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Thursday, February 15, 2018

जोन्हा फाल्स : कल, आज और कल !!

कल (1960-65)

1960 के दशक में जोन्हा फाल्स अपनी अछूती सुन्दरता के चरम पर था. रांची-मूरी रेल ट्रैक पर जोन्हा के लिए मात्र बर्धमान पैसेंजर , गौतमधारा स्टेशन 10 बजे सुबह पहुंचती थी और शाम पांच बजे पुनः रांची लौटने को आ पहुचती थी. इसी से सटे लगभग कच्ची रांची-पुरुलिया रोड गौतमधारा रेल  गुमटी को लांघती थी. दोनों हालात में इसी गुमटी पर पहुँच कर 5 किलीमीटर जंगल के ट्रैक पर चलकर जोन्हा फाल्स पहुँचना होता था . पूरे जाड़े लोग इस प्राकृतिक झरने पर पिकनिक करने आते थे. धधकते लाल रंग के टेसू के फूलों से
केंद
सुसज्जित जंगल, अनसुने-अनदेखे पक्षियों का कलरव और चोरी-छिपे झांकती सूरज की किरणे एक दूसरी दुनिया ही सुसज्जित कर देती.  इस मौसम में झाड़ों पर नीले मटर के दाने के बराबर करौंदे की भांति मीठे फल गुच्छो में मिलते थे. शायद उसका नाम कद्वन था .जंगली छोटे बैर से जंगल भरा होता था. गौतम धारा के जंगल में कम बीजों वाला मीठे अमरुद के पेड़ भी अनगिनत थे. एक और फल बहुतायत में मिलता था, पीला, गोल्फ के बॉल जितना , मीठे गूदों के बीच कुछ बीज लिए. उसे लोग केंद कहते थे.   से मछलियों का शिकार करते दीखते रहते थे .अगर कोई खाली हाथ भी आया हो तो उसे पेट भरने को बहुत कुछ मिल जाता था. 5 किलोमीटर की पैदल यात्रा से थकने के बजाय लोग और ज्यादा प्रफुल्लित और वेगवान हो जाया करते थे. ये वन हाथियों का रिहाईशी इलाका था पर पिकनिक के  मौसम में, भीड़ और कोलाहल के चलते हाथी कहीं दूर दूसरी जगह निकल जाया करते थे . बंदरों का झुण्ड पेड़ों पर मस्ती करता दिखता था.
झरने से बहता पानी जगह-जगह पार करना होता था. आदिवासी तीर-धनुष से या फिर नुकीले भाले
जल प्रपात के पास पहुँच कर अधिकाँश सुधिजन सम्मोहित और ठगे-ठगे झरने और उसके चारो ओर फ़ैली प्राकृतिक छटा  को निहारते रह जाते थे. तब सिकदारी जलविद्युत नहीं बना था. इस कारण झरना शरद ऋतू में अपने यौवन पर रहता था. पत्थर काटकर या रखकर 150 के लगभग सीढियां हमलोग आनन्-फानन में तय कर लेते थे. 150 फीट के ऊंचाई से 3-4 झरनों से नीचे पड़े समतल चट्टानों पर पानी गिरता था. इन चट्टानों तक पहुँचने के रास्ते में रेतीली जमीन और उसके बाद जल की सतह एक इंच से बढ़ता हुआ 100 फीट दूर चट्टान तक 2 फीट गहरा हो जाता था. पानी इतना स्वच्छ कि पूरे जमाव के नीचे रेत और पत्थर दीखते थे: एकदम मिनरल वाटर. नहाने, खिलवाड़ और शरारत करने के लिए यह स्थल एकदम दोस्ताना थी.
जोन्हा फाल्स शरद ऋतू में सैकड़ों सैलानियों से भर जाता था. ये रांची शहर के अलावा जमशेदपुर, पुरुलिया और कोलकाता तक से आते थे.  ज्यादा प्रतिशत बंगाली और आदिवासी क्रिस्चियन का होता था. आदिवासी तो पूरे रास्ते गाते, मांदर बजाते और नाचते दूरी तय करते थे . वे पूरे समय थिरकते दीखते थे.
हम 4 साथी 1961-63 में इंटरमीडिएट कर रहे थे . उम्र और उत्साह एकदम सही था नए वर्ष में पिकनिक मनाने का. इन 3 वर्षों में जोन्हा फाल्स जाकर पिकनिक करना सबसे ज्यादा सहज था. बाकी स्थलों में जाने के लिए यातायात की व्यवस्था  आवश्यक थी. जोन्हा के लिए बर्धमान पैसेंजर बिलकुल माकूल थी. 1 जनवरी को तो शायद ही कोई टिकट खरीदता हो. रास्ते भर चेन खीचकर, ट्रेन रोककर सैलानी चढ़ते-उतरते थे. 45 मिनट का सफ़र 2 घंटे में तय होता था. ट्रेन में बैठने या फिर खड़े रहने की सबसे लोकप्रिय जगह फूट-बोर्ड होती थी. हमलोग घर से एक घंटे पहले ही स्टेशन पहुँच कर फूटबोर्ड पर कब्जा करते थे. बारी-बारी से दो जन बैठते थे और दो जन पीछे खड़े रहते थे. ट्रांजिस्टर पर जो भी गाना आता हो उसको गाते-चिल्लाते सफर तय करते थे. तब”सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं” पहली पसंद हुआ करती थी.
हमलोग नव वर्ष के पिकनिक की तैयारी महीने भर पहले शुरू कर देते थे. चारो जन मिलकर 60 रुपये के लगभग इकठ्ठा करते थे. सभी शान्तिनिकेतन झोले में पिकनिक का सामान बाट लेते थे. सामान में काफी, कंडेंस्ड मिल्क, चीनी, बिस्कुट, ब्रेड, जैम, मिक्सचर,बॉयल्ड अंडे और मिठाई होती थी. मनोरंजन के लिए ताश जरूरी था. एक क्लिक-3 कैमरा लाता था तो दूसरा ट्रांजिस्टर. तीसरे के जिम्मे फिल्म का रोल होता था तो चौथा चाय-काफी बनाने का बर्तन और गिलास . सन-ग्लासेज का जोगाड़ निहायत जरूरी हुआ करता था.
जगह चुनने को कैप्चर करना कहते थे. चादर या तौलिया बिछाई जाती थी. बिखरी पड़ी सूखी टहनियों को जलाकर काफी बनायी जाती थी. घुटने तक पैर पानी में डूबाकर काफी की चुसकिया लिया करते थे. एकबार तो सिगरेट की आजमाईश भी हुई थी. उसके बाद चड्ढी पहने पानी में उतर कर झरने के नीचे नहाते थे. घुटने भर पानी में भरपूर अठखेली करते थे. कैमरे से बारह स्नेप बड़ी सावधानी से लेते थे जिससे कि चारों के साथ न्याय हो सके. जितने स्नेप सही डेवेलप होते उनकों पसंद के अनुसार आपस में बाँट लेते. खाने का सामान आधे से ज्यादा बच जाता जिसे निहारते गाँव के बच्चों में बाँट देते. ऐसा सब सैलानी करते. जो पहले से आ रहे होते , वे नियतन ज्यादा खाने की सामग्री लाते. सामिष चूल्हों के पास कुत्तों का जमावड़ा हो जाता और दूर ऊपर 1-2 सियार भी ताकते रहते.
हमलोगों में इस बात पर अनबन हो जाती की ताश खेला जाये, प्राकृतिक छटा निहारी जाये, सैलानियों के सांस्कृतिक कार्यक्रम का लुत्फ़ लिया जाए या फिर झपकी ले ली जाये. हमलोग सभी क्रियाकलापों के साथ न्याय करने का प्रयत्न करते. तीर और नुकीले भाले से मछली का शिकार करते देखना सम्मोहित कर लेता. आदिवासी घंटो मांदर की थाप पर थिरकते रहते.  अगर कोई बंगाली ग्रुप भाव-विभोर हो गया तो रविन्द्र संगीत, बाउल गीत और जात्रा का नैसर्गिक आनन्द मिलता. अंत में जाने से पहले पुनः चाय या काफी बनती. इस समय कोई न कोई बाबू-मोशाय काफी का एक चुम्मा लेने आ ही जाते. गौतमधारा स्टेशन समय से काफी पहले आकर ट्रेन का इन्तजार करना होता. लौटते वक्त फूटबोर्ड खाली मिलता. घर पहुँचते-पहुंचते रात हो जाती.

