटी बहन की छोटी ऊँगली चलती मशीन के सुई के नीचे आ गयी और ऊँगली के आर-पार हो गयी. पर वाह रे मेरी माँ ! जबतक मेरी बहन कुछ समझती या चिल्लाती, माँ ने तुरत सुई को मशीन से अलग किया और अपने दांतों से खींच कर ऊँगली से निकाल दिया. बाद में डेटोल लगाकर ऊँगली को बाँध दिया. कुछ घंटों बाद मेरी बहन भूल भी गयी कि उसे चोट भी लगी है.
1961 में जब मैं कालेज में पढ़ने लगा तो छोटे-मोटे रफू मैं खुद कर लेता था. पैजामे की डोरी, पैंट में चोर-पाकेट, यहाँ तक की मैंने अपने पहले फूलपैंट के पायचें (मोहरी) को भी अपने मन लायक कम कर लिया था.
1976 में मैंने अपनी दूसरी बहन को उसकी शादी में तोहफे के तौर  पर और चीजों के अलावा एक सिलाई मशीन भी दी थी जो मैंने किश्त में पहले से खरीद कर रखी थी.
१९८० के आस-पास एक दिन मैंने माँ को सिलाई मशीन से सिलाई करने में परेशान सी दिखी. माँ ने कहा कि मशीन की बहुत दिनों से सर्विसिंग नहीं हुई थी और उनकी जानकारी में कोई तजुर्बेकार नहीं दिख रहा है. घर का सभी मरम्मती काम मैं ही किया करता था. इसका भी जिम्मा मैंने लिया. पर दूसरे दिन माँ को आश्चर्य में डालने के लिए मैंने एक नयी सिलाई मशीन लाकर दे दी. नौकरी के बाद चूँकि मुझे शिफ्ट ड्यूटी करनी पड़ती थी इसलिए मैं अपने कारखाने के पास दिए गए क्वार्टर में रहने लगा था.
मेरी शादी हो चुकी थी. माँ ने मुझे अपनी पुरानी सिंगर मशीन दे दी . कहा कि इसे ठीक कर के तुमलोग कार्य में लाना. मैं माँ की पुरानी सिंगर मशीन अपने साथ अपने निवास पर ले आया स्वयं मरम्मत करने के लिए. जब कुछ दिनों बाद माँ मेरे निवास पर आयीं तो मशीन को ठीक से चलता देख ललचा सी गयीं और कहा कि मैं उनसे मशीन बदल लूं. मैंने माँ को उस वक्त यह कहकर फुसला दिया कि अगर यह दुबारे खराब चलने लगी तो उन्हें परेशानी होगी. दरअसल, उस मशीन की आवाज़ से मुझे माँ की कमी नहीं खटकती थी.
यह मशीन आज तक मेरे साथ है. इसकी देख-भाल मैं ही किया करता हूँ. पर पिछले तीन साल से मेरी तबियत खराब होने के कारण और ज्यादा समय घर से बाहर अपने नौकरीयाफ्ता बच्चों के साथ रहने के कारण सिलाई मशीन अनदेखी रह गयी.
कुछ दिन पहले, मैंने देखा कि चूहों ने मशीन को अपना घर बना लिया था. मैंने उसकी सफाई की, कल-पुर्जों की किरासन तेल से धुलाई की. मशीन आयल डालने के बाद चलने तो लगी पर बौबिन कुछ साथ देती नहीं लगी. श्रीमतीजी ने बताया कि उन्होंने बीच में कभी मशीन चलाने की कोशिश की थी और उन्होंने बाजार से नयी बौबिन भी लाकर लगाया था. पुरानी बौबिन खोजने पर नहीं मिली.
खैर मैंने खोजबीन कर एक जानकार मेकनिक से बौबिन बदलवा ली. मेकनिक ने यह भी कहा कि मात्र 1000 (20 USD) रुपये में यह मशीन पैंट होकर नयी जैसी दिखने लगेगी और 500 ( 10 USD) रुपये खर्च करने पर इसके लिए एक सुन्दर कैरी बैग भी आ जायेगा.
मुझे ऐसा कुछ करना अच्छा नहीं लगा. मुझे मेरा कनपटी पर होता सफ़ेद बाल ज्यादा अच्छा लगता है. लोग मेरा ज्यादा आदर करते हैं.
मैंने इन्टरनेट पर सिंगर सिलाई मशीन से भी संपर्क साधा था. उन्होंने जो कुछ बताया वह बहुत चौंकाने वाला था. मेरे दिए गए सीरियल नंबर से यह जानकारी मिली कि यह सिलाई मशीन स्कॉटलैंड में अप्रैल 1933 में बनी थी और इसका मैनुअल उनके पास उपलब्ध नहीं है.

