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Tuesday, May 19, 2020

मुठिया प्याज़ !

1962 में देवानन्द और साधना की एक बहुत ही साफ-सुथरी फिल्म देखी थी। नाम था “असली नकली”। नायक का पिता एक बहुत अमीर व्यवसायी था। बेटे की फिजूलखर्ची उससे बर्दाश्त नहीं होती थी। एक दिन झगड़ा बहुत बढ़ गया। बेटा घर से निकल गया। दिन भर का भूखा-प्यासा, रात को उसकी भेंट एक छापेखाने के मजदूर से होती है। मजदूर को नायक की बदहाली देखी नहीं जाती है। वह नायक को अपनी खोली ले जाता है। उसकी बहन रोटी-सब्जी के साथ एक मुठिया प्याज़ खाने को देती है। मजदूर बड़े चाव से खा लेता है। नायक को प्याज़ की तेज़ी से हिचकी आने लगती है। फिल्म में तो और भी बहुत कुछ था पर मुठिया प्याज़ आज़माने वाली चीज़ जान पड़ी। रात के खाने में जब रोटी-सब्जी परोसी गई तो मैं एक प्याज़ भी चौके से उठा लाया। फिल्म में प्याज़ घुटने पर रख कर तोड़ा गया था। मैंने जमीन पर रखकर मुट्ठी से मारा। प्याज़ तो टूटा नहीं अलबत्ता हथेली में अच्छी-ख़ासी चोट आ गयी। बात आयी गई भूल गई।

1968 में MSc की लिखित परीक्षा होने के बाद मुश्किल से 10 छात्र बचे थे गांगुली फ्लॅट हॉस्टल में, जिन्हे प्रैक्टिकल परीक्षा देनी थी। उस दिन कॉलेज से डेट्स लेने के बाद मैं कुछ देर के लिए गांगुली फ्लॅट रुक गया। मित्रों के साथ समय बिताना बहुत प्रिय लगता है। वह भी तब जब की यह मालूम हो की परीक्षा खत्म होने के बाद बिछुड्ना है। भूख भी लग गई थी। सोचा था दोस्तों के भोजन का समय है, वही खा भी लेंगे।

हॉस्टल में तो माँजरा ही अलग था। मेस मैनेजर घर लौट गया था। भंडार में आटे के सिवा कुछ भी नहीं था। सब एक दूसरे का मुंह देख रहे थे। कारण था सबकी फटेहाली थी। तभी रतनेश्वरी चिल्ला उठा – उरेका ! सबलोगों ने 50 पैसे उसके हाथ पर रखे। उसने महाराज को रोटी सेकने को कहा। 10 मिनट में वह प्याज़ से भरा थैला साथ में हरी मिर्च और पाव भर सरसों तेल लेकर लौटा। सबकुछ 5 रुपये के अंदर हो गया था।

तंदूरी रोटी जैसी दिखने वाली मोटी, बेहतरीन सिकी रोटी , किसी को 1 किसी को 2 और एक को 4 परोसी गई। साथ में 2-2 प्याज़ और 2-3 हरी मिर्च। सरसो तेल से भरी कटोरी पूरे टेबल पर घूमने वाली थी। मुठिया प्याज़ सबने सुन रखा था पर आज़माया बिरलों ने ही था। 5 जन कामयाब हुए और बाकियों का प्याज़ मिसाइल बना हुआ था।

मेरी निगाहें रतनेश्वरी के हाथों पर टिकी थी। मैंने उसी की तरह प्याज़ को टेबल की दरार का सहारा दिया और एक मुक्का लगाया। प्याज़ एक ही वार में दो फांक। रतनेश्वरी गाँव से था । उसे मेरे जैसे शहरिया से बिलकुल उम्मीद नहीं थी। उसके मुंह से बेसाख्ता निकल गया – वाह ! खाने में तो बहुत आनंद आया पर सबकी भाव-भंगिमा देखते ही बनती थी। प्याज़ और सरसो तेल की मिली-जुली तीखी झाँस और मिर्च की तीताई। जिसका रोटी से पेट नहीं भरा, उसकी कमी पानी ने पूरी कर दी।

अंधेरा होने के पहले और पिताजी के ऑफिस से लौटने के पहले घर लौटने की आदत थी। दिन में एक ही रोटी खाई थी। भूख बड़े जोरों से लगी थी। मेरे भाई बहन भी कोई कॉलेज से , कोई स्कूल से और कोई खेल कर लौटे थे। सभी को बड़े जोरों की भूख लगी थी। माँ और दादी पड़ोस के घर गए थे। रसोई मे डब्बे के अंदर काफी रोटियाँ रखी थी। कुछ देर कुलबुलाने और झुंझलाने के बाद मैंने दोपहर का वाकया सांझा किया। फिर क्या था। एक थाल पर रोटियाँ रखी गई। साथ में नमक। नमक में ही सरसो तेल मिलाया गया। हरी मिर्च का झुंड भी एक ही जगह रख दिया गया। जिसको खाना होगा, ले लेगा। मेरी देखा-देखी मेरे भाइयों ने भी सफलतापूर्वक प्याज़ भेदा, अपने लिए भी और छोटे भाई-बहनों के लिए भी। हमलोग वहीं बरामदे में जीमने के लिए बैठ गए।

हमलोगों ने 1-2 निवाला मुंह मे रखा ही था की सामने के दरवाजे से पिताजी आ गए और पीछे के दरवाजे से माँ और दादी। मिरचा-प्याज़ और सरसो तेल का सेवन हमलोग कर रहे थे। मुंह उनलोगों का लाल हो रहा था। पानी उनकी आँखों में आ रहा था। हर रोज की तरह उस दिन किसी से भी कोई डांट नहीं मिली।

उस रात सबके भोजन का पहला कोर्स था रोटी, सरसों तेल से भींगा नमक, हरी मिर्च और मुठिया प्याज़ ।

Wednesday, May 13, 2020

कुछ बात तो थी ! पटना कॉलेजिएट 1957-59

अविस्मरणीय शब्द का अर्थ तब समझ में आता है जब बचपन के मित्रों के साथ बीते क्षण बरबस याद आते हैं; स्कूल में गुजारे दिन और उसके प्रांगण का चप्पा-चप्पा सिहरन पैदा कर देता है, स्कूल के शिक्षक किसी रंगमंच के कलाकार की तरह अवतरित होते रहते हैं और मन बरबस आहें लेने लगता है – जाने कहाँ गए वो दिन।

हम मित्रों का जमघट पास के काँग्रेस मैदान में शाम को अवश्य लगता था। जब मैंने पटना कालेजियट स्कूल में अपने दाखिले की बात अपने मित्रों को बताई तो तरह-तरह की प्रतिक्रिया मिली। सैंट ज़ेवियरस के विजय ने हँसते हुए कहा की वहाँ तो सातवी क्लास मे इंग्लिश की पढ़ाई शुरू होती है A,B,C,D से। राम मोहन स्कूल के रमेश ने कहा कि कालेजियट में लड़कियां नहीं पढ़ती। सबसे खराब बात पाटलिपुत्र के अंतु ने कहा - कालेजियट के पहले उस इमारत में पगला हॉस्पिटल था। जब वहाँ मौजूद मेरे साथ दाखिला लेने वाले और मित्र उलझ पड़े तो उसने कहा – अच्छा देखना ! बिल्डिंग “H” आकार का है – H का मतलब हॉस्पिटल। इसी तरह मेरे बड़े बड़े भाई ने बताया था कि आद्या सर के क्लास में एकदम शांत बैठना। वे मिलिटरी से आए हैं । बहुत सख्त हैं। नाराज होने पर कहते हैं – चट गिरेगा, पट मरेगा।

आद्या सर को मैं भूल चुका था। पीरियड के मध्य का अंतराल कितना कोलाहल वाला होता है यह बताने की आवश्यकता नहीं। दूसरे सप्ताह के किसी दिन तीसरे पीरियड में उनका आगमन हुआ। तिकोना सांवला चेहरा, छोटी-छोटी मूछें और बड़ी-बड़ी आँखें- एकदम चौराहे पर लगे पोस्टर के खलनायक की तरह। तब हमलोग का सिनेमा से सामना मात्र पोस्टर तक ही हुआ करता था। उन्होने अपना परिचय देने में एक सेकंड की भी देरी नहीं की। टेबल पर हाथ पटकते हुए दहाड़े – चट गिरेगा पट मरेगा। एक लड़का खिड़की के सिल पर से उठने की कोशिश कर रहा था। उसे बोले – ऐसा थ्रो करेगा की 303 के गोली माफिक गंगा पार चला जाएगा। क्लास में सन्नाटा छा गया। गनीमत थी की वे पूरे सत्र में हमारे क्लास में स्टॉप-गैप की भरपाई करने 3-4 बार ही आए। जब भी आते हमलोग सांस भी तमीज़ से लेते। आद्या सर बंगला के शिक्षक थे और एन०सी०सी० के भी । परन्तु जिस क्लास में भरपाई करने आते उसी विषय को पढ़ाते । वर्ड्सवर्थ की "द रेनबो" मैंने पहली बार उन्ही के मुख से सुनी थी ।


