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Thursday, March 2, 2017

कालू का जवाब नहीं !



कालू से मेरी पहली मुलाकात तब हुई जब वह दो महीने का रहा होगा । पैर के पंजे और मुंह को छोड़ सारा शरीर काला । मैं काफी दिनों बाद , शायद एक महीने बाद अशोक नगर के अपने पैतृक घर आया था माँ-पिताजी के पास । बाहर बैठक में कालू मेरी बहन के पैर के पास बैठा था । घर में बहुत सारे कुत्ते थे , उस समय 7-8 । कालू उठकर मेरे पैर के पास आकर बैठ गया । बहन बोली यह किसी के पास नहीं बैठता है प्रकाश भैया के पास कैसे प्यार से बैठा हुआ है ।मैंने गौर किया कि कालू में ट्रेन होने के सभी गुण हैं और वह इतने कुत्तों के बीच उपेक्षित और आवारा हो जाएगा.। मेरे बहुत कहने पर भी बहन ने कालू को मुझे पालने के लिए नहीं दिया । उसके बाद जब भी आता कालू दौड़कर मेरे पास आ जाता । मैं उसके लिए बिस्कुट भी लाने लगा ।

एक वर्ष का होते-होते कालू मोहल्ले में ही नहीं दूर-दूर तक काफी मशहूर हो गया । गेट के अन्दर कोई भी बिना एस्कॉर्ट के नहीं आ सकता था । अगर कोई गलती से आ गया तो उसे उसका हमला बर्दाश्त करना होता था । पोस्टमैन,सब्जीवाले, प्लम्बर,ग्वाले बहुत खबरदार रहते थे । बाद में दूध वाले ने तो कालू को दूध पिला कर दोस्ती कर ली । इसके लिए उसने गेट पर ही एक कटोरा रखवा लिया था । अगर कटोरा गुम हो गया और ग्वाला बिना दूध डाले अन्दर आने की कोशिश करता तो कालू भौकता और उसका रास्ता रोकता । बहुतेरे उपाय के बावजूद लोगों से गफलत हो ही जाती थी, ज्यादातर नए-अनजान लोगों से । पांच वर्ष का होते-होते उसने काटने का शतक बना लिया था । सारे दिन उसे चैन से बांध कर रखा जाने लगा । रात को गेट पर ताला लगने के बाद ही उसे खोला जाता । कालू इतना कटखना इसलिए भी हो गया था कि कुत्तों की बहुतायत में वह काफी उपेक्षित हो रहा था । उसका दिल भी शायद अब कुछ भरोसे का आशियाना चाहने लगा था ।

तीन वर्ष बाद, मैं voluntary रिटायरमेंट लेकर पिछवाड़े अपने 3 रूम के यूनिट में रहने आ गया । पहली ही रात अचानक खटपट की आवाज से मेरी नींद खुल गयी । देखा सिरहाने
शीशे की बंद खिड़की के बाहर सिल पर कालू बैठा हुआ है । काली अँधेरी रात, पूरा काला कालू – क्या कॉम्बिनेशन था धड़कन तेज करने के लिए । ऐसा दो-तीन दिन तक हुआ । उसके बाद मैंने खिड़की खोल कालू को अन्दर कर लिया । वह मेरे पलंग के नीचे आराम से लेट गया । मेरे घर में पहले से किट्टू महाशय थे । उन्होंने भी कोई आपत्ति नहीं की । लगता था उसे भी एक निडर दोस्त की तलाश थी । मेरे घर में इनको चेन में नहीं बांधा जाता था और ये बात कालू को मालूम थी ।

जिस दिन घर में उनका मनपसंद मेनू बनता, उनलोगों की ख़ुशी और तमीज देखने लायक होती थी । वे एकदम वैसा ही एक्शन देने लगते थे जैसा घर के बच्चे करते हैं जब उनके पसंद का भोजन बन रहा होता हो । घर के किसी खाली कोने में आपस में खेलना और किसी के आते ही बिलकुल शांत होकर बैठ जाना । जैसे-जैसे खाने का वक्त नजदीक आने लगता उनलोगों की बैचेनी देखने लायक होती । परोसने के बाद अपने बाउल का ही खाना वे लोग खाते थे । कोई लड़ाई-झगडा नहीं ।

बाहर के लोगों के साथ वह जितना निर्दयी था, घर–परिवार के साथ उतना ही प्यारा । मैं जैसे ही घर के बाहर आता वह चिपक जाता । अगर बड़े घर में भाई-बहनों से मिलने जाता तो वह भी साथ-साथ रहता । अगर मैं उसे घर में बंद करके आता तो मौक़ा मिलते ही वह दौड़ के मैं जहां भी रहता वहां आ जाता चाहे वह तिमंजले की छत ही क्यों न हो । मेरे स्कूटर की आवाज वह एक फर्लांग दूर से पहचान लेता और मेरी महक उसे 100 मीटर दूर से मिल जाती ।
उसने दो बड़े ही कामयाम कमांड सेख रखे थे। पहला था "Go home"। वह कहीं भी रहता, कुछ भी करता-रहता ,बस कहने भर की देर थी, वह चुपचाप्प घ के अंदर अपनी जगह पर आ जाता। कितनी बार कालू को जीतती पारी छोडकर लौटना पड़ता था। दूसरा कमांड था "stay"। च्चहे वह खेल रहा होता, झगड़ रहा होता, अथवा हड्डी का टुकड़ा उठाने लपकता रहता, बस कहने भर की देर थे, वह शांत होकर मेरी तरफ देखने लगता।

उसके गले में मछली का बड़ा काँटा फंस गया । बहुत तकलीफ में वह मुंह खोले मेरे पास आया । मैंने मुंह के अन्दर झांककर देखा । काँटा दिख रहा था । मैंने बिजली की चमक के साथ दो उंगली की कैंची बना उसके गले में फंसे कांटे को निकाल दिया । मैं अपने आप को क्या शाबाशी देता उससे ज्यादा कालू उछल-उछल कर मेरा मुंह चूमने की कोशिश करने लगा ।

