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Tuesday, January 27, 2015

अब बस !

आज ट्रांसपोर्ट क्षेत्र में भी क्रांति दिख रही है । धक्का देकर स्टार्ट होने वाली बस की जगह सेल्फी बस ने ले ली है । लिमो कैब से लेकर कारवान और उससे भी आगे का जनरेशन सड़क पर छाया हुआ है । हवाई जहाज कम्पनीज भी अब एयरबस कहलाने में गर्व महसूस करती हैं । पर क्या इतना कुछ बस पर की गयी पहली सवारी का रोमांच छीन पायी ? और अगर रोमांच की बात करें  तो वह भी प्रचूर मात्रा में गाँव से पांच मील दूर की सड़क से गुजरने वाली बस पर यात्रा करने में आज भी है ।
पैदल अथवा बैलगाड़ी पर दूरी तय करने के बाद घंटो इन्तजार करने के बाद जब दो मील दूर पर कच्ची सडक पर धुल व् गर्दे का गुबार दीखता है तब सांस में सांस आती है । मुरझाया चेहरा खिल उठता है । शहर और मेट्रो आते-आते तो सबकुछ यांत्रिक ही रह जाता है । आपकी नजर सदैव अपनी घड़ी पर ही टिकी रहती है । ड्राईवर कैसा है, कंडक्टर अगर है तो कैसे मिजाज का है, आगे-पीछे तो भूल जाईये, बगल मैं कौन बैठा है, कब बैठा है और कब उतर गया , खिड़की से नजदीक या दूर तक क्या कैसा नजर आ रहा है, कुछ भी नहीं महसूस होता है । कभी-कभी तो आप अपना कुछ सीट पर ही भूल जाते हैं । बीते कल की, कागज़ की किश्ती, आज के क्रूज से कही ज्यादा मजा देती है । बार बार हमें अपना कल भूलने की हिदायत दी जाती है । काश, कोई हमें भूलने की अदा न दे ।

बिहार की ग्रीष्मकालीन राजधानी और अब झारखण्ड प्रदेश की राजधानी, तब 1960 के दशक में शहर कहलाने को बेताब दिख रही थी । देखते-देखते लोकल बसों की संख्या दो से बढ़कर सात हो गयी थी । तब रांची की लम्बाई 15 किलोमीटर रही होगी । धुर्वा, हटिया, बरियातू और कांके इसके चारों कोने थे बिलकुल हाथ और पैर पकड़ कर लम्बे किये गए अंग्रेजी के X अक्षर जैसे, जिसके मध्य में डोरंडा प्रखंड स्थित था । डोरंडा के बिलकुल बीचो-बीच मेरा घर जिसके सामने से सभी बस गुजरती थीं । कोई तीन किलोमीटर दूर मेरे घर के बाये तरफ हरे पेड़ों से भरी तराई के ऊपर से गुजरने वाली सड़क से गुजरती सभी गाडियो के पहिये तक दिख जाते थे । मैं रंग-बिरंगी बसों को देख कर ठंडी साँसें लेता था कि मालूम नहीं कब मुझे इन बसों में सफ़र करने का मौक़ा मिलेगा और उससे बड़ी बात की झिझक ख़त्म होएगी ।

मेरी उम्र तब तेरह वर्ष थी और मैं कॉलेज जाता था । जबतक कॉलेज नजदीक था, मैं साइकिल से आता-जाता था । पर बाद में मेरा कॉलेज बरिआतु के निकट चला गया कोई 8 किलोमीटर दूर । मेरी थकान देखकर बस से जाने की अनुमति मिली । अनुमति याने 50 पैसे ।

शनिवार की शाम से लेकर सोमवार की सुबह कैसे गुजरी इसका अंदाजा आप अपने पहले इंटरव्यू की तैयारी से लगा सकते है । पहले से बस यात्रा करने वाले सहपाठियों से बस की टाइमिंग और ठहराव नियत करना, कपडे धोकर, सुखाकर इस्त्री करना, बाटा के टफी जूते की दो-तीन बार पोलिश कर चमकाने से लेकर हेयर स्टाइल और यहाँ तक की कापी, पेन, रूमाल और 50 पैसे की हिफाजत की बार-बार रिहर्सल घर के सभी लोगों में मजाक और कभी-कभी खीज का विषय सा बन गया था ।

अभी भी याद है । वह कलिका बस सर्विस थी । ठीक सुबह 7.45 पर अपने समय पर आयी थी । बस खचाखच भरी थी और क्यों न हो ? वह समय स्कूल, कॉलेज और ऑफिस जाने वालों का हुआ करता था । एक दुबले-पतले गोरे से मुस्कुराते कंडक्टर ने सहारा देकर मुझे ऊपर खींच लिया । अगल-बगल सभी लोग मुझसे लम्बे थे इसलिए मुझे सांस लेने में कठिनाई हो रही थी । तभी कंडक्टर आ गया । बोला- आज पहला दिन है, आदत हो जायेगी । मालूम नहीं उसे कैसे मालूम हो गया कि वह मेरा पहला दिन था । मेरी तरफ टिकट बढाया । उसने मेरी पीछे की कालर सहलाते हुए कहा कि बहुत शानदार कपडे की शर्ट सिलवाई है । पर जैसे ही उसने कालर खींची वह चर्र की आवाज के साथ फट गयी । मेरे पास बस वही एक अच्छी शर्ट थी । मेरा रूआंसा मुंह देखकर किसी ने मुझे हंसकर बताया कि यह कश्मीरी ऐसे ही सबको मुंह से कर्र की आवाज निकाल कर डरा दिया करता है । बगल की सीट पर बैठी सीनियर लड़कियों ने सहानभूति दिखाकर मुझे अपने बगल में जगह बनाकर कर बिठा लिया । तभी मेरे एक सहपाठी ने उनको बताया कि यह कोई स्कूल जाने वाला बच्चा नहीं है बल्कि उनसे एक वर्ष ही जूनियर क्लास में है । पलक झपकते उन बंगाली लड़कियों के लिए मैं अछूत हो गया । मैं खुद ही उठ खड़ा हुआ ।