1950 के दशक में हफ्ते में बुधवार को एक पीरियड होता था extra curricular का। आज की पीढ़ी के लिए यह मात्र once upon a time भर के लिए विस्मयकारी ही होगा। इस पीरियड में छात्रों को तकली और चरखे से सूत कातना सिखाया जाता था। ऐसा बना सूतों का गट्ठर खादी ग्रामोद्योग वाले ले जाते थे। काष्ठकारी(बढ़ई) सिखायी जाती थी। सीनियर छात्र टेबल, कुर्सी, बेंच इत्यादि बड़ी कुशलता से बना लेते थे जिनका उपयोग क्लास मे होता था। एक हफ्ते ड्राइंग भी सिखायी जाती थी। उस दिन क्लास के तीनों सेक्शन बीच वाले हाल में आ जाते थे। बीच वाला हाल तो समझ रहे हैं न- H के दोनों डंडों को जोड़ने वाला। Extra curricular सर का व्यक्तित्व तो आज भी नजर के सामने दिखता है पर नाम याद नहीं आ रहा है। कद-काठी, चेहरे, डीलडौल और पहनावे से कुछ-कुछ अमर कथाकार प्रेमचंद ! एक और दारुण समानता। प्रेमचंद को मात्र चित्रों में ही देखा, उनकी बोली नहीं सुनी। सर की बोली भी कभी नहीं सुनी। किसी से सुना था की इनका चेहरा और दाया हाथ लकुवा-ग्रस्त था। ये क्लास में आते। एकदम बुनियादी से शुरू करते। अगर एक घड़ा बनाना होता तो पहले एक खड़ा क्रॉस बनाते।  20 फूट लंबे ब्लाकबोर्ड पर वह 3-4 ड्राइंग बनाते। अंत में एक बार वे पूरी गॅलरी में ऊपर से नीचे घूम कर सबकी कौपी देखते। किसी किसी की कॉपी में कुछ सुधार करते। तबतक घंटी बज जाती। वे जैसे शांत आए थे वैसे ही निकल जाते। श्रद्धा की पराकाष्ठा इनके क्लास में देखने मे आती। शुरू से अंत तक हमलोग मौन-मुग्ध उनको और बाएँ हाथ से खिची रेखाओं को निहारते रहते। यह मेरे जीवन का एक नायाब क्लास रहा जिसमें पूरे समय शिक्षक और छात्र दोनों खामोश रहते।

संस्कृत के अध्यापक जैसा व्यक्तित्व मुझे दोबारा नहीं दिखा। 55 के रहे होगें पर लगते थे 65 के। शायद मुंह में बहुत कम दाँत होने की वजह से। खादी का लंबा कुर्ता, खादी की धोती और सर पर गांधी टोपी। पहले दो वर्ष हमलोग उन्हे बरामदे में ही देखते थे। शायद इसलिए की संस्कृत 9वें से पढ़ाई जाती थी। जब भी वे प्रसन्न रहते, संस्कृत के पद्य शुद्ध उच्चारण के साथ गा कर सुनाते. उनमें शायद कालिदास की कवितायें भी रहती.हम सभी समझते तो बहुत कम पर मंत्रमुग्ध होकर सुनते . शुक्रवार को वे अपने साथ अपने साथ दो बालक भी लाते। कारण बहुत लाजवाब था। शुक्रवार को छात्रों को स्पेशल टिफ़िन दिया जाता। कभी पूआ, कभी जलेबी, कभी बर्फी और कभी बुँदिया-सेव।

संस्कृत के अध्यापक  किसी गद्य-पद्य का हिन्दी अनुवाद लिखने को दे देते। स्वयम वे कुर्सी पर दोनों पाँव समेटे तुरंत खर्राटा लेने लगते। हमलोगों के कोलाहल से उनकी नींद भंग हो जाती। इसके बाद हमलोगों की ताजपोशी शुरू होती। किसी को बुलाकर थप्पड़ मारते, किसी का कान उमेठते तो किसी की पीठ पर हथोड़ा मरते। सबसे ज्यादा शामत अखिलेश की आती। उसे तो बिना किसी शिकायत के मारते। कभी-कभी तो क्लास मे आने के बाद पहला काम अखिलेश की ठुकाई हो गया। एक दिन क्लास शुरू होते ही अखिलेश भोंकार मार के रोने लग गया। मिश्रा सर भी भौचक देखने लगे। उन्होने अखिलेश को पास बुलाया। उसका सर सीने से लगाकर बहुत पुचकारा-दुलराया। कुछ कहा भी। अगले दिन से नींद में खलल पड़ने पर अखिलेश को छोड़ कर वे किसी को भी ठोकते रहते। बहुत मनौना करने पर एक दिन अखिलेश ने राज खोला । उसके घर के गेट के अंदर पेड़ पर शहद से लबालब भरा बहुत बड़ा मधुमक्खी का छत्ता था।

शायद सबसे लोकप्रिय शिक्षक अयोध्या सर ही थे. वे गेम टीचर थे. खेल के मैदान के उत्तर-पूर्व कोने में उनका क्वाटर था. उसी घर के प्रांगण में वार्षिक सरस्वती पूजा हुआ करती थी. उस दिन भोज भी हुआ करता था. भोज मात्र स्कूल के शिक्षकों, छात्रों और स्टाफ तक ही सीमित नहीं था, कोई भी सम्मलित हो सकता था. एक शाम अयोध्या सर ने हमलोगों को कदम कुआँ के कांग्रेस मैदान में फुटबाल खेलते देख लिया. फूटबाल के लिए हमलोग रबर के बड़े बाल का प्रयोग कर रहे थे. दूसरे दिन मुझसे मेरा नाम रजिस्टर में दर्ज कर एक नया फुटबाल खेलने के लिए दिया. अयोध्या सर सभी बड़े खेलों में रेफरी बनते थे. सभी स्कूल उनके निर्णय का आदर करते थे.

इंटरनेट पर बहुत सर्फिंग के बाद यह कड़वा सच सामने आ ही गया। अंग्रेजों ने बाकरगंज, पटना में अंग्रेज़ सैनिकों के लिए एक पागलखाना बनाया था। उस परिसर में बाद में  1857 के आसपास पटना कालेजियट स्कूल लाया गया।
नोट :- वस्तुतः पटना कॉलेजिएट परिसर उन अंग्रेज सैनिकों के लिए था जो युद्ध की विभीषिका को नहीं झेल पाते थे और अवसाद से ग्रसित हो जाते थे. ज्यादा जानकारी के लिए  पागलखाना(Patna : A Paradise Lost)  क्लिक करें.