आज (2018)

आज लगभग 50 वर्ष बाद मैं जोन्हा फाल जा रहा था. इतने वर्ष न जा पाने के कई कारण थे. रेलवे गुमटी के बाद 5 किलोमीटर का रास्ता पगडंडियों वाला ही था. अब हिच-हाईक करने की उम्र नहीं रह गयी थी. पूरा इलाका नक्सल प्रभावित माना जाता था. तब दोस्तों के साथ गया था - इस बार पत्नी और बेटे के साथ. इधर दो वर्षों में बहुत कुछ विकास हो गया है. सड़कें बहुत अच्छी बन गयी हैं. झरने तक पहुँचने के लिए टाइल्स की सीढियां बन गयी हैं. अब झरने के ऊपर या नीचे जाना बहुत सहज हो गया है. थोड़ी-थोड़ी दूर पर छतरी वाले प्लेटफार्म बना दिए गए हैं जहां 20 से 50 तक का ग्रुप बैठने और पिकनिक का आनंद ले सकता है. सबसे बड़ी बात कि गाँव के लगभग सभी परिवारों के लिए रोजगार की अच्छी गुंजाईश हो गयी है. भोजन , स्नैक्स और कुछ नहीं तो जंगल में होने वाले फल की खूब बिक्री होती है. झरने की तरफ जाने वाले तीनों रस्ते पर अच्छा-ख़ासा टोल लिया जाता है. जोन्हा पहुँचने में अब 5 की बजाय मात्र डेढ़ घंटे लगते हैं. पूरा इलाका प्लास्टिक मुक्त घोषित किया गया है साथ ही नशा करना वर्जित किया गया है. अभी और भी विकसित होने की बहुत गुंजाईश है. सरकारी डाक बँगला तो है साथ ही पर्यटकों के लिए भी ठहरने और विश्राम की संभावना बनती है. रोपवे आमदनी का एक अच्छा जरिया बन सकता है.
तीर और भाले से मछली का शिकार अब देखने को नहीं मिलता है. मात्र दो-तीन पेड़ टेसू के लाल सुर्ख फूलों से लदे दिखे . पेड़ पर बैर, अमरुद, पियार और कन्द्वन नहीं दीखते हैं वे सब अब बिकाऊ हो गए हैं. मजेदार बात ये है कि अब कोई भी पैदल रास्ता नापते नहीं दिखता है. चार्टर्ड बस, मोटर गाड़ी और बाईक से छुट्टी के दिन पूरा रास्ता गुलज़ार रहता है. एक्का-दुक्का गाँव के लोग पैदल चलते दीखते हैं. अब संवेदनशील जगहों पर बाकायदा पुलिस की चौकसी रहती है.

