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Thursday, May 13, 2021

क्रिकेट – 2 : (1958-1968)

१० वर्ष की उम्र पार करते-करते पटना के कदम कुआँ इलाके का एक विसश्विनीय क्रिकेट खिलाडी हो गया था.जिसे अब गली क्रिकेट कहा जाता है उसमें मेरा नाम होने लगा था. हमलोग कहीं भी खेल लेते. चाहे घर का कोर्टयार्ड हो अथवा गलियारा या खाली सड़क. २२ गज की जगह १६-१८ गज का पिच और टेनिस का बाल. पहले तो हमलोग लोकल बढ़ई के बनाये बल्ले और विकेट से खेलते थे. बाद में अलंकार ज्वेलर के मालिक का लड़का मोहन एक ५ नंबर का असली क्रिकेट बैट ले आया. मैं उससे स्ट्रैट ड्राइव, कट और ग्लांस तो कर लेता था पर भारी होने के कारण पुल या हुक शॉट नही लगा पाता. मैं कद काठी से बहुत ही गरीब था : पौने पांच फीट की ऊंचाई और वजन मात्र ३० किलो. इसी कारण, जब २२ गज के स्टैण्डर्ड पिच पर क्रिकेट बाल से खेलने की बारी आयी तो मैं बुरी तरह पिछड़ गया. क्लास की टीम से उभर कर मैं कभी भी स्कूल या कॉलेज की टीम का सदस्य नहीं बन पाया. बाद में हमलोग गाँधी मैदान में भी खेलने लगे. वहां बेशुमार टोलियाँ क्रिकेट खेलती थीं. कभी एक टीम का बाल दूसरा उठा लेता तो कभी टोली का एक लड़का झगड़ा कर दूसरी टोली से खेलने लगता. सबसे मजेदार तो तब हुआ जब बॉलर ने अपने पिच पर बोलिंग करने के बजाय दूसरे के पिच पर बोलिंग कर दी. 

१९५९ में झुमरी तिलैया आने के बाद शहर के एकमात्र स्कूल सेठ छोटूराम होरिलराम हाई स्कूल की टीम में मेरे बड़े भाई तो तुरंत चुन लिए गए लेकिन मुझे एक्स्ट्रा में जगह मिली. उस समय क्रिकेट सर्दिओं में ही खेला जाता था. एक दिन मालूम हुआ की गर्मी की छुट्टी में भी स्कूल के मैदान में रविवार को सुबह ७ से १० बजे तक लायंस क्लब के मेम्बर पूरे किट के साथ क्रिकेट खेलते हैं. सभी खेलने वाले सफेद शर्ट-पैंट में आते हैं और क्रिकेट शू या कैनवास के सफ़ेद जूते पहनते हैं. हम दोनों भाई भी तैयार होकर पहुंचे. देखा ८-१० कार लगीं थी. मैट पर खेल हो रहा था. सबसे वरिष्ष्ठ ५० वर्षीया चोपड़ा थे और सबसे कमउम्र २५ वर्षीय लड्डू थे. बाएं हाथ के तेज गेंदबाज लड्डू की अगर अभी के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों से तुलना की जाये तो वासिम अकरम का चेहरा सामने आता है. उनके पास कायदे का विकेट कीपर नहीं था. अजय भईया को तुरंत कीपिंग में रख लिया गया. वे पटना कॉलेजिएट स्कूल से खेल कर आये थे. वरिष्ठ चोपड़ा साहब स्लिप में फील्डिंग करते वक्त अपनी जगह से हिलते भी न थे. दूसरे रविवार को मुझे भी मौक़ा मिल गया. पहले चोपड़ा साहब से छूटी गेंद को रोकने के लिए और बाद में मुझे पूरी तरह शामिल कर लिया गया. ये सभी लायंस करोडपति माइका मर्चेंट थे. सभी शालीन बस एक को छोड़कर. वह था मुख्य मंत्री के०बी०सहांय का लड़का. २० किलोमीटर दूर हजारीबाग की तरफ से जीप पर आता. बोनट पर बैठ मैच देखता,कुछ पीता रहता और हल्ला करता.