Sunday, May 27, 2012

अंकल पोजर


पिताजी हमलोगों को ९-१० वर्ष की उम्र से इंग्लिश पढाया करते थे. वे इंग्लिश में एम०ए० थे. उन्हें हमलोगों के पाठ्य पुस्तकों की ज्यादातर कवितायें-कहानियां और लेख पहले से पढ़ी होती थी. ऐसा इसलिए की वे पटना के दयानंद स्कूल में शिक्षक और बी०एन०कालेज में लेक्चरर रह चुके थे. कहना न होगा की हमलोगों की पढाई में बेंत की प्रमुख भूमिका होती थी. पढ़ने का समय होते ही हमलोग कापी-किताबों के साथ बेंत स्वयं ही रख देते थे. पर एक कहानी में बेंत को अपना कमाल दिखाने का मौका ही नहीं मिला. वह कहानी नवमी कक्षा की “ Uncle Podger hangs a Picture थी. उस दिन पिताजी ने माँ को भी पास बिठा लिया और कहने लगे,” आज हमलोग प्रकाश (यानि मै) पर लिखी कहानी पढेगे. कहानी ऐसे अंकल पर थी जो किसी भी काम को बड़े मनोयोग से आरंभ करते लेकिन अंत में वह काम बुरी तरह बिगड़ जाता. फोटो टांगने के दरम्यान, कुर्सी जिसपर वह चढ़े होते टूट जाती, दीवाल जिसपर कील ठोक रहे होते टूट जाती साथ ही हाथ पर भी हथौड़ी मार लेते. अंत में फोटो फ्रेम भी टूट जाता. पूरी पढाई में हँसी-मजाक होता रहा. मजाक मुझ पर ही हो रहा था लेकिन तब भी मै खुश था इसलिए की एक ऐसा भी दिन था जब मार नहीं पड़ रही थी. उस दिन के बाद भी, घर में जब भी कुछ टूटता या गड़बड़ाता, पिताजी पहले यह निश्चित करते कि कहीं उस एपिसोड का नायक अंकल पोजर यानि मै तो नहीं था. पर आज भी अंकल पोजर सक्रिय है हर घर में , हर व्यवसाय में, हर ग्रह पर, पूरे ब्रह्माण्ड में. न जाने कितना कुछ बिगडता है तब जाकर एक पृथ्वी जैसा स्वर्ग बनता है.

हमलोगों का नौ बच्चों का परिवार था. हरदम कुछ न कुछ टूटता ही रहता था . पिताजी की अनुपस्थिति में ज्यादातर हमलोग टूटे सामान की मरम्मत कर चुपचाप उसकी नियत जगह पर रख देते. किसी किसी मरम्मती सामान में कारीगरी या स्पेयर न होने की वजह से कुछ कमी रह जाती. जब वह कमी पिताजी के नजर पड़ती तो एक अच्छा बहाने की गुन्जायिश तो बनती ही थी. घर में चुकी मै सबसे पतला-दुबला और कमजोर था इसलिए बलि का बकरा मुझे ही बनाया जाता. मुझे मार कम पड़ती. दूसरे कमजोर होने की वजह से, जो काम कोई नहीं कर पाता उसे मै ले लेता अपनी मजबूती जाहिर करने के लिए. इस कारण टारगेट पर मै खुद-ब-खुद आ जाता. इससे एक फ़ायदा तो हुआ ही. जब मुझे अपना घर सम्हालने की जिम्मेवारी आई तो छोटे-मोटे काम के लिए मुझे बिजली मिस्त्री, बढ़ई, राज-मिस्त्री, माली, धोबी इत्यादि की कभी आवश्यकता नहीं पड़ी. यहाँ तक की तरह-तरह का खाना बनाने में भी मै सफल हुआ.
जिस कारखाने में मै काम करता था उसमे मुझे रूसी, जेक, फ्रेंच और जर्मन कारीगरों के साथ काम करने का मौक़ा मिला. उनलोगों में सबसे खास बात यह थी की वे किसी काम को छोटा नहीं समझते थे. मेरे लैब-रूम के झरोंखों में धूल पेस्ट की तरह चिपकी हुई थी. मेरे फ्रेंच सहयोगी ने उसे स्वयं साफ़ किया. मैंने यह भी पढ़ा था कि जापान में मैनेजर अपने कमरे की सफाई स्वयं करते हें. बाद में जब लैब की बागडोर मेरे हाथ आई तो १५ कमरों में विस्तृत पूरे लैब की सफाई और दीवारों की पेंटिंग लैब के पूरे स्टाफ ने मेरे साथ मिलकर की. इसे बहुत सहारा गया क्योंकि उस समय मेरे कारखाने के बंद होने की संभावना बनने लगी थी.
२००३ में मेरे स्वैच्छिक रिटायरमेंट लेने के ठीक दो महीने पहले लोकसभा की कमिटी का आगमन हुआ कारखाने की सुरक्षा और पर्यावरण व्यवस्था की जांच करने के लिए. उस वक्त ये दोनों विभाग की पूरी जिम्मेवारी मेरी थी. कमिटी में करीब ३५ लोकसभा और विधानसभा के सदस्य थे. मीटिंग आरम्भ होने के एक घंटे पहले मै सभागृह पहुंचा वहाँ के इन्तजाम की जांच करने. मालूम हुआ की उसी समय चेयरमैन का सन्देश आया था सभी के लिए एक-एक माईक्रोफोन की व्यवस्था करने के लिए. सभी के हाथ-पैर फूले हुए थे कि यह इतनी जल्दी कैसे होगा. सब सामान तो था पर किसी को तार जोड़ना नहीं आ रहा था. स्वयं चेयरमैन भी शंकित थे कि ऐसा सब इतनी जल्दी कैसे हो पायेगा.
सभा समय पर आरम्भ हुई. सबके सामने एक-एक माईक्रोफोन लगा था और बखूबी काम कर रहा था.
आज भी सीखने और कुछ नया करने की प्रबल इच्छा जीवन में रूखापन नहीं आने देती है बल्कि ६५ साल की उम्र में दो बार ICCU में  १५-१५ दिन बिताने के बावजूद सीलिंग फैन की मरम्मत और रेलिंग की पेंटिंग जैसा रोचक काम करने का हिम्मत देती है. पर अब आने वाली पीढ़ी के पोजर को मैं मास्टर पोजर बनाउंगा.
बहुत-बहुत धन्यवाद, अंकल पोजर !

Friday, May 18, 2012

जंगल 2


पिताजी एक कर्मठ और ईमानदार ऑफिसर ही नहीं थे ,उन्हें अपने कर्तव्य के पालन का ज्ञान भी था और आवश्यकता पड़ने पर उनकी बहादुरी उनका साथ देती थी. इंस्पेक्टर ऑफ़ माइका एकाउंट्स की हसियत से उनपर चोरबाजारी और अवैध माइनिंग व् व्यापार पर भी नकेल कसनी होती थी. उस समय करोड़ों (आज के समय का अरबों) का अवैध व्यापर होता था जिसमें मिनिस्टर तक सलग्न रहते थे.