एक बार बड़े घर के बरामदे में एक काश्मीरी कपडा बेचने आया । मुझे भी बुलाया गया । मैंने एक शाल पसंद की । जब लौटने लगा तो वह काश्मीरी मुझसे हाथ मिलाने आगे बढ़ा । मेरे हाथ तक तो उसका हाथ नहीं पहुंचा पर बेशक उसे कालू ने काट खाया । शायद कालू को लगा हो कि वह अनजान कश्मीरी किसी गलत इरादे से मेरी तरफ बढ़ा था ।

इसके ठीक उलट, एक बार मेरी 3 वर्षीया नतिनी मेरे बिस्तर पर उछल रही थी और वह छलांग लगाकर बिस्तर से कूदी । कूदने की आवाज से तंग आकर ठीक उससे क्षण कालू पलंग के नीचे से बाहर निकला । मेरी नतिनी का पैर कालू के शरीर पर लैंड किया । नतिनी बड़ी जोर से चीखी । कालू को भरपूर चोट लगी थी । पर वह बिना कोई आवाज किये दूसरी तरफ जाकर अपनी चोट सहलाने लगा ।

कालू एक बहुत अच्छा शिकारी बनता ।चूहे, गिरगिट और छिपकली उससे बच नहीं पाते थे । गिरगिट और चूहों के लिए वह उनके आने-जाने के रस्ते पर छिपकर घंटों घात लगाए रहता था । बड़े गर्व से शिकार लाकर मेरे पैरों के पास रख देता । छिपकली का शिकार तो गज़ब तरीके से करता था । घर में मुश्किल से ही कभी कोई छिपकली दिख जाती थी । दीवार पर रेंगती छिपकली को देखते ही वह उसके नजदीक जाकर भौकने लगता था । उसकी कोशिश रहती कि छिपकली भागते-भागते खुले दरवाजे पर आ जाये । उसके बाद पलक झपकते ही वह दरवाजे पर जोर से धक्का देकर छिपकली को गिरा देता था ।

वह खेलने के लिए हरदम तैयार रहता था । अगर उसे बॉल खेलने की इच्छा होती तो मुंह में कोई भी ऑब्जेक्ट पकड़ कर पैर के पास लाकर रख देता । उसके बाद मैं उसे छत पर ले जाकर 10-15 मिनट बॉल खिलाता । नहलाने के बाद अगर उसे गले पर पट्टा बाँधना भूल जाता तो उसे भी वह लाकर पैर के पास रख देता, मानो जैसे वह उसका ID हो ।

एक दिन मैं अपने कंप्यूटर टेबल का टूटा रोलर(Castor wheel) बदल रहा था । आखिरी रोलर लगाने के लिए मैंने जब हाथ बढ़ाया तो वह जमीन पर कहीं नहीं दिखा । मैंने कालू को आवाज दी जिसकी खटपट दूसरे कमरे से आ रही थी । वह दौड़ कर आया । मैंने उसे लगे हुए रोलर की और इशारा कर पूछा । उसके बाद वह मेरे पास से मुड़कर एक दम” मेरा जूता है जापानी” की धुन पर मटकते हुए दूसरे कमरे से रोलर मुंह में दबा कर मेरे पैर के पास रखकर भाग लिया ।

ग्लूकोमा के ऑपरेशन के बाद मैं घर लौटा और बिस्तर पर लेट गया । कार से उतरते ही कालू मेरा मार्गरक्षण करने लगा । बिस्तर के बगल पर सटकर बैठ गया । मेरे भाई-बहन मुझे देखने आये । जैसे ही कोई मेरे ज्यादा नजदीक पहुंचता , कालू गुर्राने लगता । जबतक मेरे आँख पर पट्टी बंधी रही तबतक कालू मेरी निगरानी करता रहता यहाँ तक कि रात को मेरे बिस्तर के बगल में ही रहता । इसके बाद एक-दो बार जब भी कुछ दिन हॉस्पिटल में रहकर लौटता,कालू इसी तरह मेरी देखभाल करता ।

स्वामिभक्ति की एक मिसाल और याद है । गेट के अन्दर एक विशालकाय हाथी को लोग खिला रहे थे । सुबह के समय कालू और उसके दो मित्र मेरे पास छत पर बैठे थे । मैं भी एक दर्जन केला लेकर हाथी की तरफ बढ़ा । तीनो कुत्ते एक साथ भौकते हुए हाथी की तरफ बढे । सबसे छोटा सबसे पहले पहुंचा । उसने हाथी के पैर के पास जोर से ब्रेक लगायी और पत्थर की तरह ठगा सा खड़ा रह गया । सबसे बड़ा आधी दूर से लौट गया । कालू भौकते हुए तब-तक हाथी का चक्कर लगाता रहा जबतक कि तंग आकर महावत उसे हटा नहीं ले गया ।


मैं छ महीने के लिए अपनी बेटी के पास ऑस्ट्रेलिया गया । इन दिनों कालू मेरी बहन के पास रहता । उससे उपेक्षा कतई बर्दाश्त नहीं होती था । जब भी ऐसा कुछ होता वह चुपचाप नजदीक के पार्क में जाकर अकेला बैठ जाता । बहुत मनाने पर वापिस आता । कहते हैं वह withdrawl वाली स्थिति में पहुँच गया था ।उसने काटना तो दूर भौंकना तक छोड़ दिया था । मेरी अनुपस्थिति में सभी को उसका विशेष ख्याल रखना पड़ता था ।

वह 10 वर्ष का हो चूका था । आखिर वह दिन भी नजदीक आ गया जब उसे परलोक जाना था । कुछ दिनों से वह घर के बाहर ही रहना पसंद करता । जब मैं बाहर बैठता तो वह मेरे पास आकर बैठ जाता । उसे हमलोगों ने गेट के पास अशोक के पेड़ के नीचे दफनाया ।