तब और अब में एक ही समानता दिखी. झरने को देखकर हमलोग पुनः भौचक रह गए. कारण बिलकुल विपरीत था. पानी की एक-दो पतली लकीरे भर ही दिख रही थी. खैरियत इस बात की थी कि 95% आबादी युवा सैलानियों की थी जैसा कि पिकनिक स्पॉट की खासियत है . इन्हें कहाँ मालूम था कि सिकदरी पॉवर प्लांट बनने  के पहले यह जल प्रपात कैसा विशाल हुआ करता था. इसलिए सभी जगह काफी उत्साह और चहल पहल दिखता था. बहुतों ने लाउड स्पीकर-एम्पलीफायर पर संगीत का शोर मचा रक्खा था. एक-दो जगह सैलानी नाच भी रहे थे. आदिवासी समूह भी थे . वे भी आदिवासी नृत्य कर रहे थे. पर मांदर की थाप पर नहीं , ऑर्केस्ट्रा धुनों पर . आदिवासी युवतियां सदी नहीं बल्कि लड़कों की तरह जींस पहने थीं. आदिवासी सैलानी बहुत ज्यादा मेकअप में दिखे. पाउडर, लिपस्टिक, रूज़ , हेयर स्टाइल और पहनावे से लड़के-लडकी में फर्क करना मुश्किल था. आज के युवा सिगरेट सभ्यता से बहुत आगे बढ़ चुके थे.
एक और समानता दिखी. पहले पेड़ों पर इतने फल लदे रहते थे कि जंगल में भटकने पर भूखा नहीं रहना पड़ता. अब भी अगर कोई जाए तो वही सबकुछ खरीद कर  पेट भर सकता था. साथ में तरह-तरह के स्नैक के पाउच और भेल-पूरी जैसी झाल-मूढ़ी भी चाय के साथ मिल रही थी.
हमलोग जिस सीढ़ी से नीचे उतरे उसे छोड़ दूसरी सीढ़ी से ऊपर चढ़े. एक सुखद आश्चर्य भी हुआ. गाँव के बच्चे बची हुई भोजन सामग्री की टोह में इंतज़ार करते नहीं दिखे - जंगली बैर बेचते दिखे. आने-जाने वालों पर मासूम नजरें. हमलोगों ने 10-12 दोने बैर खरीदे. जो बैर दस रुपये दोना था वह लौटते समय पांच का हो गया था. तात्पर्य कि इन्हें भी बिक्री करने का मर्म समझ में आ गया था . हमलोग जोन्हा फाल होकर पांच घंटे में चार बजे तक घर लौट आये.

कल ( 2025)

आज लोग बुलेट ट्रेन और हाइपरलूप की योजना के खिलाफ हाय-तोबा मचा रहे हैं वैसे ही जैसे कंप्यूटर के आगमन पर हुआ था. काश वे समझ पाते कि ये विकास विकसित होते देश की मजबूरी है. ठीक वैसे ही जैसे एक बार भगवान् जगन्नाथ का रथ चल पडा तो रोकना मुश्किल हो जाता है. ये रथ सरकार नहीं खिचती है बल्कि आम नागरिक के संगठित सहयोग और इच्छा शक्ति से होता है. आज का आम नागरिक अब कहाँ STD बूथ पर लाइन में खडा दिखता है ; सभी के पास मोबाइल फोने है. टाइपराइटर की जगह कंप्यूटर ने ले ली है. पिज़्ज़ा और बर्गर अब एक मजदूर भी खाता है. बाइसिकल भी अब कम ही दिखती है.
2025 का जोन्हा फाल रोप वे, लिफ्ट और मॉल से सुसज्जित होगा. पहुचने के लिए रेल और रोड के अतिरिक्त ओवरहेड रेल प्रणाली होगी. हेलीपैड की भी व्यवस्था हो तो अचरज नहीं.शायद तबतक उबेर और ओला फ्लाइंग कैब भी ले आयें. निजी गाडियों पर तो टोल लगेगा ही सैलानियों को भी पास खरीदना होगा.
झरने को भरपूर करने के लिए प्राइम टाइम पर सिक्दरी जलाशय से पानी छोड़ा जाएगा. तरह-तरह के चाट और भोजन के स्टाल दिखेंगे. झरने से गिरते पानी को रोककर जगह–जगह तालाब बनाए जायेंगे जिसपर बोटिंग और तीर-भाले से मछली भेदने का खेल पैसे देकर खेलने को मिलेगा. एडवेंचर खेल जैसे बंगी जम्पिंग का आनंद भी उठाया जा सकेगा. ड्रोन से फोटोग्राफी आम बात हो जायेगी. 
शायद पुनः मांदर की थाप पर अपने बुनियादी लिबास में  थिरकते आदिवासी भी दिखने लगे. सांस्कृतिक विरासत का रीप्ले एक मुनाफे का व्यापार होगा.
जोन्हा के आसपास कुछ ही किलोमीटर दूर और भी मशहूर जल प्रपात हैं- हुन्डरु, दशम, सीता वगैरह. यातायात की इतनी बेहतर सुविधा के चलते पर्यटक एक झरने पर सुबह का नाश्ता, दूसरे पर दिन का भोजन और तीसरे पर शाम की चाय का आनंद लेते हुए उजाला रहते हुए घर वापिस आ सकेंगे. 


Tuesday, August 22, 2017

विदेशी तडका- 5 - फ्रांस के मार्टिन ( F Martin from France) !