एक दिन अचानक पांच बजे शाम को पिताजी ऑफिस से आते ही मुझे(१२) व् मनोज(१०) को तैयार हो जाने को कहा. वे इस तरह के टूर पर हम बच्चो को भी साथ ले जाते. इस तरह उन्हें हमलोगों को शिक्षित करने का सुअवसर मिल जाता. माँ से उन्होंने अपने लिए रोटी-सब्जी और हमदोनो, चपरासी व् ड्राईवर के लिए पराठे बनवाये. फोन कर ड्राईवर को जीप लेकर आने को कहा और आनन्-फानन इंस्पेक्शन के लिए रवाना हो गए. पिताजी जीप खुद चला रहे थे. जब जीप डैबौर डाक बंगलो पहुंची तब ड्राईवर और चपरासी को पिताजी के इरादे पर शक हुआ. पिताजी के लिखित आदेश के बावजूद माइका माफिया का अवैध खनन (माइनिंग) का काम चल रहा था. पर एक तो रात दूसरे जंगल का डर , अगर उन दोनों में से कोई भी खबरी था तो उसकी हिम्मत नहीं पड़ी.
हमलोगों ने खाना खाया और पिछवाड़े की दालान पर बिछी चौकी पर बैठ गए. चपरासी ने कहा था कि पिछवाड़े शेर और दूसरे जंगली जानवर आते है. दालान पूरी तरह ऊंचे तार के बाड़े से सुरक्षित था. एक-दो बार चपरासी हमदोनो को सोने के लिए कमरे में लिवा जाने के लिए आया भी पर हमदोनो ने कहा कि थोड़ी देर बाद हमलोग खुद आ जायेंगे. सियारों की आवाज़ तो रह-रह कर आ ही रही थीं, अब शेरों की दहाड़ गूंजने लगी थी. कभी-कभी जंगल में रौशनी की तरह जलती हुई आँखे दिखाई पड़तीं और पर हमलोग तय नहीं कर पाए कि कौन सा जानवर है. हमदोनो उसी चौकी पर कब सो गए पता ही नहीं चला. सुबह जब चपरासी हमदोनों को जगाने आया तो हमलोगों का आइसक्रीम बन चुका था. वैसी ठण्ड से फिर कभी सामना नहीं हुआ. सूर्योदय के पहले हमलोग अवैध खनन वाले खान पर पहुँच चुके थे . आधे घंटे बाद एक लिखित कागज को पिताजी ने पढ़ कर वहाँ मौजूद मुंशी को सुनाया , उसके दस्तखत लिए और जीप पर रवाना हो गए .
जब हमलोगों की जीप हाई वे के पास पहुंची तो मैंने पिताजी को बाँध के बारे में याद दिलाया . पिताजी ने जीप दाहिने मोड दी. बाँध पहुँचने  में आधा घंटा लगा. बाँध शायद शिवसागर बाँध था.वहाँ हमलोगों ने पन्द्रह मिनट बिताए.  उसके बाद एक ढाबे पर हमलोगों ने बिस्कुट और चाय ली. पिताजी को मैंने कभी भी खान मालिकों का खाना या नाश्ता स्वीकार करते नहीं देखा. बहुत आग्रह करने पर चाय पी लेते थे .
हमलोगों की जीप जैसे ही घाटी से उतर कर समतल सड़क पर आई, एक बड़ा हादसा देखने को मिला. जीप को किसी ट्रक ने बड़ी जोर का धक्का मारा था. जीप में सवार दोनों आदमिओं की घटनास्थल पर मौत हो गयी थी. पिताजी ने पास के थाने पर खबर की. उसके बाद घर पहुंचते १० बज गए. पिताजी हमलोगों को उतार कर वापिस ऑफिस चले गए.
पिताजी की रिपोर्ट पर उन्हें मंत्री ने पटना बुलाया . पिताजी जब लौट कर आये तो उनके हाथ में तबादले का आर्डर था.
अभ्रख व्यापार में बहुत पैसा था. इंस्पेक्टर काला धन बटोरते और ऊपर के लोगों को उनका हिस्सा पहुंचाते. पिताजी ये सब नहीं करते थे. साथ ही जब भी कोई बड़ा ऑफिसर या मंत्री आता तो उनकी खातिर भी उनलोगों के मन लायक नहीं करते . पटना सेक्रेटेरियट में बैठे इंडस्ट्री/माइन के सेक्रेटरी ने बड़ी इज्ज़त से तबादले का आर्डर थमाया .उन्होंने कहा की ये जगह उनके लायक नहीं थी और नयी जगह पर उन्हें १०० रुपये डेपुटेशन और ७५ रुपये प्रोजेक्ट भत्ते के रूप में अलग से मिलेंगे . गुड बाय कहते समय सेक्रेटरी ने यह भी कहा कि उस हादसे वाली जीप में आपको होना था पर आपने पहुँचने में देर कर दी.
पिताजी ने उसी महीने फरवरी में ही रांची के हैवी इंजीनियरिंग कारपोरशन ज्वाइन कर लिया. परिवार, घर मिलने के बाद अप्रैल में रांची आया.




अविस्मरणीय अनुग्रह नारायण पथ

On the streets, unrequited love and death go together almost as often as in Shakespeare.