उस कालिका बस से मेरा आगे की चार वर्षों तक साथ रहा । कभी मैं सोया रह जाता था तो खलासी या कंडक्टर मेरा पड़ाव आने पर जगा दिया करते थे । कभी घर से निकलने में देर होती थी तो हॉर्न बजाकर मुझे सजग कर दिया करते थे । हालांकि मैंने देर न हो उसके लिए बहुत सटीक तरीका खोज लिया था । मेरे बरामदे से करीब ३ किलोमीटर पहले कोई 50 मीटर ऊंची तराई पर से एरोड्रोम की बगल वाली सड़क से गुजरती सफ़ेद पर लाल धारियों वाली बस दिख जाया करती थी और मुझे कम से कम 10 मिनट का समय मिल जाया करता था । बाद में 1966 में हमलोग धुर्वा के ऑफिशियल बंगले में आ गए । तब भी इसी बस को मैं 7 .30 पर पकड़ता था । उस वक्त सभी बस सर्विसेस समय पर चलकर गर्वान्वित रहती थी । केवल एक रांची ट्रांसपोर्ट को समय की तमीज नहीं थी ।

इसी बस में मुझे अपने जीवन का सबसे सुखद कॉम्पलिमेंट मिला, वह भी माँ से । एक दिन लौटते समय बहुत जोर की भूख लग गयी थी । मेरे पास एक बॉन ब्रेड खरीदने का पैसा था । सोचा अभी चार बजे घर जाकर सोती माँ को तंग करने से अच्छा है कि मैं बॉन खा लूं । मैं एक बस-पड़ाव पहले ही उतर गया और दुकान से बॉन खरीद कर बड़े-बड़े कौर में निगलते हुए घर पंहुचा । पर ये क्या । माँ तो दरवाजे पर खड़ी मेरा इन्तजार कर रही थी । मेरे पहुंचते ही उसने मुझे बहुत पुचकारा और मेरे लिए खाना परोसने चली गयी । खाना खिलाते-खिलाते उसने कहा कि वह भी उसी बस से लौट रही थी । माँ ने पिछली सीट से आगे  एक वृद्ध महिला को कुछ पल धक्के खाते खड़ी देखा । उसने यह भी देखा कि एक लड़के ने तुरत खड़े होकर उस वृद्धा को बैठने का आगाज़ किया । माँ ने जब यह देखा कि वह और कोई नहीं उनका बेटा प्रकाश ही है तो आँखे नम हो आयी । माँ ने यह कहकर बड़े प्यार से मेरे सर पर अपना  हाथ सहलाया ।

मेरे लिए वह कॉम्पलिमेंट जीवन भर के लिए आनंद के सबब के साथ मुसीबत भी बन गयी । आनंद और मुसीबत एकसाथ इसलिए कि अब इस उम्र में भी अगर कोई बुजुर्ग(चाहे उसकी उम्र मुझसे कम क्यों न हो)मेरी सीट के पास आकर खड़ा हो जाता है तो मुझमें वही प्रकाश समाने लगता है

Friday, January 9, 2015

हाफपैंट !