Sunday, March 29, 2020

कन्हैया नाई

आजकल शहर के किसी भी साधारण सैलून में बाल कटाई के 40 रुपये से लेकर 60 रुपए तक लगते हैं। मेरे पिताजी बताते थे की उनके बाल्यावस्था में एक भी पैसे नहीं लगते थे। तब नाई को समय-समय पर कच्चा दिया जाता था – मतलब खेत की पैदावार से। गाँव या शहर का नाई एक घरेलू सदस्य की तरह होता था। पूजा-पाठ, शादी-ब्याह और श्राद्ध में उसकी अहम भूमिका होती थी। आज भी है। शायद सनातन काल से नाई, ब्राह्मण को मिलने वाले धन का एक तयशुदा प्रतिशत लेता है। कितना कच्चा या कितना प्रतिशत इस झमेले में बिना पड़े मैं अपने संसमरण पर आगे बढ़ता हूँ।

बाल्यावस्था में , घर के बड़े-बूढ़े घर के बच्चों पर एक भरपूर नजर डालते थे और नाई को खबर कर दी जाती थी। आम के पेड़ की छाव में बैठने के लिए एक पत्थर रखा जाता था। बारी-बारी से सभी बच्चे की बाल कटाई होती थी।

मुझे अपनी बाल कटाई की याद पटना शहर (1953) जुड़ी  है। घर के ओसारे पर पैर लटका के बैठा दिया जाता था। एक चादर से शरीर ढँक दिया जाता था। सिर एकदम नीचे- इतना नीचे की एक मिनट में दर्द करने लगे। तब सिर पर नाई की चपत पड़ती थी। पहले एक हाथ वाली मशीन से पीछे और बगल के बाल साफ किए जाते थे। मशीन बिना हटाये अगर बालों से अलग की जाती तो चीख निकाल जाती। उसके बाद सिर को पानी से तर किया जाता था। ठंड के मौसम में पूरा शरीर काँपता था। उसपर एक हुड़की और पड़ती थी। अंत में उस्तुरे से फिनिशिंग टच दिया जाता। अगर दादी-दादा में कोई आस-पास रहा तो उस्तुरा न चलाने की हिदायत दी जाती। जो स्टाइल सामने आता उसे आजकल कटोरा-कट या रंगरूट कट कहा जाता है।

पटना में घर के पास ही चौरस्ता था। आते-जाते सैलून में बाल कटाते लोग दिख जाते - शान से कुर्सी पर बैठे, बड़े से शीशे के सामने। स्कूल में सहपाठी कटोरा-कट स्टाइल देख कर मज़ाक बनाते। तो एक बार, इकन्नी जमा होने पर मैं भी सैलून गया। छोटा होने के कारण कुर्सी के हत्थे पर तख़्ता रख मुझे सेट किया गया। बाल तो राज कपूर स्टाइल में कट गया पर घर आते ही पिटाए हो गई – जनाब जुल्फी बनाकर आए हैं। तुरंत नाई को बुलावा भेजा गया।

जीवन में 20-25 नाइयों से पाला पड़ा होगा। मालूम नहीं ज़्यादातर नाइयों का नाम कन्हैया क्यों होता है। मेरे होश के पहले नाई का नाम भी कन्हैया था। कोई 20-22 वर्ष का रहा होगा। हल्की मुंछे थी। शादी हो गई थी पर गौना नहीं हुआ था। गौना का मतलब उसीने समझाया था। किस्से बहुत सुनाता था। हजामत बनवाने की तकलीफ आधी तो उसकी कहानियों में छिप जाती थी। कहानी बहुत संस्कारों वाली नहीं होती थी। एक कहानी वह 2-3 बार सुना चुका था। वही जंगले के पेड़ के सामने अपनी व्यथा कहना – उस पेड़ की लकड़ी से बांसुरी बनना और बांसुरी का राजा के सामने बजना। एक बार उसने देखते-देखते पीपल के पत्ते से पिपहरी बनाकर दी। मजा आ गया।

कन्हैया जिस घर में रहता था वह हमलोगों के पिछवाड़े पानी टंकी के बगल का दोमंज़िला मकान था। बहुत सारे किस्से उस घर के भी होते थे। जैसे उस घर में रेडियो आ गया था – घर में फ्रीड्ज था – आम,अमरूद के पेड़ थे वगैरह। हाँ, उस घर में एक भूत भी रहता था। भूत के वह बहुत सारे किस्से सुनाता था। इसलिए हमलोगों में किसी को भी उसके घर जाने की हिम्मत नहीं पड़ती थी। आश्चर्य अवश्य होता था की एक गरीब नाई जो हमेशा वही पुरानी धोती-कमीज़ में आता है, उसका इतना बड़ा घर कैसे होगा।

2-3 वर्षों बाद हमलोगों की उम्र पतंग उड़ाने वाली हो गई। पर हैसीयत दो पैसे से ज्यादा की नहीं थी। एक या दो पतंगों से पूरा मौसम निकालना होता। कभी पसंगा, कभी चिप्पी, कभी लंबी दुम तो कभी कटी पतंग के पीछे भागम-भाग। एक बार पतंग तागे के साथ हाथ से छूट गई। यह तो बहुत बड़ा नुकसान था। हमलोगों की छत से फिसल कर वह कन्हैया नाई वाले छत पर अटक गई। हमलोगों को काटो तो खून नहीं वाला हिसाब हो गया। कैसे जाएँ उस घर में तो भूत रहता है।

हम दो भाई दौड़ कर सामने वाले मुसलमान के घर गए। जैनू और आबिद ने कह रखा था की उन्हे भूत-प्रेत से डर नहीं लगता है। उनके पास एक मंत्र है। उसे पढ़ते-पढ़ते वे किसी भी भूतहे जगह जा सकते हैं। हमलोगों ने आबिद और जैनू से मिन्नते की। उन्हे घर में लगे आम के पेड़ से टिकोरे खिलाने का वादा किया। आनन-फानन हमलोग उस घर के नजदीक पहुंचे । रास्ते भर में आबिद ने वह मंत्र हमलोगो को भी रटा दिया- जलतू जलालतू आई बाला को टाल तू ।

गनीमत थी की ऊपर जाने के सीढ़ी बाहर ही से थी - एक तल्ला बाहर से उसके बाद दरवाजे के अंदर से। दरवाजा खुला था। ढलती दोपह का समय था। शायद घर के सभी लोग सोये हुए थे। कन्हैया भी सो रहा होगा। चुपके से हमलोग ऊपर छत पर चले गए। पतंग छुड़ाई। धागा बटोरा। नीचे खिसक लिए। पूरे समय वही मंत्र जुबान पर था। ये सभी उर्दू शब्द- जुबान, गनीमत, मिन्नत, आबिद से ही सुनकर सीखा था।

नीचे उतरने के बाद जान में जान आयी। मस्ती सूझना स्वाभाविक था। अब अगल-बगल सब कुछ दिखने लगा था। सबसे अजीब बात ये दिखी की जमीनी सीढ़ी की उड़ान(फ्लाइट) के नीचे की तिकोनी जगह जिसमें मुश्किल से एक रिक्शा रखा जा सकता है, एक टाट के पर्दे से ढका था। हम सबों को कौतूहल हुआ की ऐसा क्यों है, उसके अंदर क्या है। हमलोगों ने टाट के फाड़ से झांक कर देखा। गुजरती दोपहरी में बेंच पर एक आदमी सोया खर्राटे ले रहा था। बेशक वह भूत नहीं था। बेंच के नीचे एक बक्सा था। बेंच के पैरों के पास कुछ बर्तन रखे थे। दीवार पर एक रैक भी था। उसपर कुछ डब्बे रखे थे। मतलब ये की पूरी गृहस्थी थी। सोया हुआ नौजवान कन्हैया था।



Thursday, March 19, 2020

दुर्गा

1973 के आसपास दुर्गा मृतप्राय अवस्था में पिताजी को मिला था। जनवरी की कड़ाके की ठंड में , बेली रोड, पटना के अपने निवास स्थान को सुबह की सैर के बाद लौटते हुए उन्हें अचानक सड़क के किनारे कोंक्रीट की ढेर पर एक 12 वर्ष का बेहद खूबसूरत बालक बेहोश पड़ा दिखा। दो रिक्शेवालों की मदद से उस बालक को घर लाया गया। कुछ देर बाद उसे होश तो आ गया पर उसका शरीर बुखार से तवे की तरह गरम था। उसे फ़ोरन पास के हॉस्पिटल ले जाया गया। उसे निमोनिया हो गया था। एक हफ्ते बाद वह स्वस्थ होकर हमारे घर लौटा।

दुर्गा कुलीन ब्राह्मण परिवार का नेपाली था। वह नेपाल से अपने पिता के साथ 1971 में पटना आया था। उसके पिता अपने भाइयों से लड़कर, पटना आ गए थे। यहाँ उन्हें रात को दरबानी करने का काम आसानी से मिल गया था। उनकी मौत डाकुओं से सामना करते हुई। बम विस्फोट की भयंकर आवाज़ से दुर्गा एक कान से बहरा हो गया था। उसके दाहिने पैर मे भी काफी चोट आई थी। अनाथ दुर्गा को कोई भी सहारा देने को तैयार नहीं हुआ। यहाँ तक की किसी ने उसे नेपाल लौट जाने में भी सहायता नहीं की। उसे एक ढाबे में काम मिला। वहाँ भी उसके साथ लोग बदतमीजी करने से बाज नहीं आते। दो दिनों का, भूखा-प्यासा , भटकते हुए आखिर सड़क के किनारे पड़े कोंक्रीट की ढेर पर निढाल गिर पड़ा। मालूम नहीं उसे नींद आ गयी या उससे पहले बेहोशी।