Scott Turow
पटना स्टेशन से दो किलोमीटर पूर्व ये कदम कुआँ मोहल्ले की अग्रणी सड़क थी. इस सडक में कदम रखने के पहले चौरस्ते के उत्तर में बाकरगंज और दक्षिण में लोहानीपुर इलाका था. ये ४०० मीटर की सडक के अंत में मशहूर कांग्रेस मैदान था. जिसके बाद खादी ग्रामोद्योग का विस्तार और उसके बाद भारत के पहले राष्ट्रपति डा० राजेन्द्र प्रसाद के दो बेटों का सटा हुआ विशाल घर था. कुछ आगे बढ़ने पर स्वर्गीय जय प्रकाश नारायण का घर और सर्वोदय आश्रम था. ये सड़क बिहार स्वंतंत्रता सेनानी और पहले उप मुख्य मंत्री दिवंगत श्री अनुग्रह नारायण सिंह के नाम पर रखा गया था जिनका जुड़वा घर सड़क के अंत में दाहिनी तरफ था. पूरी सड़क मशहूर लोगों से शोभित थी.
वह चौरास्ता, जिसकी पूरब की और जाने वाली सड़क का मैं जिक्र कर रहा हूँ, भी काफी मशहूर था. पिंटू होटल का रसगुल्ला, भगवती का लेमोनेड, चाय और उसकी बिना छत वाली दूकान में गजेड़िओं की जमात,, रघुनी की सब्जियां, सीताराम की राशन की दूकान , किशोरी की पान व् भांग की गुमटी, और मन्नुलाल हलवाई की जलेबी और कचौरियां भला भुलाए भूल सकती है ? सिर्फ दो आने(१२ पैसे) में चार जलेबियां, चार सादी कचौरियां जिसके साथ जायकेदार सब्जी और कद्दू का रायता मिलता था
सड़क में कदम रखते ही बाईं तरफ लड्डू बाबु वकील का विशाल लाल घर था जहाँ उनकी डरावनी माँ हर वक्त ऊपर की खिड़की से झांकती मिलती थी .एक बार एक लड़के ने उस घर के अंदर जाकर फूल तोड़ने की हिम्मत की थी. उस महिला ने पानी पटाने वाले झरने को फेंककर उसे मारा था. उस लड़के की कोहनी लहू-लुहान हो गयी थी. उसके बाद पाटलिपुत्र हाई स्कूल के लड़कों ने घुसकर बहुत तोड़-फोड मचाया था. पुलिस नहीं आती तो मालूम नहीं क्या होता.
थोडा आगे बढ़ने पर दाहिनी तरफ का दूसरा मकान श्री लाल नारायण सिन्हा का था. वे बाद में भारत के सोलिसिटर जेनेरल हुए और उनका लड़का विजय १९५८-५९ में मुझसे ५ साल बड़े रहें होंगे. दीवाली में , वे बन्दूक की नाल पर आसमान तारा ( रॉकेट)  रखकर बुल्लेट दागते थे .आसमान तारा आसमान से बातें करता , रंग बिखेरता था.
उनसे सटा घर खान बहादुर असगर अली खान का था. विशाल मुगलिया शैली में बनी तीन मंजिला हवेली में वे और उनके रिश्तेदार ५ परिवार रहते थे. उनके घर मुर्गा पाला और खाया जाता था इसलिए हम बच्चों का वहा जाना मना था. ये हवेली ठीक हमलोगों घर के सामने थी जिसमे हमलोग किरायेदार थे . उस घर का एक लड़का आबिद मेरे साथ पढ़ता था. कंचा गोली, लट्टू, पिट्टो और खासकर पतंग बहुत अच्छी उडाता था. अब भला मेरा आना-जाना कैसे रुकता. बकरीद में बकायदे उनके घर से बकरे का गोश्त आता पेड़ के पत्तों में लिपटा कर जिसे मेरी दादी थोड़ी देर बाद हमलोगों के चपरासी इब्राहीम को दे देती.  उनलोगों ने कभी मुझे कुछ भी खिलाने-पिलाने की कोशिश नहीं की. हाँ, आबिद के चचाजान मुझसे मजाक जरूर किया करते. कहते परकाश क्या तुम डीम (अंडा) खाओगे या कहते की शामी कवाब बहुत अच्छा बना है थोड़ा चखोगे ? एक दिन उनके घर भयंकर चोरी हुई. खोजी कुत्तों को बुलाया गया था पर कुछ सुराग नहीं मिला. उसके बाद बहुत से खासकर पीछे के दरवाजों को बड़ी-बड़ी कील ठोक कर बंद कर दिया गया. हम बच्चो को इससे ये परेशानी हुई की अब हमलोगों को  हलके पाँव सामने के दरवाजे से ही ऊपर छत पर पतंग उड़ाने जाना पड़ता. १९५८ में वे सभी पूर्वी पाकिस्तान (जो अब बंगलादेश है) चले गये. आबिद कहता था की वहाँ उनलोगों की बहुत बड़ी हवेली है और बहुत जमीन है.
उसी घर के जमीनी तल्ले के आगे के हिस्से में जन संपर्क विभाग का राज्य सूचना केन्द्र खुला था. मैं वहाँ तरह-तरह की साप्ताहिक, मासिक हिंदी व् अंग्रेजी पत्रिकाएं पढ़ने हर रोज शाम को जरूर जाता था. दैनिक हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में क्रिकेट से सम्बंधित खबरे बड़े चाव से पढ़ता था. एक शाम वहाँ मशहूर रंगमंच और फिल्म के कलाकार पृथ्वी राज कपूर अपने दल के साथ आये थे. उन्होंने भाषण दिया था जिसमे ज्यादा तारीफ उनके बड़े लड़के राज कपूर की थी जो उस समय तक अपनी फिल्म “आवारा” के कारण रूस तक में लोकप्रिय हो गया था. बाद में उन्होंने एक नाटक का मंचन किया और कुछ गाने गाये. केन्द्र ने सभी क्रियाकलापों की टेप रिकॉर्डर से रिकॉर्डिंग कर सभी को सुनाया जो हमलोगों के लिए एक नया अनुभव था. केंद्र प्रत्येक शुक्रवार को १६ मिलीमीटर प्रोजेक्टर से समाचार और कभी-कभी फिल्म दिखाया करता. “हमलोग” और “जलदीप”  कई बार दिखाया गया जिसके कारण मुझे भी एक-दो बार देखने का अवसर मिला.  “हमलोग” देवानंद की पहली फिल्म थी. शाम के बाद की गतिविधि पिताजी के घर से बाहर गए रहने पर ही सक्रीय होती थी.