१९६० के दशक में क्रिकेट मेरा और समूचे भारत का सबसे लोकप्रिय खेल होता जा रहा था. कॉलेज की पढाई १९६१ में रांची कॉलेज से शुरू हुई. डोरंडा के जिस इलाके में मैं रहता था वहां बंगाली समुदाय की अधिकता थी. फ़ुटबाल ही लोकप्रिय था. यहाँ भी मैंने टेनिस बाल से शुरुआत की और बहुत जल्दी ही क्रिकेट बाल से खेल होने लगा. जाहिर है की आस-पड़ोस की ४-५ टीमों में हमारी टीम का ही दबदबा रहता. ऊंची क्लास में पढने और क्रिकेट की शुरुआत करने की वजह से मैं निर्विवाद कप्तान चुन लिया गया. हमारी टीम का सबसे अच्छा तेज़ बॉलर रणधीर वर्मा था ; वही जो बाद में DSP धनबाद हुआ जहाँ वह बैंक रॉबरी में मुकाबला करते शहीद हो गया.

हमलोग जेंटलमैन क्रिकेट कतई नहीं खेलते थे. हारने वाली टीम अवश्य बदमाशी करती थी. विकेट की डंडी उखाड़कर लड़ने तक को तैयार रहती. अंपायर हमेशा बल्लेबाजी करने वाली टीम का होता, जो LBW देने के के बजाय बाल को ही “नो- बाल” करार कर देता. रन आउट तभी देता जब छोटी सी दर्शक दीर्घा रन आउट चिल्लाने लगती अथवा  खिलाड़ी वाक-आउट करने लगते. आजकल तो नो बाल होने के ३-४ कारण ही होते हैं . उस समय अनगिनत कारण होते. उसमें से एक कारण याद आ रहा है. अंपायर का रेडी न रहना. अंपायर को ही रन तालिका का रजिस्टर भरना होता था. उस ज़माने में किसी भी टीम के पास मात्र 2 पैड होते. बल्लेबाजी के समय दोनों बल्लेबाज अपने सामने वाले पैर में बांधते. जी हाँ, कभी-कभी रस्सी से भी बांधते. गेंदबाजी करते समय वही पैड विकेटकीपिंग के काम आता. टीम बिरलें ही अपना कोई सामान सांझा करतीं. लेगगार्ड और एब्डोमिनल गार्ड का नाम भर सुना था. तब मैच ९ बजे सुबह शुरू होता और १ बजते ख़त्म हो जाता. नो लंच ब्रेक. हमलोग नजदीक के नल या कूएँ से पानी पीते.
अब हमलोग टेस्ट मैच का पूरा आनंद रेडियो या ट्रांजिस्टर पर कमेंटरी सुनकर उठाने लगे थे. कमेंटरी अंग्रेजी में ही आती थी. राजकुमार  विजयनगरम उर्फ़ विज्जी की कमेंटरी कहने का तरीका अभी तक याद है. वे कमेंटरी कहते-कहते पुराने दिनों की याद में खो जाते थे. एक बार वे नवाब ऑफ़ पटौदी सीनियर और उनकी बेगम का जिक्र कर रहे थे जिनसे हम जैसे श्रोताओं को रत्तीभर भी मतलब नहीं था. १० मिनट के बाद विज्जी ने कहा की इसी बीच मांजरेकर  १2 रन बनाकर रन आउट होकर चले गए हैं और नाडकर्णी पिच पर खेलने आये हैं.  
 

हमलोगों की जोरदार टक्कर HSL कॉलोनी की टीम से होती थी जिसका कप्तान डॉ० रोशन लाल का लड़का नरेन् हुआ करता था. बाद में HSL कॉलोनी, SAIL/MECON कॉलोनी हो गयी. जिस मैदान में हमलोग खेलते थे उसे एक बड़ा स्टेडियम बना दिया गया. इसी स्टेडियम में खेलते हुए महेंद्र सिंह धोनी से माही हो गया. १९६६ में हमलोग शहर के दक्षिण-पूरब कोने में विकसित होते HEC कॉलोनी में आ गए.