जुलाई, 1972 की एक सुबह, फाउंड्री फोर्ज प्लांट की लेबोरेटरी के पार्किंग स्पेस में एक विदेशी कार आकर लगी। कार कुछ-कुछ आज के टोयटा जैसी थी। कार से एक विदेशी नवयुवक निकला और रास्ता पूछकर सीधा चीफ के चैम्बर में चला गया। 10 मिनट बाद मुझे बुलाया गया। चीफ ने उस युवक से मेरा परिचय कराया। वह युवक फ्रांस से विशेषज्ञ की हैसियत से नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ फाउंड्री फोर्ज टेक्नोलॉजी में अपना योगदान दे रहा था। उसे वहां के वैक्यूम स्पेक्ट्रोग्राफ में कुछ परेशानी हो रही थी। समाधान और विशेष जानकारी के लिए उसे मेरे पास भेजा गया था।  
मार्टिन ने मुझसे बहुत कुछ सीखा। परन्तु मैंने उससे जो कुछ भी सीखा वह जीवन पर्यंत मुझे मदद करने वाला था।
हमारी लेबोरेटरी सुबह आठ बजे खुलती थी। मार्टिन के तीन महीने के प्रवास में ऐसा कभी नहीं हुआ की वह आठ बजे से पहले न आ गया हो। एकदम साफ़ सुथरी पोशाक और उसपर वाइट एप्रन। वह सिगरेट पीता था पर अपने कार में बैठकर। मैंने उसे स्पेक्ट्रोग्राफ रूम एक चाभी दे रखी थी  एक सुबह जब मैं आया तो देखता हूँ की वह एक स्टूल पर खडा होकर रोशनदान की खिड़की साफ़ कर रहा था।
मेरी नजर रोशनदान पर पड़ी। लेबोरेटरी के 10 वर्ष की आयु में कभी भी रोशनदान की सफाई नहीं हुई थी। गन्दगी गोंद जैसे चिपकी हुई थी। कुल 6 रोशनदान थे। हमलोगों ने अथक प्रयास कर एक-एक शीशा चमका दिया। उसके बाद दीवाल पर नजर ठहरी। जमीन से पांच फूट ऊपर तक उसे हलके हरे आयल पेंट से शुरू में पेंट किया गया होगा जो अब काई के रंग का दिख रहा था। । हमलोगों ने पैटर्न शॉप के स्टोर से पेंट लाकर उसे भी बिलकुल नया पेंट कर दिया। बहुत लोग ,खासकर सीनियर्स मना करने आये पर मार्टिन यही कहता था अपने घर की सफाई में शर्म कैसी, आलस क्यों और कोई दूसरा क्यों ।
आसपास के विभाग से सबकी नजर इस नज़ारे पर पड़ रही थी। एक फ्रेंच युवक एक्सपर्ट सफाई और पेंटिंग में लगा हुआ था। जो शायद इतना अमीर था की अपने कार तक फ्रांस से रांची तक ले आया था।
भारतवर्ष के कारखानों में हर वर्ष 17 सितम्बर को विश्वकर्मा पूजा मनाई जाती है। इसके लिए 15 दिनों से जोरदार सफाई और गृह व्यवस्था का कार्यक्रम चलता है। इस वर्ष। सभी कोई मार्क ट्वेन के टॉम सॉयर और सफेदी करते उनके दोस्त जैसे ढले दिख रहे थे । खासकर मेरी लेबोरेटरी में जो किसी कॉलेज कैंपस से कम नहीं था। सभी कमरों, बरामदों में सफेदी हुई,पेंटिंग हुई और हर प्रकार के कचरे का सही निष्पादन हुआ। और ये सभी कार्य लैब के लोगों ने मिलकर किया। बुजुर्ग अगर हाथ नहीं बटा पाते तो शाबासी देने और समय-समय पर स्नैक्स का इंतजाम करते रहते।

पिछले वर्ष 2016 में, जब मैं एक वर्ष बाद घर लौटा तो साफ़-सफाई का पर्व मनाने लायक मेरा घर तैयार नहीं था। कम-से कम , एक कमरे की पूरी सफेदी, खिड़की-दरवाजों की पेंटिंग और उस कमरे से एक-एक कचरे का तिनका हटाकर सफाई-धुलाई करने में मुझे न तो कोई संकोच हुआ और न थकान। 

Sunday, August 20, 2017

विदेशी तड़का -3 - रशियन एक्सपर्ट्स !

१९६६ के अप्रैल माह में हमलोग रांची के हैवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन के विशाल टाउनशिप में रहने गए । कॉलोनी का उत्तरी-पूर्वी कोना रूस और चेकोस्लोवाकिया से आये लगभग 600 एक्सपर्ट्स को आवंटित
किया गया था । ज्यादातर एक्सपर्ट्स अपनी पत्निओं के साथ आये थे, सीनियर को बच्चे लाने की भी अनुमति थी । उस इलाके को रशियन हॉस्टल कहा जाता था जो अब झारखण्ड प्रदेश का विधान सभा और अतिथि आवास बन चुका है । इस भूभाग में स्विमिंग पूल के साथ सभी तरह के खेल और खेलने के मैदान थे । पूरे क्षेत्र के लिए एक टीवी डिश अन्टेना लगा था जिसकी पकड़ पूरे विश्व से थी । एक बड़ा सभागार भी था जिसमें सांस्कृतिक प्रोग्राम और फिल्मों का प्रदर्शन भी होता था । उस समय वहीँ नेहरु जयंती भी मनाई जाती थी । हमलोग उस सभागार में आमंत्रण पर आयोजन देखने जाते थे । मैंने वहां आवारा, अलीबाबा चालीस चोर और Crime and Punishment फिल्मे देखी थीं । यही सभागार आज का झारखण्ड विधान सभा है ।
ये विदेशी ग्रुप या झुण्ड में अपनी पत्नियों के साथ शाम के समय घूमने निकलते थे । उसी समय बाजार से खरीदारी भी करते थे । दूकानदार भी काम लायक विदेशी भाष बोलने लगे थे उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए । शनिवार और रविवार जैसे साप्ताहिक अवकाश के दिनों ये लोग सुबह से रात होने तक बाजार, सडको, पर्यटक स्थलों पर मस्ती करते दीखते थे । भारतियों से इनका व्यवहार बहुत ही मधुर था । हमेशा मुस्कुराना, जानने की उत्सुकता और दोस्ती बढ़ने के लिए एक्टिंग के साथ आवारा और श्री 420 के गाने गाना इनकी फितरत थी । नजदीकी को अमली जामा पहनाने के लिए अपने कैमरों से फोटो लेना इन्हें बहुत रास आता था । लेकिन तभी एक हादसे के बाद इनमें एक सहमाहट आ गयी, संबंधों में ठंडापन दिखने लगा ।
22 अगस्त 1968 को रांची में भारतवर्ष का बहुत बड़ा दंगा हुआ । सैकड़ों की जाने गयी । हमेशा की तरह अल्पसंख्यकों ने अप्रत्याशित तरीके से शुरुआत करके की । चुकी HEC हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र था इसलिए सीमावर्ती क्षेत्रों में यादवों ने कसकर बदला लिया । ये एक्सपर्ट्स कुछ घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी थे ।
1969 में HEC ज्वाइन करने के कोई छह महीने लगे इन विशेषज्ञों से इतनी जान-पहचान बढाने में की हमलोग अब दिल खोल कर बात करने लगे । एक दिन उन्होंने 1968 के दंगों का अनुभव बताया जो किसी को भी क्षुब्ध और चकित कर देता ।