मेरे घर के बाएं जज मदन मोहन प्रसाद रहा करते थे जिनका लड़का क्षितीज( मुन्ना) मुझसे तीन क्लास ऊपर मेट्रिक में था. हमलोग उनकी मम्मी को मम्मी कहकर ही बुलाया करते थे. एक बार, एक मेहतरानी का ५ साल का लड़का चारदीवारी से झाँकते गुलाब के फूल को तोड़ते हुए जज के हाथों पकड़ा गया. जज ने उस लड़के को एक जोरदार चांटा मारा. लड़के ने छूटते ही माँ-बहन की गाली दे डाली. उसके बाद तो रोते हुए बच्चे के मुंह से गालियों की बौछार और जज के चप्पल की गूँज से भीड़ जमा होने लगी. लड़के की माँ जज को छू नहीं सकती थी इसलिए वह भी चिल्ला-चिल्ला कर जज को मारने से रोक रही थी. तभी मेरे घर के पिछले हिस्से में रहने वाले शीतल चाचा जिन्हें हम सभी छोटे-बड़े आदर से गांधीजी कहकर बुलाते थी वहाँ आ गए . उन्होंने जज साहब को समझाया कि उस लड़के को अपना संस्कार सुधारने में समय लगेगा पर आप तो समझदार और विद्दवान हैं. उन्होंने जज का हाथ पकड़ कर करीब-करीब घसीटते हुए वहाँ से हटा दिया. वह समय सर्विस लेट्रिन का था. सब मैला कमाने वाले धीरे-धीरे जज के घर के सामने जामा होने लगे. अंदेशा था की वे लोग मैले से भरी बाल्टियाँ जज के घर पर फेंकेंगे. मेरे पिताजी (जो उस समय पटना मुनिसिपल कोरपोरेशन के वरिष्ठ अधिकारी थे) के मध्यस्थता पर मामला शांत हुआ. तब भी दूसरे दिन तडके जज साहब के गेट के अंदर किसी ने दो बाल्टी मैला उलीच ही दिया था.
मेरे घर के पीछे के हिस्से में पहले से एक कमरे में 70 वर्षीय शीतल प्रसाद सिंह ( गाँधीजी ) रहा करते थे. उनका पोता कामेश्वर मेरे साथ पढ़ता था. सुबह पांच बजे जब कभी मैं जल्दी उठ जाता तो कामेश्वर को जाड़े की कपकपाती ठण्ड में भी नहाकर मात्र एक पतला गमछा लपेट कर चौकी पर खड़े होकर पूर्व की तरफ हाथ जोड़े गायत्री मन्त्र का पाठ पढते पाता. जब परीक्षाफल निकला और मै पास हो गया तो मेरे घर सब बहुत खुश थे. शाम को जब खेल के घर लौटा तो देखा की कामेश्वर अपने बाबा के हाथों पिट रहा था . मालूम हुआ उसे हिसाब में 100 में 96 अंक मिले हैं. मुझे मात्र ४१ मिले थे. गांधीजी केवल शाम को जलती लकड़ी पर मोटी रोटियां और अरहर की गाढ़ी दाल बनाते. दाल में नमक नहीं डालते क्योंकि उन्हें गंभीर हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत थी. हम सभी बच्चे हर शाम उनसे आधी-आधी रोटी और उसपर एक चम्मच दाल की अपेक्षा रखते.  बहुत बाद में 1988 में जिस 20000 कामगारों वाले कारखाने में मै उस समय मैनेजर था वहीं कामेश्वर किसी कोने में टाइम कीपर क्लर्क था. बचपन में जिसे भगवान श्री राम की भूमिका मिलती थी आज वही बुरे व्यसन से लिप्त था.
सबसे जानदार घर मेरे घर से बायीं तरफ तीसरा, मशहूर वकील श्री अवधेश नंदन सहाय का हुआ करता था. 15-20 कमरों वाले घर में उनके बड़े भाई, तीन बेटे और एक बेटी पूरे परिवार के साथ रहते थे. कम से कम 35-40 जन रहते होंगे. उनकी खाँसने की आवाज़ 150 मीटर दूर मेरे घर तक आती थी. बहुत बाद में जब मैंने फिल्म कलाकार हरिन्द्र नाथ चट्टोपाध्याय को देखा तो एकदम लगा की उनकी शक्ल वकील नाना से मिलती है. उनका नाती और  मेरा दोस्त बसंत मेरी क्लास में पढ़ता था. कहा जाता था की आसाम से जब किसी केस को जीत कर आये थे तब दो बड़े बक्से में नोटों का बंडल भरकर साथ लाए थे. उस समय का सबसे दामी सिगरेट मैक्रोपोलो पर उनका नाम प्रिंटेड रहता था. वे चेन स्मोकर थे. उनका बेटा रमेश बिहार बैडमिंटन का चैम्पियन था. बसंत की नानी जिनका नाम श्रीमती सावित्री देवी था, जयप्रकाश नारायण के बहुचर्चित और बिनोवा भावे द्वारा गठित सर्वोदय आश्रम की संचालिका थीं. जयप्रकाश जी जब भी पटना आते तो वे सहाय साहब के घर ही ठहरते. एक बार जब जयप्रकाश जी का काफिला आया था तब इनके घर मुर्गों की चीख-पुकार से माहोल गरमा गया था.