१९६६ में हेम दोनों भाई पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे थे. सिर्फ १ घंटा समय मिलता था शाम को. सरकारी बंगले के २०/१० मीटर के कोर्टयार्ड में घमासान क्रिकेट हुआ करता था. बल्ला स्टैण्डर्ड, बाल टेनिस का और विकेट की जगह एक १५ किलो का पत्थर का स्लैब. एक विशेष नियम यह था की ऑफ साइड पर शीशे की खिड़की पर लगने पर आउट करार दिया जाता था. आसपास के सभी उम्र के १०-१५ बच्चे जमा हो जाते थे. अक्सर झगडा भी होता था. कभी टीम सिलेक्शन को लेकर तो कभी LBW/रन आउट को लेकर. सबसे ज्यादा घमासान तब होता था जब बाल स्लैब को छूकर निकल जाती थी. तब फैसला बालकनी में बैठे अभिभावक करते थे. मेरे बड़े भाई का हुक शॉट कमाल का होता था. मैं आउट स्विंगर बहुत सटीक डालता था और १० वर्ष का सुबीर महंती ऑफ ब्रेक. रविवार को खेल दो पारिओं का होता था. उस दिन मूर्ति और गुप्ता अंकल भी जोर-आजमाईश करने आ जाते थे. मेरे सबसे बड़े भाई भी मेडिकल कॉलेज से आ जाते थे. उनका कवर और स्ट्रेट  ड्राइव देखने लायक होता था. कवर पर शीशे की खिड़की होने के कारण हमलोग कवर ड्राइव का भरपूर आनंद नहीं उठा पाते थे. हमलोगों की तकरार टेस्ट क्रिकेटर को लेकर भी होती थी. बड़े भाई के पसंदीदा खिलाड़ी पटौदी थे जबकि मेरे चंदू बोर्डे.

१९६७ के भयावह दंगे में बहुत-कुछ प्रभावित हुआ. १५ दिन बाद दंगे शांत होने के बाद भी कोई घर से बाहर नहीं निकलता था. तब मूर्ती और यादव अंकल ने मोहल्ले के लड़कों को आवाज लगाई. हमलोग भी बहुत बैचेनी से दिन काट रहे थे. कॉलोनी के मैदान में विकेट गाड़ी गयी. हमलोग के साथ बुजुर्ग भी या तो खेलने लगे अथवा परिवार के साथ खेल देखने लगे. अच्छी-खासी दर्शक दीर्घा के कारण खेल का बहुत आनंद आ रहा था. क्रिकेट के चलते दूसरे दिन से HEC Township में प्रायः स्थिति सामान्य हो गयी. लोकल समाचार पत्रों में ये खबर सुर्खिओं में  आयी.

पूर्णरूपेण क्रिकेटर बन पाने का अवसर १९६९ में नौकरी के बाद लगा.