1960 के दशक में तबके बिहार की ग्रीष्मकालीन राजधानी रांची २५ वर्ग किलोमीटर में सिमटी हुई बहुत ही मनभावन लगती थी. ऊंची-नीची पगडंडियों जैसी सड़के, हरियाली और तरह तरह के पक्षियों के कलरव से संगीतमय और शायद संसार के सबसे भोले-भाले आदिवासियों से गुलज़ार जो सुबह से रात तक गाना गाने और नाचने के लिए बेताब, भला रांची से अच्छी जगह कौन से हो सकती थी.
उस वक्त वहां दो ही कॉलेज थे. एक मिशनरी संत ज़ेविएर्स और दूसरा रांची यूनिवर्सिटी का रांची कॉलेज. पहले में आदिवासियों को प्रशय दी जाती थी और दूसरे में सरकारी महकमे में कार्यरत लोगों के बच्चों को. मुझे रांची कॉलेज में एडमिशन मिला.
अंग्रेजो के जमाने का लाल ईंटो से बनी दोमंजिली इमारत जिसके चारों तरफ टिन और एस्बेस्टस के छत वाले क्लास रूम बनाए गए थे ज्यादा क्लासेज चलाने के लिए. तब इस कॉलेज का विशाल गेट दक्खिन की तरफ बड़े डाकघर के सामने मेनरोड पर था.
26 जुलाई १९६१ ! मैं बहुत डरते-सहमते कॉलेज के गेट से अन्दर आ रहा था जबकि मुझे मालूम था कि रांची जैसी जगह में किसी ने रैगिंग के बारे में सुना तक नहीं था. कॉलेज कैंपस में उस समय लगभग तीस जन आ-जा रहे थे. उनमें ज्यादातर 16-20 उम्र के लड़के थे और इक्का-दुक्का कॉलेज के स्टाफ जैसे लोग दिख रहे थे. मैं ठिठका. उस एक मिनट के समय में मानो मेरे साथ-साथ पूरा कॉलेज थम सा गया. सभी की भौंचक निगाहें मेरी तरफ लगी थी. और ऐसा क्यों न होता.
उनके सामने एक सफ़ेद हाफ शर्ट और आसमानी निकर(हाफपैंट) पहने 4 फीट 9 इंच ( ) ३२ किलो यानी एक अदना पतला दुबला मात्र १३ वर्ष का लड़का कॉलेज कैंपस में किताब-कोपियों के साथ अवश्य एडमिशन लेकर पढने आ रहा था.
चार-पांच लड़कों का एक ग्रुप बहुत सहमते हुए मेरे नजदीक आया. सहमते हुए शायद इसलिए कि कहीं मैं डरन जाऊं. उन्होंने मुझे “आप” का संबोधन दिया और मेरे बारे में जानकारी हासिल की. मैंने भी सभी से आप के संबोधन के साथ बात की. ये आप का संबोधन पूरे सत्र तक चला. पांच मिनटों के उस इंटरव्यू के खत्म होने के समय भीड़ बढ़कर 15 से जयादा की हो गयी होगी. उसके बाद उनमे से दो लड़कों ने बड़े आदर के साथ मुझे मेरी कक्षा तक पहुँचाया.
कॉलेज में पूरे सत्र मैं आश्चर्य का विषय बना रहा. क्लास में मेरे लिए आगे की बेंच में जगह खाली मिलती. क्लास ख़त्म होते ही मुझे “ लेडीस फर्स्ट” जैसी बेसिस पर पहले निकलने दिया जाता. मेरी देखा-देखी मेरे से थोडा बड़ा किर्तिबस रॉय भी कभी-कभी निकर पहन कर आ जाता.
मुझे इस तरह का आदर और एक्सपोसर भाने लगा था. मैंने पहले वर्ष की पूरी पढाई निकर पहन कर ही की. अगले वर्ष यानी दुसरे सत्र में मैं पुनः निकर पहन कर ही कॉलेज पंहुंचा. एक और पंजाबी लड़का जो मेरे से ३ वर्ष बड़ा होगा और ऊंचाई भरपूर पौने छ फीट की होगी, वह भी निकर पहने कॉलेज पंहुचा. पर इस बार मेरे पुराने सहपाठियों ने बगावत कर दी. दूसरे दिन से प्रदीप कुमार सोबती तो फुलपैंट पहन कर आने लगा लेकिन मेरे पास तो हाफ पैंट के अलावा कुछ था भी नहीं.
पिताजी को जब तीन दिन बाद मालूम हुआ कि मैं कॉलेज किसलिए नहीं जा रहा हूँ तो वे आनन-फान में अपने टेलर “Royta” ले गए. उस बंगाली टेलर ने मेरे लिए एक २२ इंच मोहरे के फुलपैंट सिल दिया जो फुलपैंट कम और पायजामा ज्यादा लगता था. शाम को सोबती जो पड़ोस में रहता था जब उसे मालूम हुआ तो वह सुबह अपने मामा की काली रोल्स रोयस लेकर आ गया कॉलेज जाने के लिए. वह भी मेरे पैंट को और मेरे चलने के तरीके को देखकर बड़ी मुश्किल से हंसी रोक पा रहा था.
रांची की शायद पहली ऐसी कार जब कॉलेज में दाखिल हुई तो सबलोग रूककर भौचक देखने लगे. और जब उसमें से बहुत ही ढीली-ढाली पैंट पहने मैं उतरा तब तो जैसे भूकंप आ गया. मैं एकदम जोकर लग रहा था और महसूस भी कर रहा था.
लौटते समय मैं सारे  वक्त अपने फुलपैंट के बारे में सोच रहा था. मुझे सिलाई मशीन पर सिलाई आती थी कुछ-कुछ. चुपके से सिलाई मशीन मैं अपने कमरे में ले आया. पेंसिल से निशान लगाकर कटाई-छटाई शुरू की उसे ड्रेनपाइप पैंट में आल्टर करने के लिए. कैंची नहीं मिली तो ब्लेड से सिलाई उधेरने/काटने लगा. गलती से ब्लेड से मेरी  ऊँगली और अंगूठा बुरी तरह कट गया. पूरा पैंट खून से सारोबार हो गया. बहुत धोने पर भी खून के धब्बे नहीं गए और पैंट पर बुरी तरह दीखते रहे. 
अगली सुबह और उसके तीन दिन बाद तक मैं कॉलेज नहीं गया. घर में जो भी अखबार-रद्दी था उन्हें बेचकर ६ रुपये जमा हुए. उससे पैडीग्रीन रंग का  कपड़ा खरीदा गया. उसे कॉलेज के लड़कों के लिए सिलाई करने वाले नौशाद टेलर को दिया गया. उसने दो दिन में ड्रेनपाइप पैंट सिल कर दे दिया.
उस पैंट को मैं पूरे सत्र पहनता रहा. उसकी धुलाई व् इस्त्री छुट्टी के दिनों होती थी. हाँ, पर मैं उसे पिताजी से छिपकर पहनता था. इसके लिए उनसे ज्यादातर हाईड-सीक खेलना पड़ता था.

आज तकरीबन 55 वर्ष बाद ऑस्ट्रेलिया में जहां लोग कम से कम कपडे पहनते हैं जो ज्यादा पर्यावरण मसला लगता है, वहां मुझे फिर से हाफ पैंट पहनने की हिचकिचाहट मिटाने में चार महीने लग गए..पर ज़रा मौके की attitude देखिये , ६ रुपये की रद्दी इन 55 वर्षों में सूद के साथ कितनी ज्यादा appreciate कर गयी.  तकरीबन 600 डॉलर का था. जगह थी दुनिया के दूसरे सबसे महंगे इमारत सिंगापुर, मरीना बे सेंड्स , पर सबसे मंहगा होटल स्काई आन 57 के टेरेस पर !


Monday, June 23, 2014

एक समय रांची में !