इनके घर एक बार बहुत रोने की आवाज़ आई. मालूम हुआ की उनके बड़े भाई का देहांत हो गया है. उनके तीन लड़के हरीश, सत्येन्द्र और वीरेंद्र क्रमशः अजय भैया , मेरे व् मेरे छोटे भाई मनोज के साथ पढते थे. कुछ दिनों बाद तीनों लड़के न तो खेल के मैदान में दीखते और न तो स्कूल में. सहाय साहब ने अपने बड़े भाई के परिवार को अपने घर से हटा दिया था. कुछ दिनों के बाद, जब एक दिन मेरे घर की नौकरानी नहीं आई तो माँ ने मुझे उसके घर जानकारी लेने को भेजा. उसी नौकरानी की गली में मुझे सत्येन्द्र दिखा. रोकर उसने बताया की वह उसी गली में एक झोपड़ी में रहता है. पढ़ना तो दूर खाने के लिए घर में कुछ भी नहीं था और बनिए ने भी उधार देना बंद कर दिया था. मैंने ये सब बातें घर लौटकर माँ को बतायीं. उस दिन से समय-समय पर जो बन पड़ता उतना चावल और दाल माँ हमलोगों के हाथ या नौकरानी के द्वारा भेजती रहती थी. कुछ महीनों बाद पिताजी का तबादला झुमरी तिलैया हो गया. १९७८ में हरीश रांची से ४० किलोमीटर दूर एक कार गैरेज में काम करता मिला. उससे मालूम हुआ की रांची में ही सत्येन्द्र सिनेमा के टिकेट ब्लैक में बेचते समय छुरे से मार डाला गया.
सहाय साहब के बाएं अलंकार ज्वेलर्स का घर था  जिनकी अब भारत में कईं जगह आउटलेट्स हैं. सामने तत्कालीन एडवोकेट जेनेरल श्री महावीर प्रसाद रहते थे. हमलोगों का मोहल्ले का रिंग लीडर गौरीशंकर का विशाल घर उनसे सटा हुआ था. एक सुबह हमारी सड़क पर घोड़ागाड़ी ( विक्टोरिया) आई. घोड़े की टाप हम सभी भाइयों को गेट के बाहर ले आई. वह विक्टोरिया गौरी के घर के अंदर चली गयी. कुछ देर बाद जब वह लौटी तो साईस की बगल में गौरी कि बूढी दादी बैठी थीं और पीछे हूड पर सफेद कपडे में आदमकद कुछ लिपटा पड़ा था. सभी लोग सड़क पर निकल कर उस विक्टोरिया को सहमे हुए देख रहे थे. उस दिन मुझे एक ट्रेजिक लव स्टोरी के बारे में मालूम हुआ. गौरी के सबसे छोटे चाचा विलायत से एम्०एस० पास करके जब लौटे तो उन्हें मालूम हुआ कि महावीर प्रसाद की लड़की की उनसे छिपाकर शादी कर दी गयी है. उन्होंने रात को जहर खा लिया था. घर में कोई सयाना नहीं था इसलिए दादी ही लाश को पोस्टमोर्टेम के लिए ले जा रही थीं. 
उस शादी का ज़िक्र हमलोग करते रहते थे क्योंकि शादी बड़ी धूमधाम से की गयी थी. बरात के आगे सजे हाथी, बारात के आगे और पीछे पटना का सबसे मशहूर मिलिटरी बैंड और मूसा बैंड. हवाई जहाज से फूलों की बरसात. आतिशबाजी जो खत्म होने का नाम ही नहीं लेती थी.
सबसे यादगार बारातें डा० राजेन्द्र प्रसाद की दो पोतियों की दिखी थी. करीब आधा मील लंबी बारात जिसमे पांच हाथी आगे और उनके बीच में तीन ऊँट . तीन-तीन बैंड जिसमे तीसरा पंजाब बैंड था. राष्ट्रपति का काफिला जिसे ऊंचे-ऊंचे घोड़े सजे हुए सवारों के साथ लंबी शेवरलेट गाडी को घेरे झंडों को हाथ में लिए चल रहे थे. राष्ट्रपति स्वयं बारात की आगवानी हमारी सड़क के एंट्री पॉइंट से कर रहे थे.
एक और शादी का ज़िक्र मैं करूँगा. आबिद के घर के बाएं बगल का घर हमेशा खाली ही रहता था. निगरानी के लिए एक गोविन्द नाम का नौकर रख छोड़ा था. उस घर में अमरुद के पेड़ थे इसलिए हमलोगों ने गोविन्द से दोस्ती गाँठ ली थी. वह बंगाली था और जब कभी मूड में होता था तो बहुत अच्छे-अच्छे चुटकले, कहानियां और जानवरों की आवाजें सुनाता था. वह बाउल गीत(बंगाल का लोकप्रिय लोकगीत) भी बहुत सुरीली आवाज़ में गाता था. एक दिन दोपहर को उस घर के पिछवाड़े बहुत हंगामा होने लगा. हमलोगों को लगा कि बच्चों का कोई बाहरी झुण्ड अमरुद तोड़ते पकड़ाया है. जब हमलोग पिछवाड़े पंहुचे तो देखा के गोविन्द को बहुत से औरत-मर्द घेर कर बहस कर रहे हैं. ज्यादातर लोग गन्दी गालिया दे रहे थे और गोविन्द के साथ धक्का-मुक्की कर रहे थे. भीड़ डोमों की थी. बीडी पीने की बहुत बुरी गंध आ रही थी. तभी एक काली पर बहुत सुंदर लड़की बीडी पीते हुए पिछवाड़े के दरवाजे से बाहर निकली. उसके दांत चोकोलेटी काले. वह तीन दिनों से घर से भागकर गोविन्द के साथ रह रही थी. बड़े जनों ने हम बच्चों को वहाँ से भगा दिया. देर रात तक उस घर से हँसने-गाने की आवाज़ आती रही. सुबह मालूम हुआ. दोनों की शादी कर दी गयी थी.
