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Sunday, August 20, 2017

विदेशी तड़का -3 - रशियन एक्सपर्ट्स !

१९६६ के अप्रैल माह में हमलोग रांची के हैवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन के विशाल टाउनशिप में रहने गए । कॉलोनी का उत्तरी-पूर्वी कोना रूस और चेकोस्लोवाकिया से आये लगभग 600 एक्सपर्ट्स को आवंटित
किया गया था । ज्यादातर एक्सपर्ट्स अपनी पत्निओं के साथ आये थे, सीनियर को बच्चे लाने की भी अनुमति थी । उस इलाके को रशियन हॉस्टल कहा जाता था जो अब झारखण्ड प्रदेश का विधान सभा और अतिथि आवास बन चुका है । इस भूभाग में स्विमिंग पूल के साथ सभी तरह के खेल और खेलने के मैदान थे । पूरे क्षेत्र के लिए एक टीवी डिश अन्टेना लगा था जिसकी पकड़ पूरे विश्व से थी । एक बड़ा सभागार भी था जिसमें सांस्कृतिक प्रोग्राम और फिल्मों का प्रदर्शन भी होता था । उस समय वहीँ नेहरु जयंती भी मनाई जाती थी । हमलोग उस सभागार में आमंत्रण पर आयोजन देखने जाते थे । मैंने वहां आवारा, अलीबाबा चालीस चोर और Crime and Punishment फिल्मे देखी थीं । यही सभागार आज का झारखण्ड विधान सभा है ।
ये विदेशी ग्रुप या झुण्ड में अपनी पत्नियों के साथ शाम के समय घूमने निकलते थे । उसी समय बाजार से खरीदारी भी करते थे । दूकानदार भी काम लायक विदेशी भाष बोलने लगे थे उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए । शनिवार और रविवार जैसे साप्ताहिक अवकाश के दिनों ये लोग सुबह से रात होने तक बाजार, सडको, पर्यटक स्थलों पर मस्ती करते दीखते थे । भारतियों से इनका व्यवहार बहुत ही मधुर था । हमेशा मुस्कुराना, जानने की उत्सुकता और दोस्ती बढ़ने के लिए एक्टिंग के साथ आवारा और श्री 420 के गाने गाना इनकी फितरत थी । नजदीकी को अमली जामा पहनाने के लिए अपने कैमरों से फोटो लेना इन्हें बहुत रास आता था । लेकिन तभी एक हादसे के बाद इनमें एक सहमाहट आ गयी, संबंधों में ठंडापन दिखने लगा ।
22 अगस्त 1968 को रांची में भारतवर्ष का बहुत बड़ा दंगा हुआ । सैकड़ों की जाने गयी । हमेशा की तरह अल्पसंख्यकों ने अप्रत्याशित तरीके से शुरुआत करके की । चुकी HEC हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र था इसलिए सीमावर्ती क्षेत्रों में यादवों ने कसकर बदला लिया । ये एक्सपर्ट्स कुछ घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी थे ।
1969 में HEC ज्वाइन करने के कोई छह महीने लगे इन विशेषज्ञों से इतनी जान-पहचान बढाने में की हमलोग अब दिल खोल कर बात करने लगे । एक दिन उन्होंने 1968 के दंगों का अनुभव बताया जो किसी को भी क्षुब्ध और चकित कर देता ।

उन्होंने बताया की पिछली सदी में विश्व में उनके रूस के कुछ इलाकों और जातियों को बारबैरियन (बर्बर, खूंखार और जंगली) कहा जाता था । वे अपने दुश्मन का होशोहवास में खाल छील कर उतार लेते थे । पूरे समय दुश्मन इसके लिए मानसिक रूप से तैयार रहता था । अगर इसके बाद भी उसकी मौत नहीं होती थी तो उसका गला काट दिया जाता था । पर उनलोगों ने दंगो के शुरूआती दिनों में सुबह की सैर के समय जो कुछ देखा वह उससे भी भयानक था । नाले के अन्दर छुपे परिवार को पहले दंगाई दुलार- पुचकार कर बाहर निकालते थे और उसके बाद छोटे-छोटे चाक़ू से गोंद-गोंद कर मार डालते थे । एक चार वर्ष के बच्चे को तो उन्होंने पैर पकड़ कर घुमाया और दीवार पर दे मारा । एक आदमी को दौडाते-दौड़ाते पानी से लबालब भरे कूएँ में गिर जाने दिया और जब भी उसका सर ऊपर आता उसे लाठी से पीटकर फिर पानी के अन्दर डूब जाने देते । यह खेल 15 मिनट तक चलता रहा ।  हमलोगों के सर पर जब खून चढ़ता है तो सीधे गोली मार देते हैं । इस सदी में भी ऐसा कुछ होता होगा विश्वास नहीं होता । आपलोग तो हिन्दू हो बुद्ध, महावीर , महांत्मा गाँधी के देश के !

