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Monday, February 23, 2015

ये तो होना ही था !

मुझे बच्चों का  साथ  सबसे प्रिय है. उसका एक  महत्वपूर्ण कारण है. वह है उनकी निष्छलता.  आप अपने में भी कुछ वैसा ही भोलापन भर लीजिये और तब देखिये जिंदगी कितनी सरस हो जाती है.
पांच वर्ष की उम्र के आसपास बच्चों को सबसे ज्यादा प्रिय खेलना लगता है. उनकी पूरी दुनिया खेल के इर्द-गिर्द ही घूमती है. उम्र के इसी चढ़ाव पर उनकी रह-रह कर अपने माँ-बाप से ठनती रहती है. सुबह उठते ही खिलौनों की तरफ दौड़ लगाना, नाश्ते-खाने  के समय टीवी देखना और यह इच्छा रखना की कोई कौर बनाकर उसे खिला दे. होम वर्क के समय स्थिर बैठना कम और ध्यान दूसरी तरफ रखना, स्कूल से लौटते ही भरी दुपहरी से ही बाहर जाकर खेलने के जिद करना, सोते समय सपने में हँसना-रोना और उठकर बैठ जाना . पूछने पर कोई ऐसी बात बताना जैसे उसकी  निंजा से लड़ाई हो रही थी और निंजा ने उसे  हरा दिया. ये सब तो कुछ सैंपल हैं.
इसी समय सबको दादा-दादी, नाना-नानी की कमी खलती है. यही पीढ़ी बखूबी ब्रिज का काम करती है. माँ-बाप को थोड़ी राहत, बच्चे को अपनी चाहत के लम्हे और बुजुर्गों को एक और बर्थडे मन जाने की आशा. मुझे छह महीने अपने नाती के साथ गुजारने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, बेरस सी जिंदगी में मानो  रंगो की बौछार आ गयी हो. कोई भी ऐसा बचपन में खेला गया खेल नहीं होगा जिसे मैंने दोहराया नहीं होगा. लुका-छुपी, लूडो, सांप-सीढ़ी, हाथी-घोडा, बैट-बाल, से लेकर आजकल के नए खेल जैसे निंजा, ट्रांसफार्मर, स्पाईडर मैन , माइन क्राफ्ट, बिल्डिंग  ब्लॉक्स, इत्यादि और भी न जाने क्या-क्या. पर सबमें एक-दो  बात जरूर रहनी चाहिए थी, वह था, लड़ाई-झगड़ा  और हमेंशा हारते रहना.
अब तो वह सुबह उठते ही मेरे कमरे में आकर वही मशहूर जादू की झप्पी देता. हमलोगों में इतना ज्यादा लगाव हो गया की ये सभी के लिए चिंता का विषय हो गया . सभी मुझे समझाते रहते थे कि बिछुड़ने पर बहुत दुःख होगा . पर मैं मन को यही समझाता रहता था की जब बचपन और जवानी से बिछुड़ने का दुःख मैंने चाहे जैसे भी पार कर लिया तो यह तो मात्र छह महीने का स्वर्ग था.  मैं अपने नाती के बारे में थोड़ा परेशान अवश्य था.  मुझसे खेलने में इतना मशगूल रहता की अगर उसके दादा-दादी का फ़ोन आता तो वह उस समय ही अपना ध्यान खेल की तरफ ही रखता .  दादा-दादी बुरा न मान जाएँ इसलिए उसकी माँ बगल मैं बैठकर उसे प्रांप्ट करती रहती। जब भी ऐसा फ़ोन आता तो रटे -रटाये पांच-छह जुमले जरूर चिपकाए जाते, जैसे- दादू  नमस्ते !, आप कैसे हो !, आप  कब आओगे !, मेरे लिए  खिलौना आया है! आओगे तो हमलोग खेलेंगे ! अपना ख़याल रखियेगा ! नमस्ते !
लौटने में जब दो-चार दिन शेष रह गया तो उसकी माँ ज्यादा समय बच्चे को अपने पास ही रखती जिससे उसे बिछुड़ने की तकलीफ न हो. इतना कि नाश्ते-खाने के समय , मेरी जगह वह उसके पास बैठती. लौटने के समय सबकोई एयरपोर्ट मुझे विदा करने आये . मेरा नाती भी दो बजे रात तक साथ रहा. सिक्योरिटी चेकिंग के गेट पर उसने मुझे बहुत चुपचाप जादू की झप्पी दी. हमदोनो एक दूसरे से कुछ भी नहीं बोले. मैं तो समझ कर नहीं बोल रहा था और उससे नजर बचा रहा था पर वह समझ ही नहीं पा रहा था की इस समय कैसे क्या करना चाहिए.
वतन पहुंचते ही दो तीन बार फ़ोन पर बातें हुईं पर मैं नाती का कोई जिक्र छेड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाया.
आज  मेरी बेटी और दामाद ने फ़ोन करने के बाद रिसीवर नाती को थमा दिया. नाती ने बड़ी गर्मजोशी के साथ मुझसे  बातें की- नानू नमस्ते !, आप कैसे हो !, आप  कब आओगे !, मेरे लिए  खिलौना आया है! आओगे तो हमलोग खेलेंगे ! अपना ख़याल रखियेगा ! मैं भी इंडिया आयूंगा ! नमस्ते ! मैंने राहत की ठंडी सांस ली ; गर्मजोशी का क्या है वह तो आज-कल की बात है.
मुझे यद आया नजदीक के तालाब की वो बत्तखें जो मुझसे बहुत हिलमिल गई थीं  मुझसे रोटी के टुकड़े तकरीबन हाथ से उठा लेती थीं  पर जब उनका मौसम आया तो न जाने वे कहाँ चली गयीं।  फिर एक महीने बाद जब लौट कर आईं तो लगा जैसे उन्होंने इस अलगाव को दिल पे नहीं लिया है. इन बच्चों के साथ भी ऐसा ही होता होग. कुछ दिन उदासी और उसके बाद बाये नए दोस्त, नए खिलौने  और सुरसा की तरह बढ़ता हुआ पढ़ाई का व्यापार. शायद सबसे ज्यादा व्यस्त बच्चे ही रहते हैं, तकलीफ तो खाली बैठे लोगों को होती है अपने यादों की नशीली झीलों में डूबते-उतरते समय जलाते हुए.
मुझे भी अब कहाँ अपने नाना-नानी, दादा-दादी या फिर दिवंगत माँ-बाप की याद आती है ? फेसबुक पर कोई श्रद्धालु उनकी फोटो एक दर्दीले जुमले के साथ डाल  देता है तो सबकी तरह मैं भी "लाइक " का बटन दबा देता हूँ.