लिखने और बताने को तो और भी बहुत कुछ है. पर सुनने और पढ़ने वाले को आज के टाइम मैनेजमेंट में समय कहाँ है. अंत में मैं कांग्रेस मैदान का जिक्र इसलिए करूँगा क्योंकि वहाँ शाम को संघ के राजेंद्र सिंह जी आते थे और एक घंटे खेलते-खिलाते थे. संस्कृत का श्लोक याद कराया जाता . अन्ताक्षणी  और रूमाल-चोर जैसे रोचक खेल उन्होंने ही सिखाए. उनके ओजपूर्ण व्यक्तित्व से मैं बहुत प्रभावित हुआ था.

खेल की दुनिया


 We don't stop playing because we grow old; we grow old because we stop playing.
George Bernard Shaw
 मशहूर बैरिस्टर श्री राधा रमण प्रसाद का बंगला जिसका पूर्वी हिस्सा लान टेनिस के मैदान जितना बड़ा, स्कूल खत्म होते ही बच्चों से भर जाता था. ८ वर्ष से १२ वर्ष के बच्चे गर्मी में फुटबाल , जाड़े के दिनों में क्रिकेट खेला करते. जब कभी घर की खिड़की का शीशा टूटता या किसी बुजर्ग को चोट लग जाती तो पूरी जमात सामने के घर शिफ्ट कर जाती जिसमे हमलोगों का बॉस सहपाठी गौरी शंकर लाला(उम्र १४, कद ५ फीट ५ इंच) रहता था. उसको हमलोगों की जमात में आने के लिए दो-तीन बार फेल होना पड़ा होगा.
गौरी बड़े लड़कों के ग्रुप का सरगना था जिसमे मेरे बड़े भाई, मोहन जो अब अलंकार ज्वेलर ग्रुप का मालिक है, तथा रमेश, हरीश इत्यादि थे. हम छोटों के ग्रुप का लीडर अनिल था जिसमे हमलोग सभी एक क्लास में हमउम्र थे, जैसे बसंत, गोपाल, अशोक, सत्येन्द्र, रमेश, अमर, मदन,  .
गर्मी की छुट्टियों में हमलोगों का जमावड़ा सुबह से ही शुरू हो जाता. हमलोगों की दिनचर्या हमलोगों के पिताजी तय करते. जितनी देर वे लोग अपने-अपने काम पर निकले होते उतना समय हमारे खेलने का होता. गर्मी में ऑफिस सुबह का होता इसलिए सुबह ६ बजे से २ बजे दोपहर तक की तो पूरी आज़ादी थी. उसके बाद चार बजे शाम से लेकर ७ बजे अँधेरा होने तक हमलोगों का मान्य खेलने का समय होता. इस आज़ादी का असर हमारी पढाई पर अवश्य पड़ता था. विशेषकर हमारे घर में माँ को चूल्हे-चौके से ही फुर्सत नहीं मिलती और हमलोगों की शरारतों से छुटकारा उसे कुछ राहत तो अवश्य देती.
हमलोगों का प्रिय खेल क्रिकेट था. हमलोगों ने बढ़ई से एक कामचलाऊ बैट बनवाया था. खेला हुआ टेनिस का बाल ५० पैसे में मिल जाता था जो एक महीने चलता था. विकेट ईंटों को एक के ऊपर एक रखकर बनती थीं. लेग साइड सड़क को रखा जाता था जिससे तेज मारी हुई गेंद दूर तक जाये और इसमें घर के शीशों के टूटने का डर भी कम रहता था. मेरी उम्र के लड़के को अंडर-हैंड बालिंग की सहूलियत मिलती थी. विकेट टू विकेट १५ गज के फासले से काम चला लिया जाता था. बाद में शायद एक साल बाद हमलोगों ने बढ़ई से चार स्टैंडर्ड साईज के विकेट बनवा लिए थे. जब कभी शीशा टूटने या हल्ला ज्यादा होने की वज़ह से क्रिकेट खेलने की मनाही हो जाती तो हमलोग कोई दूसरा खेल खेलते.
आस-पास हमलोगों का दूसरा सबसे प्रिय खेल था. इसे साल के किसी भी दिन और दिन के किसी भी समय खेला जा सकता था. हल्ला भी कम होता था. सबसे ज्यादा रोमांच खेल में दिलेरी दिखाने में था. खतरनाक जगहों में छिपना, ऊंचाई से कूदना, बिल्ली जैसे धीमे पाँव से तेज पर बिना आवाज़ के पीछा करना, बाज़ कि तरह झपट्टा मारना और बड़े ताकतवर विरोधी को पानी पिलाना इस खेल को बहुत चुनौती भरा बना देता था. इस खेल में मुझे बहुत शाबाशी मिलती थी. पर बुजुर्गों से नहीं. उन्हें मालूम पड़ गया था की जो लड़कों में सबसे छोटा है वही सबसे बदमाश है . कार के बोनेट में भी छिप जता हैं और भूतहे तहखाने का रास्ता भी उसी ने दिखाया था. कुछ तो मुझे बदमाश प्रकाश भी कहते थे. आज भी दादा-नाना हो गए मेरे साथी अपने घर के बच्चों को आस-पास की कहानियाँ सुनाया करते हैं जिसका नायक स्वत मैं ही होता हूँ. कुछ ने तो मेरे बचपन का फोटो भी मांगा है, दिखाने के लिए.