दुर्गा हमलोगों के घर में रहने लगा। माँ को रसोई में हाथ बटाता। शाम को मेरे हमउम्र भाई-बहनों के साथ खेलता। शाम को सभी के साथ पिताजी उसे भी पढ़ने को बैठाते। वह दिन उसके अतीव आनंद का था जब उसने अपनी बहन के लिए पोस्टकार्ड लिखा। दौड़-दौड़ कर सभी को पत्र दिखाता। पते में उसने बहन का नाम, गाँव का नाम, तटकाठमांडू से 10 कोस दक्षिण और नेपाल लिखा था। अगले दिन वह सुबह-सबेरे चौमुहानी के पोस्टबैग में पत्र न डाल, पोस्ट ऑफिस जाकर पोस्ट किया। दूसरे दिन से ही वह पत्र का बाँट जोहने लग गया था। हमलोगों के साथ पोस्टमैन भी परेशान हो गया था। कोई दो महीने बाद पत्र का जवाब आ ही गया । खुशी के मारे उसकी रुलाई रुकती ही नहीं थी। सबसे बड़ी बात की वह अपने परिवार से संपर्क साधने मे कामयाब हो गया था। 

मै तब रांची में कार्यरत था। होली की छुट्टी में मैं जब पटना गया तब वह मेरी बहुत खुशामद करने लगा। कारण उसकी सबसे बड़ी बहन और बहनोई रांची एग्रिकल्चर कॉलेज में रहते थे। दुर्गा का बहनोई वहाँ माली का काम करता था। मै और मेरा छोटा भाई मिलकर खाना बनाते थे। तकलीफ तो होती ही थी क्योंकि मेरी शिफ्ट ड्यूटि थी और छोटा भाई जो उस समय कॉलेज में पढ़ता था उसे कूकिंग की कोई जानकारी नहीं थी। उस बार तो नहीं पर 3 महीने बाद जब मै पुनः पटना गया तो माँ ने मुझसे शिफारिश की। दुर्गा आखिर कामयाब हो गया।

अब हमलोगों को नाश्ता, टिफ़िन और दोनों टाइम खाना मिलने लगा। रविवार को जब वह अपनी बहन-नहनोई से मिलने जाता तभी मांसाहारी भोजन बनाता। दुर्गा शाकाहारी था । सबसे बड़ी बात की वह बिना स्नान किए चौके में नहीं जाता था। एक बार मैं देर से सोकर उठा। सुबह 6 बजे की शिफ्ट थी। मात्र 10 मिनट ही थे कंपनी की बस के आने में। दुर्गा भौचक जागा। सीधे बाथरूम जाकर अपने ऊपर एक बाल्टी पानी डाला। मेरी टिफ़िन तैयार कर मेरे पीछे दौड़ टिफ़िन मेरे हाथ मे थमा दी।

रात को वह मेरे और भाई के बिस्तर के बीच फर्श पर नीचे सोता। उसे कहानी सुनाने का बहुत शौक था। उसकी कहानी ज़्यादातर धारावाहिक होती थी। कभी वह कहानी सुनाते-सुनाते सो जाता था, कभी हमलोग कहानी सुनते-सुनते सो जाते थे।

उसे नए कपड़े पहनने का बहुत शौक था। जब भी हम भाइयों में से कोई भी कपड़ा सिलवाता तो उसके लिए भी एक जोड़ी बनवाना अनिवार्य था। पहली बार तो हमलोगों से नासमझी हो गई तो वह कई दिनों तक मुंह फुलाए रहा। एक बार वह मेरे साथ मेरे ऑफिस की पिकनिक में गया। मेरे सहयोगी उसे मेरा कज़न समझ बैठे। समझते भी क्यों नहीं ? देखने में एकदम मास्टर रतन, नए कपड़े और जूते और बोली भी शुद्ध हिन्दी थोड़ी नेपाली तरावट लिए। हमलोगो के मध्य वह टीनेज बालक एक गुड्डा या खिलौने की तरह बन गया था। कोई उसे टोफ़्फ़ी दे रहा है तो कोई मिठाई तो कोई उसके साथ फोटो खिचवा रहा है। उसकी पहचान तब हुई जब गीत गाने का नंबर आने पर उसने एक नेपाली गाने का मुखड़ा गया।


मेरी शादी की तैयारी में मैं ज्यादा परेशान नहीं था बल्कि दुर्गा को मेरे लिबास के अलावा अपने पहनावे की ज्यादा चिंता थी। जनवासे में उसे हमलोगों के साथ ठहराया गया। एक ही बड़े टेबल पर हमलोग खाना- नाश्ता करते थे। लिहाज दुर्गा ही करता था। किनारे बैठकर या कमरे के कोने में बिस्तर लगाकर। जब मंडप में विदाई भोजन होने लगा तो उसने स्वयम ही हमलोगों के साथ बैठने से इंकार कर दिया।

शादी के बाद दुर्गा और मेरी पत्नी में कुछ दिन बाद किचन के वर्चस्व को लेकर ठन गई। एक वर्ष बाद दुर्गा पटना पिताजी के पास लौट गया। 1978 में पिताजी रिटायरमेंट के बाद रांची, अशोक नगर वाले घर में लौट आए। दुर्गा भी साथ आया। पर अब वह मेरे कंपनी वाले निवास में मेहमान बनकर आता। कुछ दिनों बाद उसकी रांची एग्रिकल्चर यूनिवरसिटी में माली की दिहाड़ी नौकरी लग गयी। यूनिवरसिटी शहर से काफी दूर था। कुछ वर्षों बाद उसका आना-जाना बिलकुल बंद हो गया। 1986 में मैं किसी से मिलने उधर गया तब उसकी खोजबीन ली। पता लगा की उसकी दिहारी नौकरी छूट गई थी। वह नेपाल लौट गया था। नेपाल में ही उसे माली की नौकरी मिल गई थी।

अचानक 2014 में वह पुनः प्रगट हुआ। उम्र से ज्यादा बूढ़ा। वह अपने बहनोई के पास इलाज कराने आया था। उसे दिल की बीमारी थी। उसने बताया की उसकी पत्नी सिलाई-कढ़ाई कर घर चलती है। बीमारी के चलते वह कोई मेहनत-मशक्कत का काम नहीं कर पाता है। उसकी 3 बेटियाँ हैं। दो की शादी हो चुकी है और वे दोनों पढ़-लिख कर नौकरी भी करती हैं। तीसरी बी0ए0 पास कर बी0एड0 कर रही है। दुर्गा को परेशानी यह थी की वह बार-बार डॉक्टर को दिखाने नेपाल से रांची नहीं आ सकता है। उसे मेरे भाई ने नाइट-गार्ड की नौकरी लगा दी। कुछ दिनों बाद अस्वस्थ होने के कारण मेरी बहन के आउटहाउस में रहने लगा। वहाँ रहकर वह घर के काम में हाथ बटाता और बगीचे की देख-भाल करता।वह बहुत बीमार रहने लगा था। उसकी देखभाल मेरी बहन किया करती थी। मैं जब अपनी बहन से मिलने गया तो उसने मुझे एक दुर्लभ पौधा दिया। अब वह डॉक्टर की सलाह पर मछ्ली खाने लगा था पर उसे रोहू के अलावा कोई दूसरी मछ्ली नहीं अच्छी लगती थी। मनपसंद भोजन नहीं मिलने पर वह अब भी रूठ जाया करता था।

एक वर्ष से उसकी तबीयत ज्यादा खराब रहने लगी थी। उसकी आखिरी इच्छा थी नेपाल जाने की। 2 महीने हुए वह नेपाल चला गया।