क्रमशः ......क्रिकेट -३ 

Thursday, October 4, 2018

गणेश पाठशाला


1950 के दशक मे कदमकुआं पटना शहर की धड़कन हुआ करता था  । पूरब में उभरता हुआ राजेंद्र नगर, पश्चिम दिशा में पिरमुहानी जो रेलवे स्टेशन के रास्ते को ठीक आधे मे बांटती थी, उत्तर में बाकरगंज और दरियागंज तक और दक्षिण मे लोहानीपुर तक । अगर ये सब भी कदमकुआं के अंदर थे तो मुझे इसका ज्ञान नहीं था । कदमकुआं और लोहानीपुर को बाटने वाली सड़क जिसे अब जस्टिस राजकिशोर पथ के नाम से जाना जाता है उसके ठीक मध्य मे गणेश पाठशाला थी । यहाँ सातवी तक की पढ़ाई होती थी । सरकारी स्कूल जैसे पटना हाई स्कूल और पटना कोलेजियट स्कूल जहां सातवी से पढ़ाई शुरू होती थी उसमें एड्मिशन के लिए गणेश पाठशाला मुनासिब तैयारी करा देता था । यह एकमात्र स्कूल था जहां इंग्लिश की पढ़ाई कक्षा 1 से आरंभ हो जाती थी । इस स्कूल की सबसे बड़ी खूबी यह थी की मात्र 6 महीने मे फ़ाइनल परीक्षा लेकर प्रोमोट कर दिया जाता था । इस कारण यह स्कूल बहुत लोकप्रिय था । गणेश पाठशाला मे लड़के-लड़कियां दोनों पढ़ते थे ।
मेरे बड़े भाई का एक वर्ष पहले 1952 4थी कक्षा मे दाखिला हुआ था । वह मुझसे दो वर्ष ही बड़े थे पर दादाजी उन्हे बहुत प्यार से पढ़ाते थे । अव्वल कारण था कि बड़े भाई का नाक-नक्शा दादाजी से बहुत मिलता था । उन्ही के जैसा बड़ा माथा और बड़ा चेहरा ।
एक सुबह, दादाजी , बड़े भाई को छत के कोने मे, भरसक छिपकर पढ़ा रहे थे । वह नहीं चाहते थे कि मै विघ्न डालूँ । पिताजी किसी कारण से छत पर गए । पिताजी ने दादाजी से आग्रह किया की मुझे भी पढ़ाया करें । अगर हो सके तो मेरा भी दाखिला स्कूल मे करा दें । 3 दिन बाद सोमवार की सुबह साफ-धुले कपड़े पहन कर दस बजे तैयार रहने के लिए मुझे हिदायत दी गई । दादाजी ने एक किताब भी दी तैयारी करने के लिए । मैंने जितना हो सका पढ़ा और याद रखने का प्रयत्न किया ।  
हर दिन सुबह मुझे दादी और माँ मिलकर मुझे तैयार करने लगीं । उस किताब से जगह-जगह से सवाल पूछे । सोमवार को ठीक दस बजे, दादाजी अपने कमरे से बाहर आए । क्या व्यक्तित्व था ? छरहरे, लंबे, काली अचकन-शेरवानी, चूडीदार सफ़ेद पाजामा और सर पर एक काली टोपी भी थी । रास्ते भर मुझसे सवाल पूछते  । जिसका जवाब नहीं आता था, वह बताते भी गए ।
हेडमास्टर जमीन पर बिछी दरी पर बैठे थे । उनके सामने एक मुनीम वाला डेस्क रखा था । मुझे अभी तक याद है, हेडमास्टर दादाजी को देखते ही उठ खड़े हुए थे । अभिवादन का आदान-प्रदान इंग्लिश मे हुआ । हेडमास्टर के दाहिने तरफ दादाजी बैठे । मुझे सामने बैठने को कहा गया । मेरा परिचय जैसे की मेरा नाम, पिताजी का नाम और मेरी जन्मतिथि इंग्लिश में पूछा गया । 7 का टेबल पढ़ने को कहा गया । भूगोल के प्रश्नों में मैं कच्चा निकला । मुझे खड़ा कर हेडमास्टर मुझे देखने लगे । उन्होने कहा –“यह बालक तो कक्षा 2 के लायक है पर बहुत छोटा दिखता है और बोली भी बिलकुल बच्चों जैसी है । विद्यार्थी इसे तंग कर सकते हैं । मैं इसका दाखिला शिशु(KG) मे करूंगा और बहुत जल्दी ही प्रोमोट कर दूँगा । इसके बाद मेरा पूरा नाम पूछा गया । मैंने प्रकाश सिंह कहा । दादाजी ने सुधार कर प्रकाश नारायण सिंह लिखवाया । उनका नाम रामानुग्रह नारायण सिंह था । उसके बाद सिर्फ मेरे नाम के साथ ही नारायण जुड़ा  । दाखिले की फीस 1 रुपया दादाजी ने चाँदी के सिक्के से दिया ।