फ़र्ज़ किजीये, एक बड़े टोकरे में 10-12 किलो तरह-तरह की सब्जियां एक लुंगीनुमा साड़ी में लिपटी 70 वर्षीय पोपले मुंह वाली आदिवासी महिला आपको मुंह-मांगे दाम पर देने के लिए तत्पर हो और आप शर्मसार होते हुए उसे 50 पैसे दे दें और वह उसे ख़ुशी-ख़ुशी ले ले । या फिर, मात्र 25 पैसे में कोई रिक्शावाला आपको 5 किलोमीटर राजी-ख़ुशी ले जाए । ऐसा ही कुछ व्यापार था 1961 के रांची शहर में जो उस समय बिहार की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी और प्रान्त का चेरापूंजी कहा जाता था ।
तब इस शहर की आबादी कोई 30 हजार रही होगी । ज्यादातार रिहायशी इलाके बंगाली महाशयों ने बसाए थे । साउथ ऑफिसपारा, नार्थ ऑफिसपारा, पीपी कंपाउंड, बर्दवान कंपाउंड, लालपुर, बहु बाजार और भी कई । जाहिर है इस शहर में सबसे ज्यादा धूमधाम से दुर्गापूजा मनाई जाती थी जो आजतक बरकरार है पर अब उसमें कृतिमता का समावेश हो गया है । पूरा शहर 50 वर्गमील में नापा जा सकता था । दूसरी तादाद बिहारी मुस्लिमों की थी जो कांके, हिंद्पिडी, डोरंडा व् कर्बला चौक में रची-बसी थी । 1960 के दशक में रांची में आगमन की जैसे क्रान्ति आ गयी थी ।डोरंडा के मेरे घर से तीन किलोमीटर दूर करीम १५० मीटर की ऊंचाई पर एअरपोर्ट के सामानांतर सड़क पर गुजरती गाड़ियां दिखती थी और मैं अपनी बस को आते हुए दस मिनट पहले ही देख लेता था और समय पर स्टैंड पहुँच जाता था.
1958 में हैवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन की स्थापना रांची को पूरी तरह बदलने वाली थी । 25000 से ज्यादा बहाली होने वाली थी । आलम यह था कि बहुतेरे लोग डरे-डरे रांची आते थे । अफवाह थी कि लोगों को पकड़ कर बहाली कर दी जाती थी । ऐसा हुआ भी था ।
स्कूलिंग का दौर ख़त्म करके, मैंने कॉलेज में दाखिला ले लिया था । सुबह उठने के लिए अलार्म की आवश्यकता नहीं पड़ती थी । ट्रकों में लदी हुईं आदिवासी कामगार जिनमे लड़के-लडकिया बराबर की तादाद में होती थी, बहुत ही मधुर समूह गीत गाते गुजरते रहते थे, कभी-कभी मांदर की थाप भी सुनायी देती थी । बाकी का दैनिक संगीत समारोह हरे-भरे पेड़-पौधों से ढके शहर पर तैरते-झूमते पक्षियों का कलरव पूरा कर देता था । राची पक्षी पर रखे नाम के इस शहर को अंग्रेजों ने 1927 में रांची नाम दे दिया था । डोरंडा जहां मैं रहता था, वह दोरं= संगीत और डाह=जल की संधि से बना था । पास ही स्वर्णरेखा नदी बहती थी । तब पास के ऑफिसपाड़ा मोहल्ले में एक बंगाली बुजुर्ग पियानो बजाया करते थे । पहली बार मैंने पियानो देखा । मैं महान बंगला फिल्मों के निर्देशक ऋत्विक घटक को नहीं जानता था । वे महाशय उनके करीबी थे और ऋत्विक उनके घर आया-जाया करते थे । संगीतमय पर्यावरण कैसा होता है मुझे महसूस होता था ।
बादल और बारिश के लिए तो जैसे रांची एक पसंदीदा जगह थी । किसी भी महीने, कभी भी बारिश हो जाया करती थी । पर उस दिन सुबह से बादल बरस तो नहीं रहे थे पर उनका गरजना शांत नहीं होता था । 21 अक्टूबर, 1962,शायद रविवार था इसीलिए सबलोग देर से ही सोकर उठे थे । अचानक किसी को महसूस हुआ कि इस तरह का निरंतर गरजना बादलों का नहीं हो सकता था । गौर से देखने पर बादलों के बीच दो-तीन डकोटा प्लेन उड़ते दिखे । उन दिनों सप्ताह में एक बार डकोटा पैसेंजर प्लेन आया करता था । बाहर निकल कर सडक पर देखा तो निसान ट्रक के काफिलों पर बिहार मिलिट्री के गोरखा जवान ज्यादातर 303 रायफल पकडे बैठे जाते दिखे । आठ बजे रेडियो समाचार से पता लगा कि चीन से युद्ध शुरू हो चुका था । जवानों से भरी ट्रकों का एअरपोर्ट की तरफ दौड़ पूरे दिन चली ।