Wednesday, October 12, 2016

प्रतिस्पर्धा

मेरे न चाहते हुए भी मुझे परीक्षा में अच्छे नम्बर नहीं आते थे । सबसे बड़ा कारण ये था कि मुझे पढ़ने से बहुत ज्यादा अच्छा कोई भी दूसरा काम लगता था । उनमें प्रमुख था शरारत करना । हो भी क्यों नहीं ? उम्र के हिसाब से मैं बहुत जल्दी ऊंची क्लास तक पहुँच गया था । जब श्रेणी एक में था तब स्कूल में जगह कम होने की वजह से जिन बच्चों को 50 से अधिक नम्बर आये थी उन्हें चौथी श्रेणी में प्रमोट कर दिया गया । जब मैंने पांचवी पास की तो एक एंट्रेंस परीक्षा की बदौलत मेरा दाखिला सरकारी पटना कॉलेजिएट स्कूल की सातवी कक्षा में हो गया । जब नवी में था तो फाइनल परीक्षाएं वर्ष के मध्य में होने की बजाय अंत में होने लगी और मैंने नवी छह महीने में ही पूरी कर ली । मेट्रिक की परीक्षा देते समय मेरी उम्र मात्र १२ वर्ष थी । एक तरफ तो चार फीट दस इंच का मैं सबके मध्य नुमाईश का कारण बन गया दूसरे मुझसे ज्यादा अपेक्षाएं होने लगी जबकि मेरा कच्चा दिमाग पेचींदे विषय ग्रहण नहीं कर पाता था । विज्ञान के विषयों में ज्यादा परेशानी होती थी । माँ कहती थी कि हम बच्चे विज्ञान के लिए इस खानदान की पहली पीढ़ी हैं । जो भी हो नम्बर कम आने पर बहुत ही दुःख होता था । जैसे-तैसे मेरा प्रवेश एम0एस0सी0 फिजिक्स में हो गया ।
अभी तक 150 से अधिक छात्रों के क्लास के किसी  कोने में बैठ कर मैं अपने को छुपा लेता था । पर अब हमलोग मात्र 18 थे । शिक्षकों और स्टाफ की संख्या 100 से ऊपर थीं । मेरा छोटा कद सबकी आँखों में जल्दी ही उतर जाता था । 1966 के सितम्बर ३ को प्रथम सत्र की परीक्षाएं हुई । अभी रांची 22 अगस्त को आरम्भ हुए हिन्दू-मुस्लिम दंगे से पूरी तरह उबरी भी न थी । प्रशासन ने स्थिति को सामान्य बनाने के लिए सभी कुछ करने का प्रयत्न शुरू कर दिया था । उनमे विश्वविद्यालय की गतिविधियाँ भी थी । मेरा घर इस दंगे की केंद्र बिंदु पर था तिसपर मेरे दो भाईयों पर गिरफ्तारी की तलवार भी लटक रही थी । जाहिर था जो छात्र दंगे के समय रांची से दूर अपने घर लौट गए थे उनका परीक्षाफल अच्छा रहा । 18 छात्रो में 54 प्रतिशत के साथ मैं सबसे नीची पायदान पर रहा । बहुत ग्लानी और दुःख हुआ । छुप-छुपा कर मैं अपना मार्कशीट लेने गया ।
दूसरे सत्र का क्लास एक महीने बाद शुरू हुआ । इस एक महीने मैं एक तालाब की किनारे घंटो चुपचाप बैठा रहता था । अपने आक्रोश को शांत करता था और चुनौती स्वीकारने का तरीका सोचता रहता था । सत्र शुरू होने तक मैं बहुत कुछ संयत हो गया था ।
भौतिकी(फिजिक्स) को ऐसे ही सब विषयों का गुरु नहीं कहा गया है । मेरे सहपाठियों ने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे मुझे दुःख या उदासी हो । पहले जैसे ही तपाक से मिले । पर मैं बदला हुआ था । हमलोगों का क्लास रूम 20/10 फीट का था जिसमे चार बेंचें दो कतार में रखी थीं । मैं पहले दिन दस मिनट पहले पहुँच कर कमरे के ठीक बीचो-बीच आगे की बेंच पर बैठ गया । अबसे यही मेरे बैठने का स्थान था । इसके दो फायदे हुए । लेक्चरर की निगाह बरबस मेरे पर रहती और प्रश्नों का उत्तर देने की आशा भी मुझसे रहती । दूसरे शब्दों में 100 प्रतिशत एकाग्रता ।

पढ़ाई के साथ-साथ मेरा विशेष प्रयोजन यह भी जानना था कि फर्स्ट आये लड़के नित्यानंद संतरा की तैयारी में क्या खूबियाँ थीं । एक अलगाव मैं मान कर चल रहा था । उसका दिमाग मैथमेटिकल था और मेरा एनालिटिकल । इसके अतिरिक्त मैं और कोई भी अड़चन दूर करने के लिए कृत-संकल्प था ।
नित्या अपनी ओड़िया बिरादरी के तीन लडको के साथ एक कमरा शेयर करता था जिसके लिए उसे दस रुपये महीने किराया देना पड़ता था । मैं कॉलेज से लौटते समय हफ्ते में दो बार उसके रूम में एक-आध घंटे बिताता था जिससे उसके तैयारी की जानकारी मिल सके । दो महीने लगे उसे खुलने में ।
नित्या सुबह दो लड़कों को ट्यूशन पढ़ाने के बाद कॉलेज आता था । शाम को पुनः दो लड़कों का ट्यूशन लेता था । छात्रवृति के 60 रुपये और ट्यूशन के 100 रुपयों से उसका खर्चा चलता था । फीस माफ़ थी । रात को बगल के मेस से भोजन के बाद वह चार पैसे में खरीदी गयी चार चारमिनार ब्रांड सिगरेट के साथ पढने बैठता था । १२ बजे रात के बाद जब नीद जोर पकड़ लेती या पढाई पूरी हो जाती तब सोता था । पांच बजे सुबह के पहले उठ जाता था । लिख कर रिवीजन करने या नोट बना कर रखने के लिए उसने नायब तरीका तय किया हुआ था । रात को वह मकान मालिक के लड़कों को पढ़ाने के बाद उनका पढ़ा हुआ अखबार अपने साथ ले आता था । उसपर वह पेंसिल से याद की गयी लेखों को लिख कर संपुष्ट करता था और दुबारे पेन से उसी अखबार पर लिख कर नोट बना लेता था । किताबें उसे लाइब्रेरी से मिल जाती थी ।
उसने मुझे परीक्षा में रॉयल ब्लू स्याही की जगह काली स्याही इस्तेमाल करने का परामर्श दिया । उसने यह भी कहा की ख़ास बातें अवश्य अंडरलाइन कर देनी चाहिए जिससे एग्जामिनर की फिसलती तेज नजर उस पर टिक जाए । उसने डायग्राम और ग्राफ बनाकर उत्तर को और ज्यादा प्रभावशाली बनाने की भी सलाह दी ।
मैंने वह सब किया जो संतरा करता था । मैंने अपने छोटे भाई-बहनों को पढ़ाना भी आरम्भ कर दिया । इससे विज्ञान के विषयों के प्रारभिक ज्ञान दृढ़ होते गए । यहाँ तक कि मैं रिवीजन के लिए पुराने अख़बारों का इस्तेमाल करता था और हाँ मेरे सिगरेट पीने का एक ये भी मुख्य कारण बना । इस बार फाइनल सत्र की परीक्षा के समय किसी तरह की घबराहट नहीं थी ।
रिजल्ट बताने मेरे दो सहपाठी मेरे घर आये । मैं सेकंड क्लास फर्स्ट आया था । मुझसे ऊपर नित्या फर्स्ट और तीन लड़के फर्स्ट क्लास में थे । मुझे इस सत्र में 65.3 प्रतिशत नम्बर आये थे। दोनों सत्र का नम्बर जोड़ने पर 59.4 प्रतिशत था ।