गणेश पाठशाला सात कमरों का आयताकार मकान था । यह भवन बैरिस्टर राज किशोर प्रसाद का था । इसके साथ बाई तरफ जुड़े मकान में स्वयम मकान मालिक रहते थे। क्लास रूम मे जाने के लिए एक पतला बरामादा था । हेडमास्टर का कमरा आगे की तरफ था जिसका दूसरा दरवाजा अंदर बरामदे की तरफ था । बीच में एक बड़ा आँगन था  । दक्षिण-पश्चिम कोने पर टॉइलेट था । पश्चिम छोर में टिफ़िन रखने और खाने की जगह थी ।
तो सबसे पहले टिफ़िन की बात की जाए । पहले ही दिन वहाँ दो लड़कों को लड़ाई करते देखा । मालूम पड़ा एक दूसरे का टिफ़िन खाकर खाली बॉक्स दूसरे शेल्फ पर रख देता था । बाद में ये वाकया बहुत बार देखने को मिला । एक लड़का, सत्येन्द्र अपना टिफ़िन कागज में लपेटकर पैंट की जेब में रख कर लाता था । वह गरीब था । उसके पास न तो टिफ़िन बॉक्स था और न दिखाने लायक खाना । वह रोटी में सब्जी लपेट कर लाता था । ज़्यादातर बच्चे परोठे, अंडे और मिठाई लाते थे । किसी न सत्येन्द्र पर फब्तियाँ कस दी । अब क्या था ? सत्येंद्र ने ऐसा जोरदार हल्ला मचाया कि शिक्षकों को आना पड़ा शांत करने के लिए ।
मालूम नहीं, सभी को स्कूल आने के बाद ही टॉइलेट की जरूरत क्यों पड़ जाती थी । आने-जाने का सिलसिला दिनभर चलता रहता था । सभी कमरों का दरवाजा आँगन की तरफ खुलता था । इसलिए जाने-अनजाने सभी की निगाहें आँगन की चहलकदमी पर चली जाती थी ।  एक दिन मेरे दोस्त सुनील को भी जरूरत महसूस हुई । वह शिक्षक से अनुमति लेकर बीच आँगन में खड़ा हो गया । वहाँ उसने एक-एक कर सभी कपड़े उतारे और नंग-ध्रङ्ग , इठलाते हुए टॉइलेट की तरफ बढ़ गया । क्लास में लड़कियों को आगे की पंक्ति में बिठाया जाता था, एकदम दरवाजे के सामने । अब जो खिलखिलाहट शुरू हुई वह जैसे ही रुकने को हुई सुनील ने टॉइलेट से लौट कर एक-एक कर कपड़े पहनना शुरू कर दिया । खिलखिलाहट ने फिर ज़ोर पकड़ लिया । इस तरह के ध्यानकर्षण के लिए लड़कों को एक अच्छा बहाना मिल गया  । उसके बाद तो लड़कों को लाइन लग गई । दूसरा आया । उसने भी उसी तरह बीच आँगन में कपड़े उतारे और पहने ।  तीसरे ने भी नकल की । पाठशाला में शोरगुल इस कदर बढ़ा की हेडमास्टर को स्वयम आना पड़ा अनुशासन बहाल करने के लिए  
कक्षा 1 तक चटाई पर बैठना पड़ता था  । कक्षा 2 से डेस्क और बेंच की सहूलियत थी । कक्षा 2 मे मकान मालिक के दो युवा लड़के कभी-कभी पढ़ाने आते थे । बड़े थे सुरेन्द्र । इनका क्लास हमलोग मंत्रमुग्ध होकर करते थे । कारण व्यक्तित्व सुंदर और आकर्षक तो था ही साथ ही ये बिहार में बनी भोजपुरी डाक्यूमेंटरी फिल्मों में बतौर नायक बन कर पेश होते थे । ये फिल्में पाठशाला में और राज्य सूचना केंद्र के भवन में दिखाई जाती थीं । उनसे छोटे, नरेंद्र हमेशा चाभी की चैन घुमाते रहते थे और बच्चो को गलती करने पर चाबुक जैसा इस्तेमाल भी करते थे । कक्षा 2 में 1 महीने के अंदर ही कुछ छात्रों को कक्षा 4 में प्रोमोट कर दिया गया । मै भी उनमें से एक था । इस बात को घर में जिस तरह उल्लास से मनाया गया उससे मुझे थोड़ा घमंड आ गया ।