देश के पहले प्रधान मंत्री दिवंगत पंडित जवाहर लाल नेहरु का सबसे मनोरम सपना था हैवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन । वे स्वयम इस कारखाने को देश को समर्पित करने के लिए रांची आये थे । 15 नवम्बर 1963 के तडके हवाई अड्डे जाने वालीं सभी सड़के और गलियाँ जन समुदाय की भीड़ से भर गया था । मैं भी हवाई अड्डे पर लगे बांस के बैरिकेड के खम्बे को पकड़ कर खड़ा था नहीं तो पता नहीं भीड़ मुझे कहाँ धकेल देती । जहाज समय से पहले आकर आकाश में चक्कर लगा रहा था और ठीक समय पर जहाज उतरा । बड़ी ब्यूक कार के खुले हुड पर नेहरूजी बैठे हुए पास में पड़ी ढेरों मालाएं भीड़ पर फेंक रहे थे । कार जैसे ही मेरे समीप आने लगी, मैं बांस के खम्बे पर पैर टिका कर उनकी एक झलक पाने को खड़ा हो गया । एक क्षण को नजर मिली और चाबुक की तरह एक गेंदे के फूलों की माला खम्बे से आकर टकराई । दूसरे ही क्षण उस माला के फूलों की छीना--झपटी हो गयी । मुझे अभी भी याद है नेहरु जी 16 की सुबह उसी तरह हुड पर बैठ कर मेरे घरके सामने से गुजरती सड़क से लौट रहे थे । सफ़ेद गाँधी टोपी, सफ़ेद अचकन और उसके बटन-होल में फंसा सुर्ख लाल गुलाब की कली । मेरी 75 वर्षीय दादी भी मेरे बगल में खड़ी थीं । दादी के नमस्कार का जवाब नेहरु जी ने मुस्कुराकर दोनों हाथों को जोड़ कर दिया था ।
दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे विशाल कारखाने के बनने के बाद रांची बड़ी तेजी से बदलता गया । 60 के दशक के अंत तक आबादी बढ़कर 4 लाख हो गयी । एक नया रेलवे स्टेशन हटिया में बना । हवाई अड्डे का आधुनिकीकरण हुआ । दो और चार पहिया वाहनों की संख्या 30-40 से बढ़कर 25 हज़ार तक पहुँच गयी । नंबर प्लेट BRN से BHV और फिर BHN हो गया । रांची भारत का एक सबसे बड़ा शैक्षणिक हब बन चुका था ।
बहुत कुछ अच्छा हुआ पर कुछ बहुत दुखद भी हुआ । हमलोग पाकिस्तान के विरुद्ध 1967 की लड़ाई तो जीत गए पर तुरंत ही एक बहुत ही दारुण हिन्दू-मुस्लिम दंगे की यंत्रणा झेलनी पड़ी । दशक के अंत में एक और युद्ध का समा बना जिसने पाकिस्तान को दो भागों में बाँट दिया । इसका दूरगामी परिणाम यह हुआ कि आज रांची में सभी दुस्तर कार्य जैसे गाड़ी मरम्मत, भवन निर्माण, फूटपाथ खुदरा बिक्री, ऑटोरिक्शा चालन, मांसाहारी पोषण व् बिक्री जैसे सभी दुस्तर कार्य-व्यवसाय बंगलादेशियों ने सम्हाल रखा है ।
आज रांची दूसरे आम शहरों जैसा हो गया है । अब न पेड़ों की छाँव है और न उनपर चिड़ियाँ चहचहाती हैं, अब तो बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं हैं जो बाहर से एक सन्नाटें में जीवित दिखती हैं; अब आदिवासी युवक-युवतियों का नृत्य डिस्को शैली में 1000 किलोवाट की दिल दहलाने वाली गर्जना की ताल पर होता है । रांची की मासूमियत और शीतलता को मैंने बेबस उधर जाते देखा है जहां से उसका लौटकर आना असंभव है। अब तो रांची जैसे बेशर्मी के साथ शर्माती है अपनी शर्मिन्दिगी पर ! घर से दिखने वाली वह तीन किलोमीटर दूर की सडक कबकी गुम गयी.