इस नतीजे ने मेरा नजरिया बदल दिया  । परिश्रम , भाग्य और दिमाग दोनों को शक्ति प्रदान करता है । 

Thursday, July 23, 2015

सिनेमा सिनेमा – 4 !

नियति ललाट पर स्क्रिप्टेड रहती है , सुनने और समझने में अजीब लगता है पर जीवन के अंतिम पड़ाव पर यह यकीन हो जाता है कि हमसब जल की धारा में तिनके की तरह बहते आ रहे हैं तब कुछ भी सोचने समझने को नहीं रह जाता, बस बहते हुए का आनंद लेना ही श्रेयस्कर है. स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि मानव जीवन ही बना है प्रकृति को तोड़-मडोड कर अपने लिए सहज और सुगम बनाते रहना. उसे ऐसा भान होने लग जाता है कि प्रकृति उसकी कठपुतली है. यहीं मनुष्य पेड़-पौधों और जानवरों से बिलकुल अलग हो जाता है और इसी कारण बुरी तरह पछाड़ खाता रहता है. प्रकृति मनुष्यों के साथ चूहे-बिल्ली का खेल खेलती रहती है. बाढ़, भूकंप, सुनामी, अकाल, बीमारी, दुर्घटनाएं इस तरह की कितनी ही विधाओं के साथ खिलवाड़ करती रहती है. चूहे की तरह उसे भी अंत तक ऐसा लगता है कि प्रकृति उससे खिलवाड़ कर रही है. अंत में , उन्ही पांच तत्वों में मनुष्य को समेट लेती है अपने में जैसा वह अपने सभी जनकों के साथ करती है. 
मैंने स्वतः रांची को अपने अल्हड़पन का धाम नहीं चुना था और न डोरंडा का गेंदापाड़ा मोहल्ला. रांची जहां उस समय मनोरंजन का एकमात्र साधन सिनेमा हुआ करता था. डोरंडा जहां लड़के सोते-जागते बस खेलने की धुन में मस्त रहते थे. मोहल्ला गेंदापाड़ा जिसे मुझ जैसा एक नया किरदार मिल गया था. वह, जिसकी उम्र और ऊचाई तो कम थी पर कॉलेज जाने लगा था. वह जिसे पटना-टाटानगर शहरों की चमक-दमक का अनुभव था और जंगलों से घिरे झुमरी तिलैया जैसे पर्यावरण से जूझने का साहस. सब मिला-जुलाकर, एक ऐसा रास्ता निकलता आ रहा था जिसमें पढाई-लिखाई किनारे मन मसोसती रह जाती थी. मेरी अल्हड उम्र खेलने और सिनेमा देखने में कैसे बीत गयी मालूम ही नहीं पड़ा. होश संभाला तो मैं गिरते-पड़ते-लडखडाते 19 वर्ष की अवस्था में MSc(फिजिक्स) के फाइनल ईयर की पैनी धार पर खड़ा होने की बेतरह कोशिश कर रहा था. जीवन के इस पड़ाव में मुझे बहुत ही रोमांचकारी अनुभव हुए. जानकारी हुई. चरित्र निर्माण हुआ, जिसपर फिल्मो की गहरी छाया थी. जिसे प्रेमचंद, टैगोर, बंकिम, तारा, सरत, अमृत लाल, बिमल मित्र, चार्ल्स डिकेन्स, अज्ञेय,कुछ हद तक निखार पाए. आज उन पलों को ठीक से न सवारने का अटूट दुःख भी रेकरिंग डिपाजिट जैसा सालता रहता है.


Sunday, July 19, 2015

सिनेमा सिनेमा – 3 !