उन्होंने बताया की पिछली सदी में विश्व में उनके रूस के कुछ इलाकों और जातियों को बारबैरियन (बर्बर, खूंखार और जंगली) कहा जाता था । वे अपने दुश्मन का होशोहवास में खाल छील कर उतार लेते थे । पूरे समय दुश्मन इसके लिए मानसिक रूप से तैयार रहता था । अगर इसके बाद भी उसकी मौत नहीं होती थी तो उसका गला काट दिया जाता था । पर उनलोगों ने दंगो के शुरूआती दिनों में सुबह की सैर के समय जो कुछ देखा वह उससे भी भयानक था । नाले के अन्दर छुपे परिवार को पहले दंगाई दुलार- पुचकार कर बाहर निकालते थे और उसके बाद छोटे-छोटे चाक़ू से गोंद-गोंद कर मार डालते थे । एक चार वर्ष के बच्चे को तो उन्होंने पैर पकड़ कर घुमाया और दीवार पर दे मारा । एक आदमी को दौडाते-दौड़ाते पानी से लबालब भरे कूएँ में गिर जाने दिया और जब भी उसका सर ऊपर आता उसे लाठी से पीटकर फिर पानी के अन्दर डूब जाने देते । यह खेल 15 मिनट तक चलता रहा ।  हमलोगों के सर पर जब खून चढ़ता है तो सीधे गोली मार देते हैं । इस सदी में भी ऐसा कुछ होता होगा विश्वास नहीं होता । आपलोग तो हिन्दू हो बुद्ध, महावीर , महांत्मा गाँधी के देश के !

1970 के दशक में एक्सपर्ट्स की संख्या कम होती गयी  । 1980 के दशक में आवश्यक तकनीकी क्षेत्रो में ही उन्हें आमंत्रित किया जाता । 

Saturday, August 19, 2017

विदेशी तड़का - 2 - गोसनर एवेंजेलिकल लूथेरन चर्च

1961 का रांची कोई सपनों का देश जैसा प्रतीत होता था । चारो तरफ पहाड़ और हरियाली, थोड़ी गर्मी पड़ते ही वर्षा, पड़ोस में दायें बाजू बंगाली परिवार तो बाये बाजू मद्रासी समुदाय, सामने पंजाबी तो पीछे मराठी, बाजार के पास से मस्जिद की अजान तो रविवार की सुबह इसाईयों का काफिला कुछ दूर चर्च जाते हुए । लगता था जैसे पूरा हिन्दुस्तान यहीं आकर बस गया हो । हो भी क्यों नहीं ? इस शहर में एशिया के सबसे बड़ा कारखाना हैवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन जो बन रहा था । 25000 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलने वाला था । उसके साथ के इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे मददगार उद्योग , बाजार, स्कूल, कॉलेज ट्रांसपोर्ट वगैरह सब मिलकर कुछ ही वर्षों में आबादी 40 हज़ार से 4 लाख हो जाने वाली थी ।
सुबह की नीद आदिवासी गीत और मांदर के थाप से खुलती थी । ट्रक भर-भर कर आदिवासी लड़के लडकियां मांदर की थाप पर नाचते-गाते कारखाने की ओर मजदूरी करने जाते थे । सुबह कोई आदिवासी महिला टोकरा भर सब्जी डाल जाती थी बिना मोल-भाव किये । टाटा, पटना और झुमरी तिलैया प्रवास में तो नहीं पर यहाँ लोकल बस चलती थी जिससे हमलोग कॉलेज जाया करते थे 10 किलोमीटर दूर ।
एक सुबह रविवार को दरवाजे पर दस्तक हुई । देखा तो एक 25 वर्ष की लडकी और उसके साथ एक 70 वर्ष का अँगरेज़ खड़ा था । उनसे मैं अपनी टूटी-फूटी कांपती अंग्रेजी में बाते करता सुनकर पिताजी आ गए और उन्होंने मोर्चा संभाला । वे दोनों प्रोटोस्टेंट क्रिस्चियन चर्च से आये थे और अपने धर्म की जानकारी देना चाहते थे या अनकहे शब्दों में वे अपने धर्म का धर्मान्तरण के जरिये विस्तार करना चाहते थे । पिताजी ने उन्हें चाय पिलाई और कहा की वे अगले रविवार से आयें और दोनों बड़े कॉलेज जाने वाले लडकों को शिक्षा दें । हम दोनों भाई बहुत घबडा गए यह सोच कर की उनसे इंग्लिश में बातें करनी होगी पर पिताजी बहुत प्रसन्न थे की उनके बच्चे अब इंग्लिश में वार्तालाप करने लग जायेंगे । और ऐसा हुआ भी ।
ज्यादातर वह चश्मा पहने , सांवली, मझोले कद की स्कर्ट ब्लाउज पहने सिस्टर मैरी फर्नान्डीज़ ही साइकिल पर आती थी । जाहिर है हमारी टीचर गोवा की थी । अब ज्यादा तो याद नहीं है पर ओल्ड और न्यू टेस्टामेंट की किताबों के किसी अंश पर परिचर्चा होती थी जिसमे किसी जेहोवाह प्रोफेट का उल्लेख बार-बार आता था । हर रविवार हमलोगों को पिछली पढ़ाई पर लेख लिख कर दिखाना होता था  । इंग्लिश छोड़कर और किसी दूसरी भाषा में संवाद नहीं होता था  । प्रत्येक महीने में एक बार जर्मनी के मार्क सदरलैंड भी प्रगति देखने आते थे । उसके लिए सिस्टर हमलोगों को बकाया पहले से तैयार कर देती थी । पिताजी भी हमलोगों की प्रगति पर कड़ी नजर रखते थे । इसका फ़ायदा दो महीने में ही दिखने लगा । मेरे बड़े भाई अब इंग्लिश साहित्य के क्लास में लोकप्रिय होने लगे ।हम भाई चर्च के प्रोग्राम में शामिल होने भी जाते थे । यह सिलसिला दो वर्षों बाद तब टूटा जब हमें एक फॉर्म भरने को दिया गया जो उनके धर्म में जाने का गेटवे था ।
मेरे बड़े भाई ने अन्तोगत्वा, केमिस्ट्री आनर्स करने के बाद इंग्लिश साहित्य में एम०ए० और क़ानून की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास की ।
आज के दिन रांची का गोसनर एवेंजेलिकल लूथेरन चर्च सम्पूर्ण उत्तर-पूर्व भारत का प्रतिनिधित्व करता है और इसके 5 लाख से ज्यादा सदस्य हैं जो मध्य प्रदेश से लेकर आसाम तक दिखेंगे 
क्रमशः ...