Monday, June 2, 2014

आम का भी जवाब नहीं !

आम की चोरी
आम ही एक ऐसा फल है जो शायद सबकी पसंद है. मेरी भी है बेहद. मुझे याद है जब मैं तीन वर्ष का था तबकी बात. दोपहर की नीद में छत पर आम टपकने की आवाज आती थी. बिना सीढ़ी और मुड़ेड की १५ फीट ऊंची छत पर चढ़ जाया करता था. हाँ, पहली बार उतरते समय पैर छत से नीचे गेराज की सतह नहीं खोज पा रही थी.
सात-आठ वर्ष का था तब तो हमलोगों की टोली ही बन गयी थी. कोई भी पता करता किसके घर में आम के पेड़ में आम लगे हैं. उसके बाद योजनाबद्ध तरीके से हमला होता. यह दोपहर के दूसरे पहर में हुआ करता जब सब कोई खा-पीकर अलसाए सोये रहते. कभी कुछ बच्चे सामने के गेट पर रिहायीशिओं को बात में उलझाए रखते और दूसरा दल पिछवाड़े से आम तोड़ निकल जाता. एक बार तो सात फूट ऊंची बाउंड्री वाल पर गड़े शीशे के टुकड़ों पर जूट का बोरा रख कर आम चोरी को अंजाम दिया गया.
आम की बगीचे की रखवाली करते माली भी हमलोगों से झांसा खा जाते. एक बार दोस्तों के उकसाने पर मैं ऐसे ही एक बगीचे के पेड़ पर चढ़ गया. थोड़े लालच में आ गया. थैले पूरी तरह भर गया था फिर भी कुछ और. एक आम नीचे गिर गया. आवाज से माली की नींद टूट गयी. वह लट्ठ लेकर नीचे से मुझे ललकारने लगा. दोस्त तो किनारे लग गए. तभी दिमाग की बत्ती जली. मैं एक-एक आम दोस्तों की तरफ फेंकने लगा. माली आम दोस्तों से पहले चुनने दौड़ा. मुझे उतर कर भागने का अच्छा मौका मिल गया. तब भी काफी आम मेरी झोली में बच गए थे.
सबसे अच्छा ज़माना था जब मेरी उम्र कोई दस-इग्यारह की रही होगी. क्या आप विशवास करेंगे कि आज से तकरीबन 450 वर्ष पहले शेरशाह सूरी के शासन  मे लगाये गए आमों का हमलोग लुत्फ़ उठाया करते थे. जी हाँ ! तब हमलोग ग्रैंडट्रंक रोड की पास रहते थे. सड़क के दोनों तरफ आमों के पेड, इतने कि आसमान तक नहीं दिखता था. साइकिल पर बड़े-बड़े थैले लेकर जाते और आम भरकर लौटते. न कोई रोकने वाला ,न कोई टोकने वाला.
उम्र २१ वर्ष. पोस्ट ग्रेजुएट फिजिक्स की पढाई. सभी साथी क्लास ख़त्म होने के बाद जिस रस्ते से लौटते उसपर डिस्ट्रिक्ट कमिश्नर का बंगलो पड़ता. बाहर झूलते कच्चे आमों पर सिक्यूरिटी की नजर बचाकर पत्थर का निशाना जरूर बनाते. जितने भी आम गिरते हमलोग बाँट कर खाते हुए लौटते. हाँ, मूंगफली वाले से पीसी मिर्च-नमक की पुडिया भी लेते.
उसके बाद पड़ता सिख रेजिमेंट का कैंटोनमेंट का प्रवेश द्वार जहाँ ट्रैफिक कण्ट्रोल करने के लिए एक छह फूटा वर्दीदार सिख जवान खड़ा रहता. हमलोगों को भी बस पकड़ने उसके पास ही खडा होना पड़ता. हम सभी वहा खड़े होकर कच्चे आमों की फांक मिर्चीदार नमक के साथ चटखारा लेकर खाते. पर एक बार उसके बाद फिर कभी नहीं. किस्सा यों हुआ कि ट्रैफिक कण्ट्रोल करते-करते सरदार के मुंह से लार टपकने लगी. उसके बाद हमलोगों ने वह फर्राटेदार पंजाबी गालिया सुनीं जो हम आपको बता नहीं सकते. 
ईश्वर की दया से रिटायरमेंट के बाद विरासत में एक आम का पेड़ भी मिला. कच्चा आम भी मीठा लगता है. इस बार पेड़ में बहुत ज्यादा आम आये. मैंने आस-पड़ोस के बच्चों को हिदायत दी कि आंधी तूफ़ान से बहुत आम गिरेंगे उन्हें ही लेना. तोड़ना मत. पकने पर तोड़ना. पर बचपन में न तो मैंने किसी की बात मानी थी न अब मैं आशा करता हूँ. देखते देखते आम गायब होने लगे. दोपहरी में जब झपकी लेने का समय होता तब चढ़ाई होती. मुझे छत पर बच्चों के दौड़ने भागने की पूरी आवाज नीचे मिलती रहती. बच्चे मुडेर पर सामने दिखने वाले आम को छोड़ कर बाकी जगहों पर सेंध मारते. अंत में उन पच्चीस-तीस आमों पर भी हमला होने लगा. सुबह जब मैं छत पर
प्राणायाम करने पहुंचा तो मुश्किल से पांच-छह आम दिख रहे थे. शायद कुछ दिन और मिलता तो पेड़ में ही पक जाते. मैं धर्म संकट में पड़ गया. लग रहा था कि इस बार एक भी आम खाने को नहीं मिलेगा.मैं दोपहर को उन आमों को चोरी छुपे तोड़ कर ले आया. फर्ज कीजिये, एक ६७ वर्षीय वृद्ध अपने ही पेड़ का आम चोरी कर रहा हो.
पर मैं चोरी क्यों कर रहा था ? इसलिए कि बच्चे टोक न दें कि नाना भी आम पकने के पहले तोड़ रहे हैं; या फिर इसलिए कि अभी भी इन सब तृष्णाओं से राग नहीं मिटा था.अच्छा था कहीं से श्री चार्ल्स डिकेंस नहीं देख रहे थे नहीं तो अपनी “ दी रेनबो” की प्रसिद्ध पंक्ति चटखारा लेकर दुहरा देते “ Child is the Father of the Man"  !



Tuesday, January 7, 2014

इति साम्भरायः नमः !!