1959 , अक्टूबर को हमारा परिवार झुमरी तिलैया आ गया. 1961 फरवरी में मैंने स्कूल बोर्ड की परीक्षा यहीं से दी. दस हज़ार आबादी वाले इस शहरी कसबे में एक सिनेमा हॉल था जहां पुरानी फ़िल्में दिखाई जाती थी. एक राज्य सूचना केंद्र का फुटबॉल मैदान जहाँ हफ्ते में एक बार एक ही फिल्म महीनों दोहराई जाती थी. कमाल ये कि तब भी दुनिया में इस शहर का नाम हिंदी फिल्मों के चाहनेवालों की जुबान पर दर्ज था जो आजतक बरकरार है जबकि इस कमाल के जनक अब इस दुनिया में नहीं रहे. अगर आप तब रेडियो सीलोन या विविध भारती सुनते होंगे तो अभी तक “झुमरी तिलैया से रामेश्वर बरनवाल और नन्द लाल “ के नाम हरेक दिन कितने ही फरमाईशी गीतों के साथ सुना होगा.
1960 में स्थापित पूर्णिमा टाकिज और उससे सटे पान दुकान पर की भीड़ बरबस लोगों को अपनी तरफ खींच लेती थी. पान दुकान पर नन्दलाल बैठता था और रामेश्वर उस दुकान के दायें कोने पर खींची तख्ती पर पोस्टकार्ड रख फरमाईशें लिखता रहता था. यह कार्यक्रम दिनभर का था. नन्दलाल पढ़ाई छोड़ चुका था और रामेश्वर तीसरी बार फेल होकर दसवी कक्षा में मेरे साथ आ गया था. वह कभी-कभी ही क्लास में आता था पर कोई उसे कुछ नहीं रोकता-टोकता था. मुझसे दस वर्ष बड़ा, अभिभावक की भांति मीठा पान खाने से भी मुझे रोकता था पर उसके दांत और मुंह पान की लाली से हरदम लाल रहते थे. 23-24 वर्ष का होने के बावजूद वह हमेशा हाफ पेंट में ही रहता था. प्यार से उसे लोग पोपट लाल कहकर बुलाते थे. पोपटलाल के नाम से फ़िल्मी हास्य कलाकर राजेन्द्रनाथ अपनी बहुत सी फिल्मों में हाफ पेंट ही पहने एक्टिंग करता था. अभी रामेश्वर जिन्दा होता तो बहुत-कुछ चरित्र कलाकार भगवान् की तरह दीखता. आज इन्टरनेट पर जानकारी मिली कि उसका देहावसान 2007 में हो चुका था तब उसकी गिनती झुमरी तिलैया के बिज़नस टाइकून के रूप में होती थी. झुमरी तिलैया कीमती माइका की खानों के मध्य बसा पचा था. आज वहां फ़िल्मी गीतों की फरमाईश बहुतेरे क्लबो के मार्फत होती है. 
पूर्णिमा टाकीज 1960 में मुगले आजम फिल्म से उद्घाटित हुई थी. उस दिन सुबह-सुबह लगा कि स्वयम रेडियो सीलोन के अमीन सयानी भोपूं लेकर शहर  में प्रचार कर रहे हैं. घर से बाहर आकर देखा कि एक सरदार सिख लड़का 20-22 वर्ष का ठीक अमीन सयानी की नक़ल कर रहा था. वह लड़का भी शहर के कोने-कोने में अपनी आवाज़ से काफी लोकप्रिय हो गया.
यहाँ पहली बार पिताजी ने हमलोगों को अंग्रेजी फिल्म “गॉडजिला” देखने के लिए पैसे दिए और बाद में बंगाली फिल्म “काबुलीवाला” के लिए भी. पर तबतक हमलोग काफी हदतक फिल्मिया हो गए थे इतना कि उसका असर हमलोगों की पढ़ाई पर जमकर पड़ा.

यहीं मैंने अपने जीवन की सबसे बेहतरीन फ़िल्में देखी- “दो आँखें बारह हाथ” और “सुजाता”, जिनका जीवन पर आज भी असर दिखता है. मुझे समाज के तिरस्कृत में भी प्यारी छवि दिखती है. 

सिनेमा सिनेमा – 2 !

1952 में,पटना आने पर, मेरी उम्र सभी कुछ जानने समझने की हो गयी थी. खेलने और आसपास एक्स्प्लोर करते पांच वर्ष कैसे बीत गए मालूम ही नहीं पड़ा. इसी बीच शायद मैं अपनी दादी के साथ एक-दो धार्मिक फिल्मे देखने गया था. एक फिल्म थी “राजा भरथरी”. जब राजा सन्यासी के भेष में अपनी रानी से भीख मांगने आता है, और रानी रोते-गाते सीढ़ी से उतर कर राजा के नजदीक आती जाती है, उस दृश्य को याद करते आज भी आँखे भीग जाती हैं.
एक दिन सुबह मैं दादी के साथ सब्जी खरीद कर घर लौट रहा था. उसी समय विक्टोरिया घोडागाडी पर “ हरि दर्शन” फिल्म की होर्डिंग और एलान, इश्तेहार लुटाते हुए नजदीक आने लगी. मैं और दादी रूककर नजारा देखने लगे. दादी के डर से मैंने इश्तेहार पाने की कोशिश नहीं की. साईस के बगल में बैठा एक बुड्ढा मौलवी सर पर टोपी लगाये भोपू पर बोलता और इश्तेहार बाँट रहा था. अचानक उसने दादी को देखकर, बग्घी रुकवा दी. नीचे उतर कर सलाम किया और एक  रंगीन फोल्डर दादी को बड़े आदर के साथ थमाया. कुछ कहा और आदाब कर, विक्टोरिया पर बैठ आगे रवाना हो गया। उस फोल्डर में फ़िल्म के सभी बीस गाने थे। यह फिल्म हम तीनो भाईयों ने देखी थी और न जाने कितनी बार बरामदे में इसका मंचन भी किया. हाँ, नृसिंह अवतार हमेशा चपरासी  इब्राहीम को ही बनाया जाता.
पटना में, शाम को सब दोस्त कांग्रेस मैदान में जमा होकर कुछ भी खेल खेलते, ज्यादातर आसपास या दोल-पात. थककर बैठते और बतियाते. उम्र में बड़े साथियों से उनकी देखी हाल की फिल्म की कहानी और गाना सुनते. अंतु, मुकेश के गए गाने बहुत अच्छी तरह गाता था. ऐसे , उस काल में पटना वाले पूरी तरह मुकेश के दीवाने थे.उनके साथ, घर में बिना बताये मैंने शहीद भगत सिंह, जागते रहो, अनाड़ी और नागिन फ़िल्में देखी थी. नागिन फिल्म देखने का किस्सा भी मजेदार है. 
एक दिन सुबह, बैंड-बाजे के साथ ऊंट, हाथी और घोड़ों की कतार्रों से घिरी बरात हमलोगों के सडक में एंट्री लेने लगी. हम सभी दौड़कर गेट के बाहर आये. सोचा ये सुबह कैसी बरात आ रही थी. ऐसा भी कि कोई सर्कस कम्पनी का जुलुस हो. नजदीक आने पर पता चला कि वह तो नागिन फिल्म के गोल्डन जुबली का जश्न मनाया जा रहा था. अब इस फिल्म को देखना तो बनता ही था.
एक दोपहरी मैं कुछ सेकंड हैण्ड पुरानी किताबें खरीदने जनरल पोस्ट ऑफिस के नुक्कड़ पर गया था. सामने पर्ल टाकीज पर "जागते रहो" का पोस्टर लगा हुआ था- गगनचुम्बी इमारतों के बीच टोर्च लिए एक सिपाही की तस्वीर और उसको देखता एक देहाती.  इसका एक गाना"जागो मोहन प्यारे" सुबह विविध भारती पर सुना करता था. पॉकेट में 20 पैसे बचे थे. सबसे सामने वाली बेंचों पर बैठने का यही टिकट भाव था. ऐसा सबकुछ भी इस देश में होता है जानकर विछुब्द हो गया. वह प्यासा देहाती कौन था इसकी जानकारी कांग्रेस मैदान के दोस्तों ने मेरा मजाक बनाते हुए डी. इसके बाद "अनाड़ी" देखी. मुझे वह दृश्य अभी तक नहीं भूलता है जब वसीयत लिखने वाला वकील गंभीर रूप से बीमार बूढी मिसस डीसा से पूछता है कि वह लड़का तो हिन्दू है और आप क्रिश्चियन तो फिर आपमें माँ-बेटे का रिश्ता कैसे हुआ ? और डीसा जवाब देती है कि ये रिश्ता उस समय से है जब कोई धर्म नहीं बना था.