Saturday, January 18, 2020

भट्टाचार्य सर


1959 की जनवरी में जब पटना कालेजियट स्कूल क्रिसमस अवकाश के बाद खुला तो बहुत सारी बातें एक साथ हुई। स्कूल हायर सेकेंडरी हो गया था और हमलोगों का नवी कक्षा का सत्र 6 महीने में ही पूरा हो गया था। कुछ नए शिक्षक भी तबादला होकर आए थे। जनवरी के पहले सप्ताह में राजकुमारी अमृत्त कौर का आगमन हुआ। वह स्वतंत्रता सेनानी के साथ-साथ केन्द्रीय मंत्री भी थी। हमारे स्कूल में छात्रों की संगीत सेना ने गीत गाए थे। स्वागत गीत “ वंदे मातरम” नेत्रहाट से आए साइन्स टीचर भट्टाचार्य सर ने बिलकुल हेमंत कुमार की आवाज़ में गाकर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया था।
भट्टाचार्य सर से मुझे पढ़ने का सौभाग्य मात्र 10 महीने मिला- जनवरी से अक्टूबर,59 तक। वे 10वी कक्षा में केमिस्ट्री पढ़ते थे । मैंने उन्हें ज़्यादातर बंगाली धोती-कमीज में ही देखा । बहुत धीमे बोलते थे। क्लास की अंतिम सीट तक शायद ही आवाज पहुंचती हो इसलिए बैक बेंचेर्स को उनसे कोई परेशानी नही थी। वे गलती होने पर न मारते थे और न डाँटते थे मात्र एक बार देखकर नजर फेर लेते थे। केमिस्ट्री लेबोरेटरी में भी वे दरवाजे के बाहर कुर्सी लगाकर बैठते थे। बहुत आवश्यकता होने पर ही लैब हॉल के अंदर आते थे। कारण था उन्हें दमे की शिकायत थी । अभी तक मुझे कद-काठी, और चेहरा और सबसे ज्यादा आवाज का गहरापन सामने दीखता है- बिलकुल सलिल चौधरी । वे मेरे और स्कूल के हीरो कैसे बने यह भी कभी नही भूलता है।
स्कूल में हर वर्ष बरसात खत्म होने के बाद फुटबॉल प्रतियोगिता होती थी। शुरुआत, शिक्षक- छात्रो के मध्य प्रदर्शनी मैच से होती थी । उसके बाद इंटर- क्लास और तब इंटर-स्कूल । शिक्षक-छात्र मैच में शिक्षकों को उनकी उम्र के कारण हर तरह की छूट थी। वे कभी भी मैदान में आ-जा सकते थे । 11 से ज्यादा भी रह सकते थे । किसी को भी बूट नही पहनना होता था सिर्फ नंगे पैर जिससे किसी को चोट नहीं आये । शिक्षक धोती,पैंट, निकर कुछ भी पहन सकते थे।
मैच शुरू हुआ । भट्टाचार्य सर 15 मिनट के लिए रेफरी बने और थक कर किनारे बैठ गए । एक बात तो बताना भूल ही गया । हमारे स्कूल ने शहर के दिग्गज खिलाड़ियों को मुफ़्त शिक्षा और हॉस्टल देकर एडमिशन दिया था जैसे सेक्रेटेरिएट क्लब का पहाड़ी,  कॉलेल्क्रियट का बिजली और मल्लू, जगजीवन, अयोध्या इत्यादि। ऐसा दूसरे स्कूल भी करते थे। पूर्वार्ध में छात्र शिक्षकों का मान देने के लिए ढीले खेल रहे थे। मध्यांतर के बाद छात्रों ने 10 मिनट के अंतर में 2 गोल दाग दिए। शिक्षकों का खेल ख़राब नहीं था पर प्रोफेशनल्स के सामने लाचार थे । जब खेल का अंत आने लगा तो शिक्षक पिटे खिलाडी की तरह थक-हार गए । दर्शक दीर्घा में ठीक सेंटर के सामने कुर्सियों पर शिक्षक बैठे थे। मैं भट्टाचार्य सर के पैर के पास बैठा था। रह-रह कर वे कुछ बुदबुदाते थे और उनके पैरों में हरकत आ जाती थी।
अचानक मैदान में धोती कसते और उतरते लोगों ने भट्टाचार्य सर को देखा। उन्होंने इशारा कर लेफ्ट आउट में अपनी जगह बना ली । जैसे ही उन्हें बॉल मिला, सबको छकाते पेनालिटी बॉक्स में घुसकर गोल दाग दिया। दूसरा गोल तो अविस्मरणीय था। सेण्टर पोजीशन से बाल मिलते ही वह सबको छकाते कार्नर एरिया में आ गए। उनका लेफ्ट फुटर projectile गोल के अंदर घूमते हुए घुस गया । सब अवाक थे । आज का दिन होता तो लोग चिल्ला पड़ते एकदम बेकहम की तरह घुमाया । तुरत खेल ख़त्म होने की सीटी बजी। सभी और से तालियों की गड़गड़ाहट के बीच पता ही नहीं लगा की सर मैदान में बुरी तरह हाँफते हुए पड़े हैं । उनके ठीक होने पर छात्र खिलाड़ियों ने उन्हें कंधे पर उठाकर पूरे मैदान का चक्कर लगाया । टीम के कप्तान तो गेम टीचर थे पर विजेता शील्ड भट्टाचार्य सर को देकर सम्मानित किया गया। तभी प्राचार्य ने सर की प्रशंसा करते बताया की वे छात्र जीवन में कलकत्ता की मशहूर टीम मोहन बागान के उभरते खिलाडी थे पर दमे के कारण उन्हें खेल छोड़ना पड़ा।
उसी वर्ष पिताजी का तबादला होने पर मैं झुमरी तिलैया आ गया । डेढ़ वर्षों बाद मेट्रिक केमिस्ट्री प्रैक्टिकल की परीक्षा में मुझे रोमांचकारी झटका तब लगा जब भट्टाचार्य सर को एक्सटर्नल के रूप में कुर्सी पर बैठे देखा । जाहिर है वे मुझ जैसे साधारण लड़के को क्यूँ पहचानते ।
मुझे HCL गैस बनाकर उससे सोडियम क्लोराइड(नमक) बनाने का प्रैक्टिकल मिला था । कठिन था इसलिए किधर भी देखने की फुरसत नहीं थी। अंतिम क्षणों में viva के लिए वे कब मेरे बगल में आकर खड़े हो गए पता ही नही चला। उन्होंने सिर्फ दो प्रश्न पूछे । दोनों का मैंने सही उत्तर दिया। दूसरा प्रश्न थाक्या तुम पटना कॉलेजिएट में थे ?