Tuesday, January 27, 2015

अब बस !

आज ट्रांसपोर्ट क्षेत्र में भी क्रांति दिख रही है । धक्का देकर स्टार्ट होने वाली बस की जगह सेल्फी बस ने ले ली है । लिमो कैब से लेकर कारवान और उससे भी आगे का जनरेशन सड़क पर छाया हुआ है । हवाई जहाज कम्पनीज भी अब एयरबस कहलाने में गर्व महसूस करती हैं । पर क्या इतना कुछ बस पर की गयी पहली सवारी का रोमांच छीन पायी ? और अगर रोमांच की बात करें  तो वह भी प्रचूर मात्रा में गाँव से पांच मील दूर की सड़क से गुजरने वाली बस पर यात्रा करने में आज भी है ।
पैदल अथवा बैलगाड़ी पर दूरी तय करने के बाद घंटो इन्तजार करने के बाद जब दो मील दूर पर कच्ची सडक पर धुल व् गर्दे का गुबार दीखता है तब सांस में सांस आती है । मुरझाया चेहरा खिल उठता है । शहर और मेट्रो आते-आते तो सबकुछ यांत्रिक ही रह जाता है । आपकी नजर सदैव अपनी घड़ी पर ही टिकी रहती है । ड्राईवर कैसा है, कंडक्टर अगर है तो कैसे मिजाज का है, आगे-पीछे तो भूल जाईये, बगल मैं कौन बैठा है, कब बैठा है और कब उतर गया , खिड़की से नजदीक या दूर तक क्या कैसा नजर आ रहा है, कुछ भी नहीं महसूस होता है । कभी-कभी तो आप अपना कुछ सीट पर ही भूल जाते हैं । बीते कल की, कागज़ की किश्ती, आज के क्रूज से कही ज्यादा मजा देती है । बार बार हमें अपना कल भूलने की हिदायत दी जाती है । काश, कोई हमें भूलने की अदा न दे ।

बिहार की ग्रीष्मकालीन राजधानी और अब झारखण्ड प्रदेश की राजधानी, तब 1960 के दशक में शहर कहलाने को बेताब दिख रही थी । देखते-देखते लोकल बसों की संख्या दो से बढ़कर सात हो गयी थी । तब रांची की लम्बाई 15 किलोमीटर रही होगी । धुर्वा, हटिया, बरियातू और कांके इसके चारों कोने थे बिलकुल हाथ और पैर पकड़ कर लम्बे किये गए अंग्रेजी के X अक्षर जैसे, जिसके मध्य में डोरंडा प्रखंड स्थित था । डोरंडा के बिलकुल बीचो-बीच मेरा घर जिसके सामने से सभी बस गुजरती थीं । कोई तीन किलोमीटर दूर मेरे घर के बाये तरफ हरे पेड़ों से भरी तराई के ऊपर से गुजरने वाली सड़क से गुजरती सभी गाडियो के पहिये तक दिख जाते थे । मैं रंग-बिरंगी बसों को देख कर ठंडी साँसें लेता था कि मालूम नहीं कब मुझे इन बसों में सफ़र करने का मौक़ा मिलेगा और उससे बड़ी बात की झिझक ख़त्म होएगी ।

मेरी उम्र तब तेरह वर्ष थी और मैं कॉलेज जाता था । जबतक कॉलेज नजदीक था, मैं साइकिल से आता-जाता था । पर बाद में मेरा कॉलेज बरिआतु के निकट चला गया कोई 8 किलोमीटर दूर । मेरी थकान देखकर बस से जाने की अनुमति मिली । अनुमति याने 50 पैसे ।

शनिवार की शाम से लेकर सोमवार की सुबह कैसे गुजरी इसका अंदाजा आप अपने पहले इंटरव्यू की तैयारी से लगा सकते है । पहले से बस यात्रा करने वाले सहपाठियों से बस की टाइमिंग और ठहराव नियत करना, कपडे धोकर, सुखाकर इस्त्री करना, बाटा के टफी जूते की दो-तीन बार पोलिश कर चमकाने से लेकर हेयर स्टाइल और यहाँ तक की कापी, पेन, रूमाल और 50 पैसे की हिफाजत की बार-बार रिहर्सल घर के सभी लोगों में मजाक और कभी-कभी खीज का विषय सा बन गया था ।

अभी भी याद है । वह कलिका बस सर्विस थी । ठीक सुबह 7.45 पर अपने समय पर आयी थी । बस खचाखच भरी थी और क्यों न हो ? वह समय स्कूल, कॉलेज और ऑफिस जाने वालों का हुआ करता था । एक दुबले-पतले गोरे से मुस्कुराते कंडक्टर ने सहारा देकर मुझे ऊपर खींच लिया । अगल-बगल सभी लोग मुझसे लम्बे थे इसलिए मुझे सांस लेने में कठिनाई हो रही थी । तभी कंडक्टर आ गया । बोला- आज पहला दिन है, आदत हो जायेगी । मालूम नहीं उसे कैसे मालूम हो गया कि वह मेरा पहला दिन था । मेरी तरफ टिकट बढाया । उसने मेरी पीछे की कालर सहलाते हुए कहा कि बहुत शानदार कपडे की शर्ट सिलवाई है । पर जैसे ही उसने कालर खींची वह चर्र की आवाज के साथ फट गयी । मेरे पास बस वही एक अच्छी शर्ट थी । मेरा रूआंसा मुंह देखकर किसी ने मुझे हंसकर बताया कि यह कश्मीरी ऐसे ही सबको मुंह से कर्र की आवाज निकाल कर डरा दिया करता है । बगल की सीट पर बैठी सीनियर लड़कियों ने सहानभूति दिखाकर मुझे अपने बगल में जगह बनाकर कर बिठा लिया । तभी मेरे एक सहपाठी ने उनको बताया कि यह कोई स्कूल जाने वाला बच्चा नहीं है बल्कि उनसे एक वर्ष ही जूनियर क्लास में है । पलक झपकते उन बंगाली लड़कियों के लिए मैं अछूत हो गया । मैं खुद ही उठ खड़ा हुआ ।