पटना में, ज्यादातर खाली समय, फ़िल्मी दुनिया के हिस्से जाता था. घर का कोई कोना रंगमंच बन जाता था जहां रामायण से लेकर सुलताना डाकू तक का मंचन होता था. हाँ ये बात अलग है कि दबंग लड़के चाहे कितने भी तंग-हसीन हो राम ही बनते थे, कितने ही सीकिया हों, डाकू बनने के लिए लड़ने तक को तैयार रहते थे. लडकी का रोल कोई निभाना ही नहीं चाहता था, अनिल भी नहीं जो दीखता लड़की था, चलता भी लड़की कि तरह इठलाकर और सुन्दर इतना कि लड़कियों को भी अपने साथ बिठाने में ऐतराज नहीं होता था. एक-दो लड़के तो शिक्षकों से भी फ़िल्मी अंदाज में बातें करते थे. उनमे, मैं पटना कॉलेजिएट स्कूल के सहपाठी शत्रुघन सिन्हा को कैसे भूल सकता हूँ. 

Saturday, July 18, 2015

सिनेमा सिनेमा - 1 !

आजादी मिलने के दशक में मनोरंजन का सबसे अहम् साधन सिनेमा ही हुआ करता था. न किताबी ज्ञान की जरूरत, न भाषा ज्ञान की दिक्कत और सबसे मजेदार बात ये कि लोग अपने-आप को उस फिल्म के किसी चरित्र से  भावनात्मक और मानसिक रूप से जोड़ लेते थे. कुछ तो जिस्मानी तौर पर भी जो राह चलते दिख जाया करता था, ज्यादातर कपडे पहनने और बाल सवारनें में उस समय के फ़िल्मी पात्रो की बखूबी नक़ल होती थी.
मेरा फ़िल्मी ज्ञान चार]बरस की उम्र से ही ही गया था. तब मैं जमशेदपुर में रहता था. मेरे पड़ोस में रहने वाली दीदी की शादी तय हुई थी. वे बहुत आतुरता से तैयारी में लगी थी पर चुपके चुपके. अब शादी होकर ससुराल जाएगी तो गाने की फरमाईश तो होगी ही पर उन्हें औरो की तरह समझदारों को सुनाने में झिझक होती थी . दीदी दोपहर को मुझे टॉफी वगैरह का लालच देकर बुला लेती थी. पहले रिकॉर्ड बजाकर सुनाती, फिर उसी लय में गाना गाती और मुझसे उसकी गुणवत्ता पर चर्चा करती. गाना वे बहुत अच्छा गाती थी और मैं तारीफ़ भी कुछ कम नहीं करता था. गाने के बोल थे “ अब रात गुजरने वाली है”. हारमोनियम के साथ उनकी आवाज बहुत मीठी और मनभावन लगती थी.
एक दिन हम तीनो भाई सरकारी क्वार्टर के गेट पर लगे नल पर नंगे नहा रहे थे. तभी फ़िल्मी होर्डिंग लगी जीप सड़क से वही गाना बजाते गुजरने लगी. भोपूं पर आवारा फिल्म की जानकारी दी जा रही थी और इश्तेहार बिखराए जा रहे थे. हम तीनो भाई इश्तेहार लूटने दौड़ पड़े. बड़े भाई ने तौलिया लपेट लिया था जो रस्ते में ही बदन से गिर गया दौड़ते-दौड़ते. मेरे बदन पर साबुन लगा था. छोटा भाई रोते-रोते हम दोनों तक आना चाह रहा था, जिस हंसी के साथ अनाउन्सर ने हमलोगों की तरफ इश्तेहार झोंका वह अभी तक नहीं भूलता है. तीनो को पर्चे मिल गए जो रिकॉर्ड था नहीं तो कभी एक या कभी एक भी नहीं. चाहे सोते रहें या दूर खेलते रहे, इश्तेहार बटोरना हमलोगों का एक मनपसंद शगल था.

पिताजी को फिल्मों से लगाव नहीं था, पर मजिस्ट्रेट होने के नाते बालकनी में अव्वल सीट खबर भिजवाने पर पूरे परिवार के लिए रिज़र्व हो जाया करती थी वह भी पहले दिन-पहले शो में . पिताजी को छोड़कर पूरा परिवार फिल्म देखने जाया करता था . लम्बे सोफे पर जिस किसी बच्चे को नींद आने लगती थी वह लेटे-लेते देखता हुआ सो जाता था जिसे बाद में चपरासी गोद में लेकर वापिस घर ले आता था. मुझे याद है,आवारा फिल्म. मैंने आवारा का टाइटल गाना पूरी तन्मयता के साथ, “एक बेवफा से प्यार किया” लेटकर और “अब रात गुजरने वाली है” नींद से जागकर भौचक हो देखा था. अच्छा तो यही गाना दीदी रिहर्सल करती रही थी. दूसरी सुबह मैं अपने बाल राजकपूर स्टाइल में सवार और बिन-बुलाये दीदी के पास पहुँच गया. उन्होंने 5-6 बार दोनों गाना गाकर सुनाया. वहीँ खाना खाकर सो भी गया. शाम को दीदी ने उसी तरह मेरे बाल सवार कर मुझे मेरे घर के अन्दर गोदी में लेकर पहुँचाया. पिताजी ऑफिस से आ गए थे. दरवाजा बंदकर उन्होंने मुझे मेरे जीवन का पहला थप्पड़ रसीद किया- “ बरखुरदार अभी से जुल्फी काढने लगे”. दूसरी सुबह रंगरूट स्टाइल में हजामत बनी. 