Thursday, April 18, 2019

हैप्पी बर्थड़े


हमलोग सब अपने जन्मदिन को लेकर इतने भावुक क्यों हो जाते हैं। मैं पढे-लिखे लोगों की बात कर रहा हूँ। जिन लोगों को बुनियादी शिक्षा नहीं मिली है अथवा गाँव-देहात में रहते हैं, उनसे उनके जन्मदिन के बारे में पूछिए तो कोई कहेगा आजादी का दिन मुझे याद है या जब मेरी दादी मरी थी तो मैं 3 का हो गया था और बोलने लगा था वगैरह-वगैरह। मुझे अपना जन्मदिन तब मालूम हुआ था जब दादाजी मेरा नाम लिखाने पड़ोस के स्कूल में ले गए थे। तब मैं 5 वर्ष का था। जन्मदिन मनाया भी जाता है यह तब मालूम हुआ जब माथे पर लाल टीका लगाए मेरा मित्र अपनी कार से उतरा था और हमलोग दौड़ कर उसके पास गए थे। उसकी माँ के कहने पर उसने मिठाई का पाकेट खोल हम सबों  को एक-एक लड्डू दिया था। बसंत के पिता एक अच्छे वकील थे।
बसंत के जन्मदिन के ठीक 6 दिन बाद ही मेरा जन्मदिन पड़ता था। उस दिन मैं तड़के सुबह उठ गया था। स्नान कर गमछा पहने छत पर जाकर सूर्य को जल अर्पित किया था। ऐसा मैं तभी करता था जब कोई आशा पूरी करनी होती थी।  मेरे जन्मदिन के बारे में किसी को याद नहीं था। रोज़मर्रे की तरह स्कूल गया। शाम को खेलने भी गया । रात को माँ चौके में भोजन बनाते वक्त हम सभी बच्चों को बैठाकर होमवर्क कराया करती थी । उस दिन भी होमवर्क करा रही थी। मुझे उदास देख बार-बार पूछती थी की क्या किसी से झगड़ा हुआ है, क्या मास्टर ने डांटा या मारा है , क्या तबीयत ठीक नहीं है ? आखिर में मेरे बड़े भाई ने बताया की उस दिन मेरा जन्मदिन था और उदास इसलिए है की कुछ दिन पहले इसके दोस्त बसंत का जन्मदिन मनते इसने देखा है। माँ ने मुझे पुचकारा। इसके बाद उसने उसी वक्त एक एल्युमिनियम के टिफ़िन के डब्बे में दूध,मैदा, बिसकुट, चीनी और एक अंडा फेंट कर डाला। उस डब्बे को बंद कर माँ ने चूल्हे से नीचे जहां राख़ गिरती है, वहाँ रख दिया। पढ़ाई खत्म होते-होते एक दमदार सवादिष्ट केक तैयार था। बिना कोई हॅप्पी बर्थड़े का कोरस गाये हम सभी भाई-बहन ने केक के टुकड़े का आनंद लिया। उसी रात बिस्तर पर जाने के बाद बड़े भाई ने तय किया की सभी का जन्मदिन मनाया जाएगा। इसके लिए एक महीने पहले से पैसा जमा किया जाएगा। सभी सुबह-सुबह उठने पर हॅप्पी बर्थड़े विश करेंगे। पहले से खरीदा गया गिफ्ट और चॉकलेट भी सुबह ही भेंट करेंगे। चॉकलेट इतना की सभी को कम एक कम एक अवश्य मिले। यह सिलसिला तब छूटा जब किसी की नौकरी हो गई या शादी हो गई और घर से दूर चले गए। तब भी हमलोग एक-दूसरे को पोस्टकार्ड से जन्मदिन की बधाई देना नहीं भूलते थे। तब टेलीफ़ोन बिरले ही किसी के पास होता था। अब तो स्मार्टफोन है, व्हाट्सप्प है, फ़ेसबुक है।
कॉलेज मे मेरे दो मित्र थे। हम तीनों जितना दमखम होता उस हिसाब से जन्मदिन मनाते। आजतक अहले सुबह विश करते हैं। मुझे मालूम हो चुका था की किसी का दिल जितना हो तो उसके जन्मदिन को खास करना सबसे उत्तम है।
MSc की पढ़ाई में हमलोग कुल 18 विद्यार्थी थे। मैंने सबका जन्मदिन रजिस्टर से या पूछ कर जान लिया था । किसी के जन्मदिन के दिन मेरे पास उसे तोहफा देने के लिए अवश्य कुछ न कुछ होता था, ज़्यादातर पेन या कोई किताब जिसकी उसे आवश्यकता हो। कहना न होगा मैं फिसड्डी होते हुए भी बहुत लोकप्रिय हो गया था। बाद में सभी लोग सभी के लिए कुछ न कुछ अवश्य करते थे। एक बार तो हंगामा ही हो गया जब हमलोगों ने मिलकर अपने चहेते प्रोफेसर की क्लास शुरू होने के पहले उनकी टेबल पर बर्थड़े कार्ड से साथ एक कीमती पेन रख दिया। इसके बाद गुस्सैल से गुस्सैल प्रोफेसर हमलोगों के साथ नरमी से पेश आने लगे। अबतक मेरा रुतबा बर्थड़े स्पेशलिस्ट का हो गया था।

हमलोग के फ़िज़िक्स डिपार्टमेंट में एक चपरासी था जगदीश। हमलोगों से उम्र मे कुछ ही बड़ा। हमलोगों के सुख-दुख का साथी। हमलोगों ने मन बनाया की उसका भी बर्थड़े मनाया जाये। उससे उसका जन्मदिन पूछा। वह समझ गया। 1967 में उसका वेतन मात्र 45 रुपये था। सर्दी आ रही थी। हमलोगों ने मिलकर उसे खादी ग्रामोद्योग का एक कंबल, एक चादर, एक पायजाम-कुर्ता और एक सदरी दी। उसके आंखो का आँसू अभी तक नहीं भूलता है।
मेरी नौकरी 6 फ़रवरी 1969 को रांची में भारी इंजीन्यरिंग कारखाने के क्वालिटी लैबोरेटरी से शुरू हुई। यहा रंगरूट की रैगिंग नहीं होती थी अपितु हाथों-हाथ स्वागत किया जाता था। 8 बजे से सामान्य पाली शुरू, 9 बजे साथ मिलकर नाश्ता और चाय और 1 बजे दोपहर को साथ मिलकर सांझा भोजन होता था। मैं चूकी बैचलर था इसलिए मुझसे ज्यादा अपेक्षा नहीं रखी जाती थी । 12 फ़रवरी को नाश्ते के समय 1 पाउंड का केक रखकर मैंने सबको चौकाँ दिया। पूरे लैबोरेटरी में उस दिन इसी बात की चर्चा थी। देखते-देखते 1 महीने के अंदर लगभग 15 लोगों का एक ग्रुप बन गया जिन्होने अपने जन्मदिन का इजहार अपने-अपने तरीके से किया।