1970 के दशक में एक्सपर्ट्स की संख्या कम होती गयी  । 1980 के दशक में आवश्यक तकनीकी क्षेत्रो में ही उन्हें आमंत्रित किया जाता । 

Saturday, July 18, 2015

सिनेमा सिनेमा - 1 !

आजादी मिलने के दशक में मनोरंजन का सबसे अहम् साधन सिनेमा ही हुआ करता था. न किताबी ज्ञान की जरूरत, न भाषा ज्ञान की दिक्कत और सबसे मजेदार बात ये कि लोग अपने-आप को उस फिल्म के किसी चरित्र से  भावनात्मक और मानसिक रूप से जोड़ लेते थे. कुछ तो जिस्मानी तौर पर भी जो राह चलते दिख जाया करता था, ज्यादातर कपडे पहनने और बाल सवारनें में उस समय के फ़िल्मी पात्रो की बखूबी नक़ल होती थी.
मेरा फ़िल्मी ज्ञान चार]बरस की उम्र से ही ही गया था. तब मैं जमशेदपुर में रहता था. मेरे पड़ोस में रहने वाली दीदी की शादी तय हुई थी. वे बहुत आतुरता से तैयारी में लगी थी पर चुपके चुपके. अब शादी होकर ससुराल जाएगी तो गाने की फरमाईश तो होगी ही पर उन्हें औरो की तरह समझदारों को सुनाने में झिझक होती थी . दीदी दोपहर को मुझे टॉफी वगैरह का लालच देकर बुला लेती थी. पहले रिकॉर्ड बजाकर सुनाती, फिर उसी लय में गाना गाती और मुझसे उसकी गुणवत्ता पर चर्चा करती. गाना वे बहुत अच्छा गाती थी और मैं तारीफ़ भी कुछ कम नहीं करता था. गाने के बोल थे “ अब रात गुजरने वाली है”. हारमोनियम के साथ उनकी आवाज बहुत मीठी और मनभावन लगती थी.
एक दिन हम तीनो भाई सरकारी क्वार्टर के गेट पर लगे नल पर नंगे नहा रहे थे. तभी फ़िल्मी होर्डिंग लगी जीप सड़क से वही गाना बजाते गुजरने लगी. भोपूं पर आवारा फिल्म की जानकारी दी जा रही थी और इश्तेहार बिखराए जा रहे थे. हम तीनो भाई इश्तेहार लूटने दौड़ पड़े. बड़े भाई ने तौलिया लपेट लिया था जो रस्ते में ही बदन से गिर गया दौड़ते-दौड़ते. मेरे बदन पर साबुन लगा था. छोटा भाई रोते-रोते हम दोनों तक आना चाह रहा था, जिस हंसी के साथ अनाउन्सर ने हमलोगों की तरफ इश्तेहार झोंका वह अभी तक नहीं भूलता है. तीनो को पर्चे मिल गए जो रिकॉर्ड था नहीं तो कभी एक या कभी एक भी नहीं. चाहे सोते रहें या दूर खेलते रहे, इश्तेहार बटोरना हमलोगों का एक मनपसंद शगल था.

पिताजी को फिल्मों से लगाव नहीं था, पर मजिस्ट्रेट होने के नाते बालकनी में अव्वल सीट खबर भिजवाने पर पूरे परिवार के लिए रिज़र्व हो जाया करती थी वह भी पहले दिन-पहले शो में . पिताजी को छोड़कर पूरा परिवार फिल्म देखने जाया करता था . लम्बे सोफे पर जिस किसी बच्चे को नींद आने लगती थी वह लेटे-लेते देखता हुआ सो जाता था जिसे बाद में चपरासी गोद में लेकर वापिस घर ले आता था. मुझे याद है,आवारा फिल्म. मैंने आवारा का टाइटल गाना पूरी तन्मयता के साथ, “एक बेवफा से प्यार किया” लेटकर और “अब रात गुजरने वाली है” नींद से जागकर भौचक हो देखा था. अच्छा तो यही गाना दीदी रिहर्सल करती रही थी. दूसरी सुबह मैं अपने बाल राजकपूर स्टाइल में सवार और बिन-बुलाये दीदी के पास पहुँच गया. उन्होंने 5-6 बार दोनों गाना गाकर सुनाया. वहीँ खाना खाकर सो भी गया. शाम को दीदी ने उसी तरह मेरे बाल सवार कर मुझे मेरे घर के अन्दर गोदी में लेकर पहुँचाया. पिताजी ऑफिस से आ गए थे. दरवाजा बंदकर उन्होंने मुझे मेरे जीवन का पहला थप्पड़ रसीद किया- “ बरखुरदार अभी से जुल्फी काढने लगे”. दूसरी सुबह रंगरूट स्टाइल में हजामत बनी.