उस कालिका बस से मेरा आगे की चार वर्षों तक साथ रहा । कभी मैं सोया रह जाता था तो खलासी या कंडक्टर मेरा पड़ाव आने पर जगा दिया करते थे । कभी घर से निकलने में देर होती थी तो हॉर्न बजाकर मुझे सजग कर दिया करते थे । हालांकि मैंने देर न हो उसके लिए बहुत सटीक तरीका खोज लिया था । मेरे बरामदे से करीब ३ किलोमीटर पहले कोई 50 मीटर ऊंची तराई पर से एरोड्रोम की बगल वाली सड़क से गुजरती सफ़ेद पर लाल धारियों वाली बस दिख जाया करती थी और मुझे कम से कम 10 मिनट का समय मिल जाया करता था । बाद में 1966 में हमलोग धुर्वा के ऑफिशियल बंगले में आ गए । तब भी इसी बस को मैं 7 .30 पर पकड़ता था । उस वक्त सभी बस सर्विसेस समय पर चलकर गर्वान्वित रहती थी । केवल एक रांची ट्रांसपोर्ट को समय की तमीज नहीं थी ।

इसी बस में मुझे अपने जीवन का सबसे सुखद कॉम्पलिमेंट मिला, वह भी माँ से । एक दिन लौटते समय बहुत जोर की भूख लग गयी थी । मेरे पास एक बॉन ब्रेड खरीदने का पैसा था । सोचा अभी चार बजे घर जाकर सोती माँ को तंग करने से अच्छा है कि मैं बॉन खा लूं । मैं एक बस-पड़ाव पहले ही उतर गया और दुकान से बॉन खरीद कर बड़े-बड़े कौर में निगलते हुए घर पंहुचा । पर ये क्या । माँ तो दरवाजे पर खड़ी मेरा इन्तजार कर रही थी । मेरे पहुंचते ही उसने मुझे बहुत पुचकारा और मेरे लिए खाना परोसने चली गयी । खाना खिलाते-खिलाते उसने कहा कि वह भी उसी बस से लौट रही थी । माँ ने पिछली सीट से आगे  एक वृद्ध महिला को कुछ पल धक्के खाते खड़ी देखा । उसने यह भी देखा कि एक लड़के ने तुरत खड़े होकर उस वृद्धा को बैठने का आगाज़ किया । माँ ने जब यह देखा कि वह और कोई नहीं उनका बेटा प्रकाश ही है तो आँखे नम हो आयी । माँ ने यह कहकर बड़े प्यार से मेरे सर पर अपना  हाथ सहलाया ।

मेरे लिए वह कॉम्पलिमेंट जीवन भर के लिए आनंद के सबब के साथ मुसीबत भी बन गयी । आनंद और मुसीबत एकसाथ इसलिए कि अब इस उम्र में भी अगर कोई बुजुर्ग(चाहे उसकी उम्र मुझसे कम क्यों न हो)मेरी सीट के पास आकर खड़ा हो जाता है तो मुझमें वही प्रकाश समाने लगता है

Monday, June 23, 2014

एक समय रांची में !