Friday, June 19, 2015

एक और गाँधी !

1952 अप्रैल में हमलोग टाटानगर से पटना आ गए थे । पिताजी का ट्रान्सफर हुआ था । कदम कुआँ के अनुग्रह नारायण पथ पर एक मंजिला मकान किराए पर लिया गया रहने के लिए । पश्चिम के दो कमरों के पार्टीशन में कम्युनिस्ट पार्टी के लीडर श्री सिआवर शरण का परिवार । बाकी के 10 छोटे बड़े कमरों में हमलोग । पीछे के एक कमरे में वयोवृद्ध शीतल बाबू रहते थे, जो बिना कुछ कहे स्वतः कमरा छोड़ कर जा रहे थे । उनके साथ मेरे से दो साल बड़ा लगभग 7 वर्ष का एक ख़ूबसूरत लड़का भी अपने दादा का हाथ पकडे खड़ा था । पिताजी ने उनसे कहा कि आप जैसे रहते आये थे वैसे ही रहिये, हमलोग इतने बड़े घर का करेंगे भी क्या । सवा पांच फूट के गोर-नारे, सफ़ेद बालों को गाँधी टोपी से ढंके शीतल बाबू ने दोनों हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया । उनकी पलकें भींग आयीं । उन्हें आदर से लोग गाँधी जी कहते थे ।

उन्होंने अपने को पूर्णतयाः स्वतंत्रता संग्राम में झोंक दिया था । पूर्णरूपेण गाँधीवादी । जब बार-बार की जेल यात्रा स्वतंत्रता मिलने के बाद ख़त्म हुई तब वे भी शारीरिक रूप से जर्जर हो चुके थे । राजनीतिक तंत्र को इस गाँधी की कभी याद नहीं आयी न इन्होने कभी याद दिलाने का प्रयत्न ही किया पर जब भी तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ0 राजेंद्र प्रसाद सदाकत आश्रम में आकर ठहरते तब उनसे मिलने अवश्य जाते । पिताजी के पूछने पर कहते कि उनके आने पर बहुत जाने-पहचाने चेहरों से भी मुलाक़ात हो जाती है ।

वे सदैव खादी का ही उपयोग करते थे । यहाँ तक की उनका बिस्तर भी खादी से बना था । अवकाश के दिनों में वे सदाकत आश्रम जाकर गाँधी चरखे पर सूत काटते । शायद उसी सूत से उनका वस्त्र बुना जाता होगा ।

गाँधी जी पौ फटने से पहले स्नान-ध्यान कर, लकड़ी के चूल्हे पर भोजन बना-खा,अपने पोते के साथ निकल जाया करते थे । हमलोगों के जागने के पहले वे दोनों ज्यादातर शायद सत्तू या चूड़ा ही खाकर निकल जाते ।

कामेश्वर समय पर स्कूल आ जाता । स्कूल की छुट्टी के बाद वह अपने कमरे में लौटता । सुबह का बचा खाना खाता । बहुत कहने पर कभी-कभी हमलोग के साथ माँ का बनाया-परोसा खाना खाता । हमलोगों के साथ शाम को खेलता और समय पर अपने कमरे में लालटेन जलाकर पढने बैठ जाता । गांधीजी ने हमलोगों से बिजली का कनेक्शन बहुत कहने पर भी स्वीकार नहीं किया था ।

उन दिनों हमारे घर इंग्लिश दैनिक स्टेट्समैन और हिंदी दैनिक सन्मार्ग आता था । दोनों अखबार कलकत्ता से दूसरे दिन मिलते थे । गांधीजी पटना से प्रकाशित दैनिक आर्यावर्त में कार्यरत थे । उनके चलते नियमित रूप से पटना का ताज़ा दैनिक अखबार “आर्यावर्त” आने लगा था । वे पढ़कर उसे हमलोगों के लिए दालान की चौकी पर रख दिया करते ।

एक रविवार जब मेरी नींद तडके खुल गयी तो मैंने देखा कि गाँधी जी बरामदे के कोने में लकड़ी पर खाना बना रहे थे और साथ में कामेश्वर को पढ़ा भी रहे थे । शायद लकड़ी का धुआं उनकी बीमारी को ज्यादा उग्र बना रहा था । वे डांट और मार ज्यादा रहे थे । मैं डर कर दुबक गया ।

एक दिन पूरा परिवार सर्कस देखने गया । अँधेरा होने पर घर लौटे । बड़े जोर की भूख लग आयी थी । दूर बरामदे से लकड़ी के आंच पर रोटी सिंकने की बड़ी प्यारी खुशबू आ रही थी । गाँधी जी ने हम सभी बच्चों को अपने चारों ओर बिठाकर अरहर(तूअर) की बिना नमक वाली गाढ़ी दाल और आधी मोटी रोटी खाने को दी । गाँधी जी को हाई ब्लड प्रेशर और शुगर की शिकायत थी । दाल बिना नमक की थी तब भी हम बच्चों को बहुत अच्छी लगी । गाँधी जी ने तो अपनी सभी रोटियाँ बाँट दी थी । वे बची दाल खाकर रह गए । उस दिन से हमलोग रोटी और दाल के इन्तजार में जगे रहते । लिट्टी से भी साक्षात्कार गांधीजी ने कराया । कभी-कभी गांधीजी समय अभाव के कारण दाल के साथ ही करेला भी भरता बनाने के लिए उबाल लेते । उस दिन हमलोगों की गति बन जाती ।
माँ ने हमलोगों को कितना मना किया, उन्होंने गांधीजी को भी समझाया । आटा और दाल ले लेने की गुजारिश की । अंत में गाँधी जी की डांट ने माँ को शांत किया । क्रोधित होकर कुछ बोलने के पहले उनके गोर चेहरे पर लालिमा चढ़ती जाती थी जो किसी के भी सहमने के लिए काफी था ।