कुछ ने स्वतः घोषणा की। कुछ ने अपने प्रोफ़ाइल मुझसे बनवाया। एक ने तो यहाँ तक कह डाला की 14 दिसम्बर को 2 महत्वपूर्ण व्यक्तियों का जन्मदिन पड़ता है – एक राज कपूर का और दूसरे राव का। 10 मार्च की सुबह श्रीकांत उदास बैठा था । उस दिन उसका जन्मदिन था। हमलोग भूल गए थे। हमारे बॉस शर्मा जी का जन्मदिन 2 अक्तूबर को पड़ता था। वे अच्छा गाते ही नहीं थे अपितु मजलिस में गाने की प्रबल इच्छा रहती थी । वे अपना जन्मदिन घर पर 20-25 जन को बुलाकर मनाते थे। मेरा जन्मदिन बड़े धूमधाम से मनाया जाता था , किसी पिकनिक स्पॉट पर। अगर बजट बड़ा हो तो सभी योगदान करते थे। इस कड़ी में एक यादगार जन्मदिन समारोह 13 अगस्त 1999 को हमलोगों ने अपने विभागाध्यक्ष श्री श्रीवास्तव का मनाया था - परिवार सहित सिनेमा हाल में फिल्म “ताल” देखने के बाद सबसे उम्दा शाकाहारी होटल कावेरी में डिनर के साथ। ये परिपाटी मेरे अवकाश प्राप्त करने तक चली।
1976 फ़रवरी में मेरी शादी हुई । अक्तूबर माह शुरू होते ही मेरी श्रीमती ने तरह-तरह से मुझे आगाह करना आरंभ किया की उसका जन्मदिन 28 तारीख को है। मेरी लापवरवाही उसे अच्छी नहीं लग रही थी। आखीर 27 की रात वह बहुत मन मसोस कर सो गई। अहले सुबह मैंने उठकर उसे जगाते हुए हॅप्पी बर्थड़े कहा। उसने बहुत धीमे से धन्यवाद दे दूसरी ओर करवट ले ली। उसका मुंह किसी अनजान वस्तु से छू गया। उसने आँख खोल उस अनजान वस्तु को हटना चाहा। यह क्या , एक रंगीन कागज में लिपटा हुआ बड़ा सा बर्थड़े गिफ्ट था। पूरी नींद छूमन्तर हो गई। उसके बाद क्या हुआ होगा बताने की आवश्यकता नहीं बचती है।
इसके बाद का 25 वर्ष हम, हमारी श्रीमती और तीन बच्चों का जन्मदिन मनाने के नायाब तरीकों का खजाना है ।
मेरी उदासीनता से बच्चे बहुत परेशान होते थे। जैसे-जैसे उनका जन्मदिन नजदीक आता जाता था उनकी व्यग्रता देखने और महसूस करने लायक होती थी। बोले तो कैसे बोले बस मेरी नजर को टटोलते रहते । जब कभी मैं बाहर से आ रहा होता तो वे मेरे थैले की मोटाई आंक रहे होते । ज़्यादातर वे लोग 10 दिन पहले से ही इशारे-इशारे में जाहिर कराते की उन्हे क्या चाहिए – जैसे दोस्त के पास एलेक्ट्रोनिक घड़ी है, स्कूल जाने के लिए एक स्पोर्ट्स साइकल होती तो अच्छा होता, आजकल बहुत सुंदर और छोटा ट्रंजिस्टर रेडियो बाजार में दिख रहा है, एक कैरम बोर्ड होता तो सब मिल बैठ कर खेलते, GM का क्रिकेट बैट 500 के अंदर आ जाता है, वगैरह- वगैरह।
मैं भी उनकी इच्छा पूरी करने की भरपूर कोशिश करता लेकिन गिफ्ट के बारे में जन्मदिन की सुबह ही उनका आश्चर्य उनके सिरहाने रखा मिलता। इसके लिए मै अपने लुका-छिपी और आसपास के अनुभव का पूरा प्रयोग करता। सबसे आसान होता की गिफ्ट स्कूटर की डिक्की में ही रहने देता और सुबह 3 बजे उठकर उनके सिरहाने स्टडी टेबल पर रख देता और उन्हे "हॅप्पी बर्थड़े" कहकर जगाता। उठने के बाद, आँख मलते हुए वे पहले मेरी हाथों के तरफ देखते, उसके बाद अपने सिरहाने, उसके बाद टेबल , उसके बाद खुले दरवाजे के बाहर। मेरे लड़के का जन्मदिन अप्रैल मे पड़ता था। हमलोग गर्मी में खिड़कियाँ खोल कर सोते थे। एक बार सभी बच्चों के साथ उनकी माँ भी शामिल हो गई थी तिल्सिम भेदने मे। मैंने क्रिकेट का बैट बाहर खिड़की पर टिका कर रात ही को रख दिया था।
बच्चे देखते-देखते विदेशों में बस गए हैं। ऑनलाइन उपहार का जमाना शुरू हो गया। फ्लिपकार्ट और अमेज़न जैसे दिग्गज आ गए। अब उनका समय आ गया था हम बुजुर्गों को उपहार देने का। केक और फूलों से शुरू होकर अब एलेक्ट्रोनिक प्रोडक्टस की शुरुआत हो गई है। हम पति-पत्नी अभी भी एक दूसरे को जन्मदिन और मैरेज अनिवेरसरी उसी तरह सर्प्राइज़ गिफ्ट देकर मनाते हैं।
आज के दिन हमलोगों के आउट हाउस में रहने वाले बच्चों की संख्या 7 हो गई है। सभी अङ्ग्रेज़ी स्कूल में पढ़ते हैं। सभी को बर्थड़े मनाना आता है।
ये बच्चे भी मुझे 10-15 दिन पहले से इशारा करना शुरू कर देते हैं। यहाँ तक की कैसा गिफ्ट चाहिए। गनीमत है उनकी कीमत 100-300 तक की ही होती है। मुझे अभी भी उनलोगों को बैचेन करने में आनंद आता है। बर्थड़े की सुबह तक उदासीन रहता हूँ। बच्चे भी बहुत होशियार हैं। उन्हे गिफ्ट कभी पेड़ की डाल पर लटकता दिख जाता है, कभी फूलों के गमले में, कभी खिड़की की सीलिड्ग पर तो कभी उनके खेलेने का समान के जंगल में। वे भी मुझे मिठाई, चॉकलेट अथवा केक का टुकड़ा लाकर अवश्य देते हैं।
इस बार 2019 की 12 फ़रवरी को मैं अस्पताल में भर्ती था। शायद यह सबसे यादगार बर्थड़े हो जाए। पहली बार हम पति-पत्नी 24 घंटे एक साथ रहे- मैं मरीज की बेड पर ऑक्सिजन और नेबूलाइसर पर और पत्नी साथ वाले बेंचबेड पर। भरपूर विसीट हो रहा था। हॉस्पिटल स्टाफ पूरा चौकस था। 15 दिन बाद घर लौटने पर मुझे मेरी पत्नी ने बर्थड़े गिफ्ट दिया- एक कलम, एक मग और एक कैडबरी। 