कक्षा 4 मकान मालिक के गैरेज में स्थित था । क्लास टीचर शर्मा जी थे । ये इंग्लिश पढ़ाते थे । क्लास शुरू होते ही हमलोगों की वर्जिश शुरू हो जाती थी । कोई मुर्गा बनता तो कोई लीन-डाउन; कोई बेंच पर खड़ा होता तो कोई क्लास के बाहर । किसी का कान खींचा जाता तो किसी को क्लास से दिन भर के लिए निकाला जाता था । शर्मा जी से हेडमास्टर भी खौफ खाते थे । जब की सब टीचर मुनीम से तनख्वाह पाते थे, शर्माजी को स्वयम हेडमास्टर आते थे उनकी तंख्वाह देने । साथ ही यह हर बार कहते की मैंने आपको दूसरो से 2 रुपये ज्यादा दिये हैं अथवा सबसे ज्यादा दिये हैं । इसी क्लास में मैंने पहली बार “शर्मा जी शर्माते हैं, चूहे पकड़ कर खाते हैं” सुना । गाने की शुरुआत करने वाला विश्वकर्मा नाम का लड़का था जिसकी शिनाख्त होते ही पाठशाला से निकाल दिया गया ।
मुझसे भी एक बार गलती हो गई थी । पाठशाला जाते समय याद आया की मैंने शर्मा-सर का दिया होमवर्क तो बनाया ही नहीं । इंग्लिश में कोई भी एक कविता लिख कर लानी थी और उसे क्लास में सुनाना था । मैंने माँ को बताया और शर्मा-सर के मिजाज के बारे में भी बताया । मैं बिलकुल नहीं जाना चाहता था । माँ ने मुझसे पेंसिल ली और झटपट किसी कविता की चार लाइन लिख दी और कहा की कविता को रास्ते में रट लेना । क्लास मेँ अंदर जाते ही मैंने सबकी तरह कॉपी खोल कर शर्मा-सर के टेबल पर रख दी । रोल-कॉल के बाद एक-एक कर लड़कों से कविता देखने के बाद उन्हें व्याख्यान करने को कहा जाता । गलती होने पर बेंत से पिटाई अथवा कान खिचायी । मेरा नंबर आया । शर्मा-सर भौचक और बोखलाए हुए मेरी तरफ देखने लगे । उनके पूछने पर मैंने डरते-डरते सच बात बता दी । शर्मा-सर ने असिस्टेंट हेडमास्टर नथुनी-सर को बुलवा भेजा । उनके आने तक मैंने न जाने कितने दंड के तरीके बुन लिए थे । उन्हें कॉपी दिखाई गई । उन्हें सारी बात बताई गई और शर्मा-सर ने जानना चाहा कि क्या ऐसी लिखावट कभी देखी है और लिखी पंक्तियाँ के कवि का नाम मालूम है । माँ की लिखावट अत्यंत सुंदर होती थी । मुझे सच बोलने के कारण कोई दंड नहीं मिला । बड़ा होने पर वह कविता ISc के टेक्स्ट बुक “Golden Treasury” में मिली । Wordsworth की “The Rainbow” की पंक्तियाँ थीं ।
शर्मा-सर की एक सबसे बड़ी खूबी तब देखने को मिली जब वे भूतपूर्व छात्रों के द्वारा अभिनीत “Merchant of Venice” का निर्देशन कर रहे थे । मंचन आँगन में हो रहा था । हमलोगों को भी बरामदे में बिठाया गया था । इतना भव्य की आजतक शेक्सपियर की वह कहानी नहीं भूली है । शर्मा-सर स्वयं शायलक बने थे ।
गणेश पाठशाला में मेरे 3 मित्र बने । पहला सुनील जिसका मै जिक्र कर चुका हूँ । दूसरा सुशील जो श्री जनक नारायण लाल, MLC का बेटा था । तीसरा अशोक चोपड़ा जिसके परिवार की मशहूर गोल्डेन आइसक्रीम पूरे शहर में मशहूर थी ।
हेडमास्टर कभी-कभी ही पाठशाला आते थे । सुना था उनका कलकत्ता में बड़ा व्यापार है । वे जब भी आते, सभी छात्रों को लाइन में खड़ा किया जाता । उनका छोटा सा भाषण होता । पढ़ाई में अच्छा करने वाले छात्रों को पुरस्कार और शरारत करने वालों को दंड मिलता । उनके जन्मदिन पर इसी तरह हमलोगों को इकट्ठा कर लड्डू बांटे जाते । उनकी मृत्यु पर पाठशाला में 3 दिनों की छुट्टी घोषित हुई थी । उतनी कम उम्र मे जाना की बड़े लोगों के मरने पर छुट्टी मिलती है । बिन मांगे छुट्टी मिलने का यह अवसर आज भी बच्चों में खुशी भर देता है ।