गाँधी जी निरामिष भोजन करते थे । ज्यादातर कामेश्वर को माँ का बना लहसुन-प्याज वाला और कभी-कभी बनने वाला सामिष भोजन रास आता था । ये बात गांधीजी को नहीं मालूम थी । उन्हें कामेश्वर की और बातें भी नहीं मालूम थीं । वह उसी उम्र में सिनेमा देखने का शौक़ीन हो गया था । अशोक सिनेमा के सेकंड क्लास का गेट कीपर उसके गाँव का था । चौथी बार पटना में “अनारकली” फिल्म लगी थे । कामेश्वर मुझे भी ले गया था । हम दोनों सीढ़ी पर बैठकर पूरी फिल्म देखे थे ।

कामेश्वर पढने में बहुत तेज था । सुबह सूर्य उगने के पहले नियमित स्नान और पूजा ध्यान करता था । उसके गायत्री मन्त्र के उच्चारण से मैं बहुत प्रभावित था ।

गांधीजी की गांधीवादी प्रतिक्रिया की एक-दो यादें अभी तक ताज़ा है । मेरे पड़ोस में एक जज रहते थे । उनके गुलाब के पौधों की फुलवारी सबको आकृष्ट करती थी । वे किसी को फूल नहीं तोड़ने देते थे । एक सुबह, सडक को झाडू से रोजाना साफ़ करने वाली स्वीपर अपने 8 वर्ष के लड़के के साथ सड़क बुहारते आगे बढ़ रही थी । तभी, उस लड़के ने दीवार से बाहर झूलते एक गुलाब के फूल को तोड़ लिया । जज साहब झन्नाटे से बाहर आये और उस लड़के के गाल पर एक चप्पल जड़ दिया । उतने क्रोध में भी उन्हें अस्पृश्यता का ख्याल रहा होगा । एक पल तो वह लड़का सन्नाटे में आ गया पर दूसरे पल उसकी जुबान से दो-तीन भद्दी गालियाँ निकली और वह रोने लगा । इसके बाद जज उसे चप्पल से मारते जाएँ और वह गलिया दे-देकर रोता जाए । लड़के की माँ अलग बिलख रही थी । यह सिलसिला खत्म होने को नहीं आ रहा था । मामला जज का था इसलिए वहां जमा होती भीड़ भी चुपचाप थी । गांधीजी ने ही पहुंचकर लड़के को उनसे दूर किया और कहा कि इसे तो संस्कार नहीं मिला है पर आप तो संस्कारी हैं ।

1955 अगस्त में आज़ादी के बाद भारतवर्ष का पहला और भीषण छात्र आन्दोलन पटना के बी०एन०कॉलेज के छात्रों पर पुलिस गोली काण्ड से आरभ हुआ था जिसमें 9 छात्र शहीद हुए थे । 15 अगस्त को सुबह हमलोग छत पर तिरंगा फहराने पहुंचे । वहां पहले से पडोसी कम्युनिस्ट नेता ने काला झंडा लगा रखा था । पिताजी ने आक्रोश के साथ काला झंडा फाड़ दिया । तकरार बहुत बढ़ जाती अगर गांधीजी हस्तक्षेप न करते । याद तो नहीं है पर छत पर केवल तिरंगा ही रहा ।

मैं 1956 में कक्षा 5 में था और कामेश्वर 6 में । सत्र समापन पर मुझे मेरा मार्क्सशीट मिला । मेरे नंबर 50% के आसपास थे । प्रफुल्लित मन जब घर के कोर्टयार्ड के अन्दर आया तो मैंने देखा कि गांधीजी कामेश्वर को कुर्सी पर खड़ा कर बेंत से पीट रहे हैं । उसे कम नम्बर आये थे । कुछ देर बाद जब गांधीजी काम से बाहर चले गए तो मैंने कामेश्वर का अंकपत्र देखा । सभी विषयों में उसे 90% से ज्यादा आये थे और क्लास में प्रथम आया था । उसकी पिटाई इस कारण से हो रही थी कि उसे हिसाब में 100 में 100 क्यों नहीं आये 97 क्यों आया । कामेश्वर बहुत खूबसूरत था । बेंत के निशान उसके गोरे शरीर पर नीले दाग लिए हुए भरे पड़े थे । 1959 अक्टूबर को पिताजी का ट्रान्सफर झुमरी तिलैया और फिर 1961अप्रैल में हमलोग रांची आ गए । 1964 में , जब किसी काम से मैं पटना गया तो उसकी खोज-खबर ली । पता चला, 1960 में गांधीजी की मृत्यु के बाद, उसके पिता उसे अपने पास कलकत्ता ले गए थे ।

2001 में, मुझे कॉर्पोरेट चीफ बनाया गया सेफ्टी और एनवायरनमेंट मैनेजमेंट का । उसी सिलसिले में मैं अपने एक सिस्टर कारखाने का सेफ्टी ऑडिट कर रहा था । तभी टाइम-कीपिंग बूथ पर गाली-गलौज की पुरजोर आवाज आने लगी । लगता था, अगर रोका नहीं गया तो नौबत खून-खराबे तक चली जाएगी । मेरे साथ शॉप सुपरिटेनडेंट भी थे । उनके दखल से मामला शांत हुआ । उन्होंने टाइम-कीपर को बहुत डांटा और हिदायत दी कि अगली बार अगर वह नशे की हालत में दिखा तो उसे हटा दिया जाएगा ।

टाइम-कीपर की दिहाड़ी नौकरी पर और कोई नहीं कामेश्वर था । उलझे बाल, बेतरतीब कपडे, पान से रंगे दांत में भी उसकी खूबसूरती का पैनापन दमक रहा था । उसने मुझे नहीं पहचाना । बाद में, मैंने HRD जाकर उसका बायोडाटा देखा । उसकी दिहाड़ी नौकरी यूनियन की सिफारिश पर बहाल रहती थी नहीं तो आये दिन उसके शिकायत का पुलिंदा बढ़ता जाता था । कामेश्वर 10वी क्लास तक ही पढ़ पाया था । उसका कुछ भी नहीं किया जा सकता था सिवा इसके कि अपनी पहचान बताकर उसे शर्मिंदा करूं ।