फ़र्ज़ किजीये, एक बड़े टोकरे में 10-12 किलो तरह-तरह की सब्जियां एक लुंगीनुमा साड़ी में लिपटी 70 वर्षीय पोपले मुंह वाली आदिवासी महिला आपको मुंह-मांगे दाम पर देने के लिए तत्पर हो और आप शर्मसार होते हुए उसे 50 पैसे दे दें और वह उसे ख़ुशी-ख़ुशी ले ले । या फिर, मात्र 25 पैसे में कोई रिक्शावाला आपको 5 किलोमीटर राजी-ख़ुशी ले जाए । ऐसा ही कुछ व्यापार था 1961 के रांची शहर में जो उस समय बिहार की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी और प्रान्त का चेरापूंजी कहा जाता था ।
तब इस शहर की आबादी कोई 30 हजार रही होगी । ज्यादातार रिहायशी इलाके बंगाली महाशयों ने बसाए थे । साउथ ऑफिसपारा, नार्थ ऑफिसपारा, पीपी कंपाउंड, बर्दवान कंपाउंड, लालपुर, बहु बाजार और भी कई । जाहिर है इस शहर में सबसे ज्यादा धूमधाम से दुर्गापूजा मनाई जाती थी जो आजतक बरकरार है पर अब उसमें कृतिमता का समावेश हो गया है । पूरा शहर 50 वर्गमील में नापा जा सकता था । दूसरी तादाद बिहारी मुस्लिमों की थी जो कांके, हिंद्पिडी, डोरंडा व् कर्बला चौक में रची-बसी थी । 1960 के दशक में रांची में आगमन की जैसे क्रान्ति आ गयी थी ।डोरंडा के मेरे घर से तीन किलोमीटर दूर करीम १५० मीटर की ऊंचाई पर एअरपोर्ट के सामानांतर सड़क पर गुजरती गाड़ियां दिखती थी और मैं अपनी बस को आते हुए दस मिनट पहले ही देख लेता था और समय पर स्टैंड पहुँच जाता था.
1958 में हैवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन की स्थापना रांची को पूरी तरह बदलने वाली थी । 25000 से ज्यादा बहाली होने वाली थी । आलम यह था कि बहुतेरे लोग डरे-डरे रांची आते थे । अफवाह थी कि लोगों को पकड़ कर बहाली कर दी जाती थी । ऐसा हुआ भी था ।
स्कूलिंग का दौर ख़त्म करके, मैंने कॉलेज में दाखिला ले लिया था । सुबह उठने के लिए अलार्म की आवश्यकता नहीं पड़ती थी । ट्रकों में लदी हुईं आदिवासी कामगार जिनमे लड़के-लडकिया बराबर की तादाद में होती थी, बहुत ही मधुर समूह गीत गाते गुजरते रहते थे, कभी-कभी मांदर की थाप भी सुनायी देती थी । बाकी का दैनिक संगीत समारोह हरे-भरे पेड़-पौधों से ढके शहर पर तैरते-झूमते पक्षियों का कलरव पूरा कर देता था । राची पक्षी पर रखे नाम के इस शहर को अंग्रेजों ने 1927 में रांची नाम दे दिया था । डोरंडा जहां मैं रहता था, वह दोरं= संगीत और डाह=जल की संधि से बना था । पास ही स्वर्णरेखा नदी बहती थी । तब पास के ऑफिसपाड़ा मोहल्ले में एक बंगाली बुजुर्ग पियानो बजाया करते थे । पहली बार मैंने पियानो देखा । मैं महान बंगला फिल्मों के निर्देशक ऋत्विक घटक को नहीं जानता था । वे महाशय उनके करीबी थे और ऋत्विक उनके घर आया-जाया करते थे । संगीतमय पर्यावरण कैसा होता है मुझे महसूस होता था ।
बादल और बारिश के लिए तो जैसे रांची एक पसंदीदा जगह थी । किसी भी महीने, कभी भी बारिश हो जाया करती थी । पर उस दिन सुबह से बादल बरस तो नहीं रहे थे पर उनका गरजना शांत नहीं होता था । 21 अक्टूबर, 1962,शायद रविवार था इसीलिए सबलोग देर से ही सोकर उठे थे । अचानक किसी को महसूस हुआ कि इस तरह का निरंतर गरजना बादलों का नहीं हो सकता था । गौर से देखने पर बादलों के बीच दो-तीन डकोटा प्लेन उड़ते दिखे । उन दिनों सप्ताह में एक बार डकोटा पैसेंजर प्लेन आया करता था । बाहर निकल कर सडक पर देखा तो निसान ट्रक के काफिलों पर बिहार मिलिट्री के गोरखा जवान ज्यादातर 303 रायफल पकडे बैठे जाते दिखे । आठ बजे रेडियो समाचार से पता लगा कि चीन से युद्ध शुरू हो चुका था । जवानों से भरी ट्रकों का एअरपोर्ट की तरफ दौड़ पूरे दिन चली ।
देश के पहले प्रधान मंत्री दिवंगत पंडित जवाहर लाल नेहरु का सबसे मनोरम सपना था हैवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन । वे स्वयम इस कारखाने को देश को समर्पित करने के लिए रांची आये थे । 15 नवम्बर 1963 के तडके हवाई अड्डे जाने वालीं सभी सड़के और गलियाँ जन समुदाय की भीड़ से भर गया था । मैं भी हवाई अड्डे पर लगे बांस के बैरिकेड के खम्बे को पकड़ कर खड़ा था नहीं तो पता नहीं भीड़ मुझे कहाँ धकेल देती । जहाज समय से पहले आकर आकाश में चक्कर लगा रहा था और ठीक समय पर जहाज उतरा । बड़ी ब्यूक कार के खुले हुड पर नेहरूजी बैठे हुए पास में पड़ी ढेरों मालाएं भीड़ पर फेंक रहे थे । कार जैसे ही मेरे समीप आने लगी, मैं बांस के खम्बे पर पैर टिका कर उनकी एक झलक पाने को खड़ा हो गया । एक क्षण को नजर मिली और चाबुक की तरह एक गेंदे के फूलों की माला खम्बे से आकर टकराई । दूसरे ही क्षण उस माला के फूलों की छीना--झपटी हो गयी । मुझे अभी भी याद है नेहरु जी 16 की सुबह उसी तरह हुड पर बैठ कर मेरे घरके सामने से गुजरती सड़क से लौट रहे थे । सफ़ेद गाँधी टोपी, सफ़ेद अचकन और उसके बटन-होल में फंसा सुर्ख लाल गुलाब की कली । मेरी 75 वर्षीय दादी भी मेरे बगल में खड़ी थीं । दादी के नमस्कार का जवाब नेहरु जी ने मुस्कुराकर दोनों हाथों को जोड़ कर दिया था ।
दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे विशाल कारखाने के बनने के बाद रांची बड़ी तेजी से बदलता गया । 60 के दशक के अंत तक आबादी बढ़कर 4 लाख हो गयी । एक नया रेलवे स्टेशन हटिया में बना । हवाई अड्डे का आधुनिकीकरण हुआ । दो और चार पहिया वाहनों की संख्या 30-40 से बढ़कर 25 हज़ार तक पहुँच गयी । नंबर प्लेट BRN से BHV और फिर BHN हो गया । रांची भारत का एक सबसे बड़ा शैक्षणिक हब बन चुका था ।
बहुत कुछ अच्छा हुआ पर कुछ बहुत दुखद भी हुआ । हमलोग पाकिस्तान के विरुद्ध 1967 की लड़ाई तो जीत गए पर तुरंत ही एक बहुत ही दारुण हिन्दू-मुस्लिम दंगे की यंत्रणा झेलनी पड़ी । दशक के अंत में एक और युद्ध का समा बना जिसने पाकिस्तान को दो भागों में बाँट दिया । इसका दूरगामी परिणाम यह हुआ कि आज रांची में सभी दुस्तर कार्य जैसे गाड़ी मरम्मत, भवन निर्माण, फूटपाथ खुदरा बिक्री, ऑटोरिक्शा चालन, मांसाहारी पोषण व् बिक्री जैसे सभी दुस्तर कार्य-व्यवसाय बंगलादेशियों ने सम्हाल रखा है ।
आज रांची दूसरे आम शहरों जैसा हो गया है । अब न पेड़ों की छाँव है और न उनपर चिड़ियाँ चहचहाती हैं, अब तो बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं हैं जो बाहर से एक सन्नाटें में जीवित दिखती हैं; अब आदिवासी युवक-युवतियों का नृत्य डिस्को शैली में 1000 किलोवाट की दिल दहलाने वाली गर्जना की ताल पर होता है । रांची की मासूमियत और शीतलता को मैंने बेबस उधर जाते देखा है जहां से उसका लौटकर आना असंभव है। अब तो रांची जैसे बेशर्मी के साथ शर्माती है अपनी शर्मिन्दिगी पर ! घर से दिखने वाली वह तीन किलोमीटर दूर की सडक कबकी गुम गयी.