फुटबाल खेलने का मौसम गर्मी में आता .गर्मी में हमलोगों को गर्म हवा से बचाव के लिए केवल शाम को ही निकलने दिया जाता था . उतने कम समय में फुटबाल खेलने में पूरा आनंद आ जाता. और अगर पानी भी बरसता हो तो सोने पे सुहागा.
गर्मी से एक और बात याद आई. सुबह का स्कूल हुआ करता और हमलोगों के लौटने के रास्ते की लम्बाई बढ़ जाती. हमलोग गंगा नदी में भरपूर नहा कर ही लौटते. लौटते वक्त घाट के किनारे रिक्शावाले और ठेलेवाले झोपरीनुमा ढाबे में जमीन पर बैठ कर सत्तू ( भुने हुए चने का आटा) खाते दीखते. उस समय तक हमलोगों को भी बड़े जोर कि भूख  लगी होती.  मुंह से लार टपकने लगती. मालूम हुआ दो आने थाली मिलती है पर हम बच्चो को एक आने (६ पैसे) वाली थाली से हो जायेगा. दूसरे दिन हम सभी पैसे लेकर आये. गंगा में नहाकर सत्तू खाने लाइन से बैठ गए. पीतल की एक फुटिया थाली के बीच में सत्तू का पहाड. हाँ उसे सत्तू का पहाड ही कहा जायेगा. आधा किलो सत्तू , नमक, पांच-छ लंबी हरी मिर्च,सरसों तेल की डिबिया, निम्बू और एक लोटा पानी. हम पांच जनों में किसी ने ही १०० ग्राम खाया होगा. सत्तू परोसने वाली माई हमलोगों पर बहुत नाराज हुई क्योंकि हमलोगों ने उम्र के हिसाब से बहुत कम खाया था और बहुत झूठा कर छोड़ दिया था. बाद में, हम लोगों ने लौटने का रास्ता ही बदल दिया क्योंकि वह माई जब भी हमलोगों को देखती वह खानेवालो को हमलोगों की तरफ इशारा करके हसती. आजकल सत्तू ५० रुपये किलो मिलता है.
एक खेल हमें और अच्छा लगता था . दोल-पात जिसमे एक डंडे को दूर फेंका जाता है और जब तक उसे लाया जाता है बाकि लड़के पेड़ पर चढ जाया करते हैं. चोर को किसी एक को छूकर डंडे तक पहले पहुचना होता है. इसे, गिल्ली-डंडा और लट्टू को हमलोग तब खेलते थे जब सभी विकल्प किसी वजह से या मन भर जाने से खत्म हो जाते थे.
जब शराराती बच्चों के पास इतना वक्त हो तो क्या नहीं खेला या शौक पूरा नहीं किया जा सकता? आजकल के बच्चे जो शरारत के नाम पर आड़ी-तिरछी तेज रफ़्तार से बाइक चलाते हैं या स्कूली दिनों में ही सिगरेट पीने लगते हैं और गर्ल फ्रेंड की बातें करते हैं उनसे मैं कभी-कभी पूछता हूँ कि क्या वे कभी पेड़ पर चढें है अथवा २० फीट की ऊंचाईं से नदी या पोखर में कूदे हैं. गिल्ली-डंडा का खेल खेलते तो मैंने केवल पुणे के मुसलमानी मोहल्ले में देखा है. दोल-पात, आस-पास, लट्टू, चोर-सिपाही, कैरम बोर्ड- लूडो जैसे मजेदार खेल तो हमारी धरती से ऐसे लुप्त हो रहे हैं जैसे पक्की छत हो जाने पर गोरैया या शहर से खेलने के मैदान. इसके लिए मीडिया शायद सबसे बड़ी दोषी है. मैंने ७० के दशक में एक किताब पढ़ी थी “ SPACE ODESSEY -2001”. उसमे अंत में यह लिखा गया था की दिमाग से ज्यादा और शरीर से नहीं के बराबर काम करने के चलते आने वाली पीढ़ी का सर बड़ा और कद छोटा होता चला जायेगा. हमारे पूर्वज सात-आठ फीट के हुआ करते थे. राणा प्रताप का ८० किलो का भाला और १२ फीट लंबी लोहे की अचकन ग्वालियर के अजायबघर में रखी है.
1959 आते-आते हम लोग बकायदा मानक बैट और बाल से पैड और ग्लोव्स पहन कर २२ गज के स्ट्रिप पर क्रिकेट खेलने लगे थे. अजय भैया, गौरी और अनिल का स्कूल की टीम में सेलेक्शन हो गया था. मैं अपने क्लास से खेलता था. पर तेज आती हुई क्रिकेट की बाल की फील्डिंग से घबराता था. कितनी बार मुझे गेंद के पीछे भागते रहने और गेंद को नहीं पकडने के लिए फटकार मिली थी. तब टेस्ट मैच मानक का पांच सितारा क्रिकेट बाल ३ रुपये पच्चीस पैसे में आता था और अच्छे से अच्छा बैट ५०-८० तक में मिल जाता था. हमलोग २५ रुपये वाले बैट से खेलते थे.
१९५९ के अक्टूबर माह में पिताजी का तबादला झुमरी तिलैया हो गया. ये एक कस्बाई जगह थी , पटना से बहुत छोटी. खेलने के मैदान के नाम पर हमारे स्कूल का फुटबाल का मैदान था जहाँ लायंस क्लब के कुछ मेम्बर रविवार को क्रिकेट खेला करते. खेलने वाले ६-७ जन ही थे इसलिए हमलोगों को उनलोगों ने हाथो-हाथ लिया. हम भाईयों का खेल देखकर वे दंग रह गए. अगर उस वक्त कोई समाचार पत्र का रिपोर्टर होता तो उसमे हम बच्चों के खेल की तारीफ जरूर छपती.