Saturday, August 19, 2017

विदेशी तडका -1- आज़ादी के बाद !

मुग़ल और अंग्रेजों के शासन में ज्यादातर बातें ऐसी हैं जो घिनौनेपन तक दुखदायी है- जैसे हिंसा द्वारा मंदिर विध्वंस, नारी-हरण, धर्मान्तरण और गुलामी प्रथा । इन सबों के बारे में बहुत कुछ सुना और पढ़ा है । पर यह भी नहीं भूलना चाहिए की इनकी वजह से हमलोग आपस में लड़ने-कटने से काफी हद तक बचे रहे वैसे ही जैसे दो बिल्लियों के सुलहनामे में बंदर तराजूवाला पूरा माल खा गया पर बिल्लियों में संधि हो गयी । साथ ही कुछ बातें ऐसी हैं जिसे हम गहराई से मनन करें तो पायेंगे की भारतवर्ष ने उनकी बहुत सी अच्छी बातों को बखूबी अपना लिया है ।
विदेशियों से मेरा लंबा सानिध्य रांची आने पर हुआ । आज़ादी के बाद ये सभी विदेशी ईश्वर के प्रतिनिधि बनकर आये अथवा इंजीनियरिंग एक्सपर्ट्स बनकर । सभी से मैंने बहुत-कुछ सीखा और समान धरातल पर उठ-बैठ की ।

मैं पांच वर्ष का था जब पिताजी सपरिवार जमशेदपुर से तबादला लेकर ट्रेन से पटना जा रहे थे । 1952 में रेलगाड़िया न तो समय पर आती थी और न समय पर पहुँचती थीं । साथ ही काफी अरसे बाद या नए सफ़र करने वाले या ज्यादा बैगेज होने के कारण,सफ़र करने वाले भी समय से काफी पहले स्टेशन आ जाया करते थे । मालूम नहीं कहीं जल्दी आकर जल्दी न चली जाए । तबादले के कारण सामान ज्यादा था जिसे लगेज-वैन में डालना था इस कारण  हमलोग भी चार-पांच घंटे पहले तडके सुबह स्टेशन पहुँच गए थे ।
माँ ने हमलोगों को जबरन सोते से उठाकर फ्रेश कराया और एक-एक कर नंगा गुनगुने पानी से भरे बाथ-टब में भरपूर नहाने दिया । ये सब वाकया फर्स्ट क्लास वेटिंग रूम में बैठी माँ के उम्र की एक विदेशी महिला देख कर आनन्द ले रही थी । सुबह यूनिफार्म पहने लाल पगड़ी वाले बैरे ने टी-पॉट,मिल्क-पॉट और सुगर क्यूब से सजी ट्रे लाकर रख दी-साथ में ब्रेड-बटर का टोस्ट और हम बच्चों के लिए दूध से भरा पॉट भी । वह अँगरेज़ महिला और माँ अंग्रेजी भाषा में अपने अनुभवों का आदान-प्रदान कर रहे थे । उस महिला ने हम बच्चों को टोस्ट बनाना और पॉट हैंडल करना सिखाया । उसने अपने पास से नाश्ते में एक केक भी जोड़ दिया । माँ ने भी घर का बना ठेकुआ(कुकी) उन्हें खिलाया जो उसे बहुत स्वादिष्ट लगा । माँ ने उसे 5-6 ठेकुए और एक माथे की बिंदी का पैक दिया ।बदले में उसने भी एक फेस क्रीम की बोतल दी जिसे माँ बहुत दिनों तक सहेज कर रखती थी । उसे कलकत्ता जाना था  । ट्रेन 9 बजे सुबह आयी थी । इतने कम समय में हमलोगों ने काफी सारे अंग्रेजी शब्द और मुहावरे सीख लिए थे । OMG  तो हमलोग बात-बात पर बोलने लगे थे । जब उस विदेशी महिला की ट्रेन प्लेटफार्म पर आकर लगी थी तो हमलोग एकटक ट्रेन को ही निहार रहे थे । उतने कम अंतराल के मिलन के बाद की विदाई में भी दोनों महिलायों के पलके भींग गयी थीं इतना  मैंने अवश्य देखा था । हमलोगों की ट्रेन 1 बजे दोपहर को प्लेटफार्म पर लगी थी । इंजन ड्राईवर अँगरेज़ या एंग्लो इंडियन रहा होगा । जहां हमलोगों की बोगी लगी थी वहां प्लेटफार्म नहीं था और न तो उसमें फर्स्ट क्लास का डिब्बा था । हम बच्चों को गोद में उठाकर बोगी के अन्दर किया गया था ।  