सबसे पहला डोसा मैंने 1958 में खाया था. तब मैं कोई 10 वर्ष का रहा होऊंगा. हमलोग चारों दोस्त प्रथम श्रेणी के अफसरों की संतान थे पर 30 पैसे का डोसा एक हफ्ते की तैयारी खोजता था.
पटना शहर में अपनी तरह का पहला खुला (ओपन एयर) रेस्तरां “सोडा फाउंटेन” ठीक गाँधी मैदान के पूरब में उस समय के दो प्रसिद्ध सिनेमा हाल “एलिफिस्टन” और “रिजेंट” के मध्य में गाँधी मैदान के सामने स्थित था. उसकी खासियत, यूनिफॉर्म पहने बेयरा और खूबसूरत फूलों से सजे पार्क के बीचोबीच एक यंत्रचालित सतरंगे पानी का फव्वारा था. मद्रासी डोसा और उसके साथ मिलने वाले अनलिमिटेड साम्भर के बारे में अभी तक सुन ही रखा था और अब तो बेयरे वाले ओपन एयर रेस्तरां का आकर्षण भी जुड चुका था.
हमलोग चार दोस्तों ने 50-50 पैसे इकठ्ठा किये. अपने कपड़े खुद धोकर इस्त्री कर, संज संवर कर तीन बजे से सामने फैले गाँधी मैदान में चक्कर लगाकर रेस्तरां खुलने का इन्तजार करने लगे. रेस्तरां चार बजे खुलता था. चार बजे वह खुला तो पर लोगबाग आने शुरू नहीं हुए. पहले पहुँचना मुनासिब नहीं लगता था. कोई साढ़े चार बजे से लोगों का आना शुरू हुआ. हमलोग शर्माते झिझकते कोने वाली टेबल के इर्दगिर्द आसन जमा बैठे. देखते-देखते १५ मिनटों में बाहर जमायीं १०-१२ टेबल भर गयी. पहले जो हमलोगों को लग रहा था कि सबकी निगाहें हमलोगों को घूर रही हैं उससे तो छुटकारा मिल गया पर बेयरे को भी हमलोग दिखाई नहीं पड़ने लगे. खैर बेयरा आया  और हमलोगों ने मेनू को गंभीरता से पढते हुए मसाला डोसा का आर्डर दिया. उसी दिन हमलोगों को मालूम पड़ा कि परीक्षा देते समय अंतिम का १५ मिनट कितनी जल्दी बीत जाता था और डोसा सर्व होने में लगा १५ मिनट कितनी देर लगाता है.
डोसे के प्लेट की सबसे खास बात उसपर रखी कांटे और छुरिया थीं. पहली बार इनसे साबका पड़ा था. हमलोगों ने चोरी-छुपे दायें देखा, बाए देखा और सामने देखा तब समझ में आया कि काँटा बाईं हाथ में पकड़ा जाता है और छुरी या चम्मच दाहिने में. हमलोगों का ज्यादा समय लगा लोगों से छिपा कर डोसे के टुकड़ों का निवाला बनाकर मुंह में घुसेड़ने या धकेलने में. हमलोगों ने मन बनाया था कि एक-दो बार साम्भर मांगेगें जिसका पैसा नहीं लगेगा. पर कांटे-छुरी के चक्कर में सब भूल गए.
डोसा खाते-खाते बेयरा आया और हमलोगों को आइसक्रीम खाने का मशवरा देने लगा. हमलोगों ने पहले ही देख लिया था कि आइसक्रीम की सबसे सस्ती किस्म २५ पैसे की थी इसलिए हमलोगों ने १५ पैसे वाली चाय का आर्डर दिया. भरपूर गर्मी थी तो क्या चाय हमलोगों ने मन से और काफी देर लगाई पीने में. तबतक हमलोग कुछ बेतकल्लुफ हो गए थे और सतरंगा पानी का फव्वारा भी अच्छा दिखने लगा था.
बेयरा बिल लेकर आया एक रुपये अस्सी पैसे का. हममें से जिसने सबसे अच्छा कपडा पहन रख रखा था और पोलिश किया हुआ जूता भी, उसने बड़ी शान से 2 रुपये का नोट निकाल कर ट्रे पर रख दिया. साथ ही हमसब एक साथ तपाक से खड़े होकर निकल पड़े जिससे कि बेयरा यह समझ जाए कि बाकी का 20 पैसा उसकी टिप थी. बेयरा समझदारी की उम्र में पंहुंचा हुआ था उसने जमकर सैल्यूट मारी जिसे शायद हमलोग आज भी पांच सितारा होटलों के डोरमैन के सैल्यूट से कहीं ज्यादा अहमियत देते रहेंगे.
मुफ्त के साम्भर का मजा महमूद ने एक फिल्म में दिया था जब उसकी जेब में सिर्फ 50 पैसे का सिक्का था और वह दो दिनों से भूखा था. उसने चार कटोरें साम्भर पी थी. और मुझे मुफ्त के साम्भर से सामना सिकंदराबाद स्टेशन के सामने वाले होटल में हुआ था. बड़े जोर की भूख लगी थी और पूछने पर लोगों ने उसी होटल में जाने की मंत्रणा दी थी.
पहले तो एक बड़े थाल में चार-पांच लोगों के भरपेट खाने लायक चावल के साथ साम्भर, सब्जियां,पापड और दही मिला. मैंने अपने खाने लायक चावल छोड़कर बाकी निकलवा दिया. खाने के बीच में बेयरे ने टेबल पर एक पांच लीटर की साम्भर से भरी बाल्टी लाकर रख दी. उस दिन के बाद से पांच-छ वर्षों तक साम्भर के तरफ देखने की भी इच्छा नहीं होती थी. 

Wednesday, June 12, 2013

देशी कट्टा

१९६० के दशक में स्कूल और कॉलेज के लड़कों के लिए बाइसिकल होना एक गर्व की बात होती थी. अगर बाइसिकल इंग्लिश मेक हर्क्युलस या रैले हो तो सोने पे सुहागा. खुशकिस्मती से हम भाईयों के पास दोनों थी. १९७० का दशक आते ही उसकी जगह स्कूटर ने ले ली. हमार छोटे भाईयों के लिए वही साईकिलें सरदर्द बन गयी. एक दिन वे दोनों पुरानी साईकिलें चोरी हो गयी.
१९७० के आस-पास स्वदेशी हीरो साइकिल ने बाजार में तहलका मचा दिया. अब किशोर और बच्चे स्वदेशी स्पोर्ट्स साईकिले लेने लगे. ये सस्ती भी होती थीं. अचानक पुरानी इंग्लिश मेक साईकिले मिलनी तो दूर दिखनी भी बंद हो गयी. हैरत में तो हमलोग तब आये जब मेरे एक मित्र के घर चोर मात्र पुरानी रैले साइकिल ही चोरी करके ले गये.

ये विदेशी साईकिलें स्पेशल स्टील के ट्यूब से बनती थीं. १९७० के दशक में दो ऐतहासिक बातों ने इन ट्यूबों की मांग अत्यंत बढ़ा दी थीं. पहला था लाखों बांग्लादेशियों की घुसपैठ और दूसरा नक्सली संगठनों का उद्भव. पहले को कट्टा( पिस्तौल) बनाने की महारत हासिल थी तो दूसरे को ऐसे पिस्तौल और बंदूकों की बेहद जरूरत.