Thursday, October 4, 2018

गणेश पाठशाला


1950 के दशक मे कदमकुआं पटना शहर की धड़कन हुआ करता था  । पूरब में उभरता हुआ राजेंद्र नगर, पश्चिम दिशा में पिरमुहानी जो रेलवे स्टेशन के रास्ते को ठीक आधे मे बांटती थी, उत्तर में बाकरगंज और दरियागंज तक और दक्षिण मे लोहानीपुर तक । अगर ये सब भी कदमकुआं के अंदर थे तो मुझे इसका ज्ञान नहीं था । कदमकुआं और लोहानीपुर को बाटने वाली सड़क जिसे अब जस्टिस राजकिशोर पथ के नाम से जाना जाता है उसके ठीक मध्य मे गणेश पाठशाला थी । यहाँ सातवी तक की पढ़ाई होती थी । सरकारी स्कूल जैसे पटना हाई स्कूल और पटना कोलेजियट स्कूल जहां सातवी से पढ़ाई शुरू होती थी उसमें एड्मिशन के लिए गणेश पाठशाला मुनासिब तैयारी करा देता था । यह एकमात्र स्कूल था जहां इंग्लिश की पढ़ाई कक्षा 1 से आरंभ हो जाती थी । इस स्कूल की सबसे बड़ी खूबी यह थी की मात्र 6 महीने मे फ़ाइनल परीक्षा लेकर प्रोमोट कर दिया जाता था । इस कारण यह स्कूल बहुत लोकप्रिय था । गणेश पाठशाला मे लड़के-लड़कियां दोनों पढ़ते थे ।
मेरे बड़े भाई का एक वर्ष पहले 1952 4थी कक्षा मे दाखिला हुआ था । वह मुझसे दो वर्ष ही बड़े थे पर दादाजी उन्हे बहुत प्यार से पढ़ाते थे । अव्वल कारण था कि बड़े भाई का नाक-नक्शा दादाजी से बहुत मिलता था । उन्ही के जैसा बड़ा माथा और बड़ा चेहरा ।
एक सुबह, दादाजी , बड़े भाई को छत के कोने मे, भरसक छिपकर पढ़ा रहे थे । वह नहीं चाहते थे कि मै विघ्न डालूँ । पिताजी किसी कारण से छत पर गए । पिताजी ने दादाजी से आग्रह किया की मुझे भी पढ़ाया करें । अगर हो सके तो मेरा भी दाखिला स्कूल मे करा दें । 3 दिन बाद सोमवार की सुबह साफ-धुले कपड़े पहन कर दस बजे तैयार रहने के लिए मुझे हिदायत दी गई । दादाजी ने एक किताब भी दी तैयारी करने के लिए । मैंने जितना हो सका पढ़ा और याद रखने का प्रयत्न किया ।  
हर दिन सुबह मुझे दादी और माँ मिलकर मुझे तैयार करने लगीं । उस किताब से जगह-जगह से सवाल पूछे । सोमवार को ठीक दस बजे, दादाजी अपने कमरे से बाहर आए । क्या व्यक्तित्व था ? छरहरे, लंबे, काली अचकन-शेरवानी, चूडीदार सफ़ेद पाजामा और सर पर एक काली टोपी भी थी । रास्ते भर मुझसे सवाल पूछते  । जिसका जवाब नहीं आता था, वह बताते भी गए ।
हेडमास्टर जमीन पर बिछी दरी पर बैठे थे । उनके सामने एक मुनीम वाला डेस्क रखा था । मुझे अभी तक याद है, हेडमास्टर दादाजी को देखते ही उठ खड़े हुए थे । अभिवादन का आदान-प्रदान इंग्लिश मे हुआ । हेडमास्टर के दाहिने तरफ दादाजी बैठे । मुझे सामने बैठने को कहा गया । मेरा परिचय जैसे की मेरा नाम, पिताजी का नाम और मेरी जन्मतिथि इंग्लिश में पूछा गया । 7 का टेबल पढ़ने को कहा गया । भूगोल के प्रश्नों में मैं कच्चा निकला । मुझे खड़ा कर हेडमास्टर मुझे देखने लगे । उन्होने कहा –“यह बालक तो कक्षा 2 के लायक है पर बहुत छोटा दिखता है और बोली भी बिलकुल बच्चों जैसी है । विद्यार्थी इसे तंग कर सकते हैं । मैं इसका दाखिला शिशु(KG) मे करूंगा और बहुत जल्दी ही प्रोमोट कर दूँगा । इसके बाद मेरा पूरा नाम पूछा गया । मैंने प्रकाश सिंह कहा । दादाजी ने सुधार कर प्रकाश नारायण सिंह लिखवाया । उनका नाम रामानुग्रह नारायण सिंह था । उसके बाद सिर्फ मेरे नाम के साथ ही नारायण जुड़ा  । दाखिले की फीस 1 रुपया दादाजी ने चाँदी के सिक्के से दिया ।
गणेश पाठशाला सात कमरों का आयताकार मकान था । यह भवन बैरिस्टर राज किशोर प्रसाद का था । इसके साथ बाई तरफ जुड़े मकान में स्वयम मकान मालिक रहते थे। क्लास रूम मे जाने के लिए एक पतला बरामादा था । हेडमास्टर का कमरा आगे की तरफ था जिसका दूसरा दरवाजा अंदर बरामदे की तरफ था । बीच में एक बड़ा आँगन था  । दक्षिण-पश्चिम कोने पर टॉइलेट था । पश्चिम छोर में टिफ़िन रखने और खाने की जगह थी ।
तो सबसे पहले टिफ़िन की बात की जाए । पहले ही दिन वहाँ दो लड़कों को लड़ाई करते देखा । मालूम पड़ा एक दूसरे का टिफ़िन खाकर खाली बॉक्स दूसरे शेल्फ पर रख देता था । बाद में ये वाकया बहुत बार देखने को मिला । एक लड़का, सत्येन्द्र अपना टिफ़िन कागज में लपेटकर पैंट की जेब में रख कर लाता था । वह गरीब था । उसके पास न तो टिफ़िन बॉक्स था और न दिखाने लायक खाना । वह रोटी में सब्जी लपेट कर लाता था । ज़्यादातर बच्चे परोठे, अंडे और मिठाई लाते थे । किसी न सत्येन्द्र पर फब्तियाँ कस दी । अब क्या था ? सत्येंद्र ने ऐसा जोरदार हल्ला मचाया कि शिक्षकों को आना पड़ा शांत करने के लिए ।
मालूम नहीं, सभी को स्कूल आने के बाद ही टॉइलेट की जरूरत क्यों पड़ जाती थी । आने-जाने का सिलसिला दिनभर चलता रहता था । सभी कमरों का दरवाजा आँगन की तरफ खुलता था । इसलिए जाने-अनजाने सभी की निगाहें आँगन की चहलकदमी पर चली जाती थी ।  एक दिन मेरे दोस्त सुनील को भी जरूरत महसूस हुई । वह शिक्षक से अनुमति लेकर बीच आँगन में खड़ा हो गया । वहाँ उसने एक-एक कर सभी कपड़े उतारे और नंग-ध्रङ्ग , इठलाते हुए टॉइलेट की तरफ बढ़ गया । क्लास में लड़कियों को आगे की पंक्ति में बिठाया जाता था, एकदम दरवाजे के सामने । अब जो खिलखिलाहट शुरू हुई वह जैसे ही रुकने को हुई सुनील ने टॉइलेट से लौट कर एक-एक कर कपड़े पहनना शुरू कर दिया । खिलखिलाहट ने फिर ज़ोर पकड़ लिया । इस तरह के ध्यानकर्षण के लिए लड़कों को एक अच्छा बहाना मिल गया  । उसके बाद तो लड़कों को लाइन लग गई । दूसरा आया । उसने भी उसी तरह बीच आँगन में कपड़े उतारे और पहने ।  तीसरे ने भी नकल की । पाठशाला में शोरगुल इस कदर बढ़ा की हेडमास्टर को स्वयम आना पड़ा अनुशासन बहाल करने के लिए  
कक्षा 1 तक चटाई पर बैठना पड़ता था  । कक्षा 2 से डेस्क और बेंच की सहूलियत थी । कक्षा 2 मे मकान मालिक के दो युवा लड़के कभी-कभी पढ़ाने आते थे । बड़े थे सुरेन्द्र । इनका क्लास हमलोग मंत्रमुग्ध होकर करते थे । कारण व्यक्तित्व सुंदर और आकर्षक तो था ही साथ ही ये बिहार में बनी भोजपुरी डाक्यूमेंटरी फिल्मों में बतौर नायक बन कर पेश होते थे । ये फिल्में पाठशाला में और राज्य सूचना केंद्र के भवन में दिखाई जाती थीं । उनसे छोटे, नरेंद्र हमेशा चाभी की चैन घुमाते रहते थे और बच्चो को गलती करने पर चाबुक जैसा इस्तेमाल भी करते थे । कक्षा 2 में 1 महीने के अंदर ही कुछ छात्रों को कक्षा 4 में प्रोमोट कर दिया गया । मै भी उनमें से एक था । इस बात को घर में जिस तरह उल्लास से मनाया गया उससे मुझे थोड़ा घमंड आ गया ।
कक्षा 4 मकान मालिक के गैरेज में स्थित था । क्लास टीचर शर्मा जी थे । ये इंग्लिश पढ़ाते थे । क्लास शुरू होते ही हमलोगों की वर्जिश शुरू हो जाती थी । कोई मुर्गा बनता तो कोई लीन-डाउन; कोई बेंच पर खड़ा होता तो कोई क्लास के बाहर । किसी का कान खींचा जाता तो किसी को क्लास से दिन भर के लिए निकाला जाता था । शर्मा जी से हेडमास्टर भी खौफ खाते थे । जब की सब टीचर मुनीम से तनख्वाह पाते थे, शर्माजी को स्वयम हेडमास्टर आते थे उनकी तंख्वाह देने । साथ ही यह हर बार कहते की मैंने आपको दूसरो से 2 रुपये ज्यादा दिये हैं अथवा सबसे ज्यादा दिये हैं । इसी क्लास में मैंने पहली बार “शर्मा जी शर्माते हैं, चूहे पकड़ कर खाते हैं” सुना । गाने की शुरुआत करने वाला विश्वकर्मा नाम का लड़का था जिसकी शिनाख्त होते ही पाठशाला से निकाल दिया गया ।
मुझसे भी एक बार गलती हो गई थी । पाठशाला जाते समय याद आया की मैंने शर्मा-सर का दिया होमवर्क तो बनाया ही नहीं । इंग्लिश में कोई भी एक कविता लिख कर लानी थी और उसे क्लास में सुनाना था । मैंने माँ को बताया और शर्मा-सर के मिजाज के बारे में भी बताया । मैं बिलकुल नहीं जाना चाहता था । माँ ने मुझसे पेंसिल ली और झटपट किसी कविता की चार लाइन लिख दी और कहा की कविता को रास्ते में रट लेना । क्लास मेँ अंदर जाते ही मैंने सबकी तरह कॉपी खोल कर शर्मा-सर के टेबल पर रख दी । रोल-कॉल के बाद एक-एक कर लड़कों से कविता देखने के बाद उन्हें व्याख्यान करने को कहा जाता । गलती होने पर बेंत से पिटाई अथवा कान खिचायी । मेरा नंबर आया । शर्मा-सर भौचक और बोखलाए हुए मेरी तरफ देखने लगे । उनके पूछने पर मैंने डरते-डरते सच बात बता दी । शर्मा-सर ने असिस्टेंट हेडमास्टर नथुनी-सर को बुलवा भेजा । उनके आने तक मैंने न जाने कितने दंड के तरीके बुन लिए थे । उन्हें कॉपी दिखाई गई । उन्हें सारी बात बताई गई और शर्मा-सर ने जानना चाहा कि क्या ऐसी लिखावट कभी देखी है और लिखी पंक्तियाँ के कवि का नाम मालूम है । माँ की लिखावट अत्यंत सुंदर होती थी । मुझे सच बोलने के कारण कोई दंड नहीं मिला । बड़ा होने पर वह कविता ISc के टेक्स्ट बुक “Golden Treasury” में मिली । Wordsworth की “The Rainbow” की पंक्तियाँ थीं ।
शर्मा-सर की एक सबसे बड़ी खूबी तब देखने को मिली जब वे भूतपूर्व छात्रों के द्वारा अभिनीत “Merchant of Venice” का निर्देशन कर रहे थे । मंचन आँगन में हो रहा था । हमलोगों को भी बरामदे में बिठाया गया था । इतना भव्य की आजतक शेक्सपियर की वह कहानी नहीं भूली है । शर्मा-सर स्वयं शायलक बने थे ।
गणेश पाठशाला में मेरे 3 मित्र बने । पहला सुनील जिसका मै जिक्र कर चुका हूँ । दूसरा सुशील जो श्री जनक नारायण लाल, MLC का बेटा था । तीसरा अशोक चोपड़ा जिसके परिवार की मशहूर गोल्डेन आइसक्रीम पूरे शहर में मशहूर थी ।
हेडमास्टर कभी-कभी ही पाठशाला आते थे । सुना था उनका कलकत्ता में बड़ा व्यापार है । वे जब भी आते, सभी छात्रों को लाइन में खड़ा किया जाता । उनका छोटा सा भाषण होता । पढ़ाई में अच्छा करने वाले छात्रों को पुरस्कार और शरारत करने वालों को दंड मिलता । उनके जन्मदिन पर इसी तरह हमलोगों को इकट्ठा कर लड्डू बांटे जाते । उनकी मृत्यु पर पाठशाला में 3 दिनों की छुट्टी घोषित हुई थी । उतनी कम उम्र मे जाना की बड़े लोगों के मरने पर छुट्टी मिलती है । बिन मांगे छुट्टी मिलने का यह अवसर आज भी बच्चों में खुशी भर देता है ।