क्रमशः .......


Sunday, February 8, 2015

वह बूढी माँ !

I was studying in standard seven. A day etched vividly in my memory, my elder brother playfully teased me with his new pen as we returned home from school. The teasing took an unexpected turn, and I found myself crossing the threshold of our house in tears. It was then that an old wrinkled, stooping with age woman, wrapped in tattered clothes and emanating the suffocating smell of coal smoke, appeared seemingly out of nowhere and enveloped me in a comforting hug.


Her presence was a sudden solace, and my tears were momentarily forgotten as I found myself embraced by this mysterious old woman. It took considerable effort to disentangle myself from her, and only then did I realize the pungent odour clinging to her from the coal smoke. It was my mother who later shed light on her identity.

In our household, I had two brothers—one a year and a quarter younger, the other older than me. The elder one, unwell at the time, received special attention from our grandparents, while the youngest naturally claimed a spot in our mother's lap. This elderly woman, around 60 years old, had no fixed abode. After overcoming numerous hurdles, she sought refuge in our home, becoming the caretaker responsible for all household chores, from cooking to cleaning. This elderly lady became my nanny (caregiver). She carried me on her back while working until I could stand on my own. She became my foster mother for those critical days when my father was posted in Gaya town.

After tracking our address from one of my father's colleagues, she journeyed to Patna in a coal-powered steam engine train just to see me. Despite knowing my aversion to the smell of coal smoke, she strived to make a lasting impression on me. Bathed and adorned in a clean white Khadi saree from my mother, she sat beside me during meals, feeding me with her own hands. When I returned from play, she handed me the exact pen my brother had teased me with—a red Doric pen costing 6 annas (37 paise). She had acquired a similar pen from the market, a gesture that earned her a reprimand from my mother. She possessed only two rupees, yet the wealth she shared with me in the form of sweets, chocolates, and toys every afternoon transcended monetary value.

This selfless, maternal figure remained with us for four days, during which I was inseparable from her. Each morning, I'd wake up on her mat. On the day of departure, she tightly embraced me, weeping continuously. On her departure, her Magahi words echoed in my ears: "I am not coming again - I am not coming again." With her final tearful embrace, she disappeared into the bustling market, her faded figure merging with the throng. Her parting words, "I am not coming again," hung heavy in the air, a stark reminder of the impermanence of life and the fleeting nature of unexpected encounters.The imprint of her love remained etched within me, a permanent marker of the warmth and security she offered during a vulnerable time. The scent of coal smoke, once repulsive, became a bittersweet reminder of a bond born out of chance and nurtured by selflessness. The red Doric pen, no longer a symbol of my brother's teasing, became a precious talisman, a tangible memory of her extraordinary affection. Years later, amidst the tapestry of love woven by others, it is her selfless gesture, her unwavering presence, that continues to shine the brightest, a testament to the enduring power of a love given freely, without expectation.