देशी कट्टा और बन्दूक बाद में स्वदेशी साईकिलों के स्टील ट्यूब से भी बनाया जाने लगा पर ये बुरी तरह असफल रहा. पहले ही शॉट पर इससे बना बैरल फट जाता था और इस्तेमाल करने वाला ही घायल हो जाता था.  २१वी सदी में कार के स्टीयरिंग के ट्यूब देशी कट्टा और बन्दूक बनाने में इस्तेमाल में आने लगेये हकीकत मुझे हाल की एक फिल्म की रुशिंग्स देख कर मालूम हुआ.
अब तो बाज़ार में इतना काला धन आ गया है कि कोई उपद्रवी एके और माजर से कम इस्तेमाल करना तौहीन समझता है और विदेशी स्मगलरों की तो चांदी हो गयी है.


Thursday, June 6, 2013

ब्रेड स्टिक

बचपन और बचपना पूरी निखार पर आता है जब उम्र पांच से दस वर्ष के दरम्यान होती है. तहलका तब मचता है जब इस उम्र के बीच के तीन-चार बच्चे हों. और अगर सभी सहोदर भाई-बहन हों तो सुनामी कोई नहीं रोक सकता, एनिड ब्लाईटन भी नहीं. 
 1950 का दशक, हम तीन भाई , दस, आठ और छ वर्ष के, एक ही स्कूल में पढने जाते थे. गर्मी के दिनों में स्कूल सात बजे सुबह शुरू होता था. पिताजी सुबह छ बजे ही इंस्पेक्शन पर निकल जाते थे. वे म्युनिसिपल कारपोरेशन में वरिष्ठ पद पर थे. पर उनका इंस्पेक्शन आज़ादी के पहले
के स्टाइल पर ही चलता था. उनके कॉलेज के जमाने की 1930 की हरक्युलिस बाइसिकल, खाकी हाफ पेंट, उजली हाफ शर्ट और सर पर खाकी हैट. वे जबतक लौटते हमलोग स्कूल जा चुके होते थे.




स्कूल एक चौरस्ते से होकर जाना पड़ता. फूटपाथ और सड़क के बीच एक सात-आठ इंच चौडीं ईंटों की पगडण्डी पर चलते हुए जाने के रोमांच के बीच स्कूल कब पहुँच जाते थे पता ही नहीं चलता था. पर एक व्यवधान था. सुबह के स्कूल के समय, सभी सड़क-सफाई कर्मचारी अपना काम निबटा कर अपने परिवार के साथ उसी पगडण्डी पर बैठ कर चाय की
चुसकिया लेते रहते थे. पूरे चौरस्ते यही नजारा रहता था. इतना ही नहीं, वे लोग और उनके बच्चे लहराते सांप की आकार का ब्रेड की डंडी उसी चाय में डुबा-डुबा कर आवाज के साथ खाते थे. उस सांप जैसे ब्रेड की डंडियों में सांप ही जैसा अजीब सा सम्मोहन था. कितने बार तो हम भाईयों में से कोई एक या उससे ज्यादा उस क्रिया-कलाप को देखने के चक्कर में या तो लडखडा के गिर जाते थे या आपस में टकरा जाते थे.
ये तो होना ही था. हम लोगों ने तय किया कि अगली सुबह हमलोग कुछ पहले निकलेंगे और इसका लुत्फ़ लेते हुए स्कूल की और बढ़ेंगे. शायद ये उस समय का सबसे सस्ता नाश्ता रहा होगा.
हमलोगों ने तीन चाय से भरी ग्लासेस ली और तीन ब्रेड स्टिक लिया. सबकुछ बीस पैसे में आ गया. जबतक पगडण्डी तक पहुंचे,  वहा बैठे बच्चों ने जगह बना दी थी. हमलोग उनके बीच  बैठकर चाय-ब्रेड का लुत्फ़ उठाने लगे.
ये भी होना ही था. उसी समय पिताजी, बाइसिकल पर सवार ,सड़क के दोनों तरफ मुआयना करते लौट रहे थे. उन्होंने बहुत ही मुस्कुराते हुए हमलोगों की तरफ देखा. अब उनकी मुस्कराहट का सबब समझ में आता है. वो यह देख कर खुश हो रहे थे कि सड़क कर्मचारी भी अब अपने बच्चों की पढाई की तरफ ध्यान देने लगें हैं. पर उनकी मुस्कराहट पलक झपकते बौखलाहट में बदल गयी. उन्होंने ऐसा 1950 के दशक के सपने में भी नहीं सोचा होगा. हम तीनो फ्रीज शॉट में तब्दील हो गए. बड़े भाई का मुंह खुला था और स्टिक दो इंच सामने पैतालीस डिग्री पर रुक गयी थी. छोटा भाई सड़क की जमीन पर रखी गरम चाय का गिलास उठाने ही वाला था. मेरा ब्रेड स्टिक, चाय में डुबकी लगाने के बाद बाहर आने की बेताब उतावली में था.
सब पिताओं में कुछ न कुछ अच्छाई अवश्य होती है. मेरे पिता जी कभी भी बीच सड़क में न तो डाटते थे और न पीटते थे. पूरी आतिशबाजी बड़े आराम से शाम के समय परिवार के बीच हुई.
आज ५५ वर्ष बाद मैंने शाम को अपनी बेटी को वैसे ही एक आकृति को चाय के साथ खाते देखा तो हँसे बिना नहीं रह सका. उसे अब ब्रेड स्टिक और बैगेल ट्विस्टर के नाम से जाना जाता है.
जब मैंने यह आपबीती सुनायी तो उसका हँसते-हँसते बुरा हाल हो गया. तब पहली बार उसने बताया कि उसके बाबा यानी मेरे पिताजी बच्चों के साथ लुका-छिपी खेलते थे और डराने के लिए अपना दांत पलास से तोड़कर दिखाते थे. 
जवानी को तो लौटते न पाया और न सुना पर बचपना पूरी समझदारी के साथ एक बार फिर लौट कर आता है.