Sunday, February 8, 2015

वह बूढी माँ !

I was studying in standard seven. A day etched vividly in my memory, my elder brother playfully teased me with his new pen as we returned home from school. The teasing took an unexpected turn, and I found myself crossing the threshold of our house in tears. It was then that an old wrinkled, stooping with age woman, wrapped in tattered clothes and emanating the suffocating smell of coal smoke, appeared seemingly out of nowhere and enveloped me in a comforting hug.


Her presence was a sudden solace, and my tears were momentarily forgotten as I found myself embraced by this mysterious old woman. It took considerable effort to disentangle myself from her, and only then did I realize the pungent odour clinging to her from the coal smoke. It was my mother who later shed light on her identity.

In our household, I had two brothers—one a year and a quarter younger, the other older than me. The elder one, unwell at the time, received special attention from our grandparents, while the youngest naturally claimed a spot in our mother's lap. This elderly woman, around 60 years old, had no fixed abode. After overcoming numerous hurdles, she sought refuge in our home, becoming the caretaker responsible for all household chores, from cooking to cleaning. This elderly lady became my nanny (caregiver). She carried me on her back while working until I could stand on my own. She became my foster mother for those critical days when my father was posted in Gaya town.

After tracking our address from one of my father's colleagues, she journeyed to Patna in a coal-powered steam engine train just to see me. Despite knowing my aversion to the smell of coal smoke, she strived to make a lasting impression on me. Bathed and adorned in a clean white Khadi saree from my mother, she sat beside me during meals, feeding me with her own hands. When I returned from play, she handed me the exact pen my brother had teased me with—a red Doric pen costing 6 annas (37 paise). She had acquired a similar pen from the market, a gesture that earned her a reprimand from my mother. She possessed only two rupees, yet the wealth she shared with me in the form of sweets, chocolates, and toys every afternoon transcended monetary value.

This selfless, maternal figure remained with us for four days, during which I was inseparable from her. Each morning, I'd wake up on her mat. On the day of departure, she tightly embraced me, weeping continuously. On her departure, her Magahi words echoed in my ears: "I am not coming again - I am not coming again." With her final tearful embrace, she disappeared into the bustling market, her faded figure merging with the throng. Her parting words, "I am not coming again," hung heavy in the air, a stark reminder of the impermanence of life and the fleeting nature of unexpected encounters.The imprint of her love remained etched within me, a permanent marker of the warmth and security she offered during a vulnerable time. The scent of coal smoke, once repulsive, became a bittersweet reminder of a bond born out of chance and nurtured by selflessness. The red Doric pen, no longer a symbol of my brother's teasing, became a precious talisman, a tangible memory of her extraordinary affection. Years later, amidst the tapestry of love woven by others, it is her selfless gesture, her unwavering presence, that continues to shine the brightest, a testament to the enduring power of a love given freely, without expectation.

Tuesday, January 27, 2015

अब बस !

आज ट्रांसपोर्ट क्षेत्र में भी क्रांति दिख रही है । धक्का देकर स्टार्ट होने वाली बस की जगह सेल्फी बस ने ले ली है । लिमो कैब से लेकर कारवान और उससे भी आगे का जनरेशन सड़क पर छाया हुआ है । हवाई जहाज कम्पनीज भी अब एयरबस कहलाने में गर्व महसूस करती हैं । पर क्या इतना कुछ बस पर की गयी पहली सवारी का रोमांच छीन पायी ? और अगर रोमांच की बात करें  तो वह भी प्रचूर मात्रा में गाँव से पांच मील दूर की सड़क से गुजरने वाली बस पर यात्रा करने में आज भी है ।
पैदल अथवा बैलगाड़ी पर दूरी तय करने के बाद घंटो इन्तजार करने के बाद जब दो मील दूर पर कच्ची सडक पर धुल व् गर्दे का गुबार दीखता है तब सांस में सांस आती है । मुरझाया चेहरा खिल उठता है । शहर और मेट्रो आते-आते तो सबकुछ यांत्रिक ही रह जाता है । आपकी नजर सदैव अपनी घड़ी पर ही टिकी रहती है । ड्राईवर कैसा है, कंडक्टर अगर है तो कैसे मिजाज का है, आगे-पीछे तो भूल जाईये, बगल मैं कौन बैठा है, कब बैठा है और कब उतर गया , खिड़की से नजदीक या दूर तक क्या कैसा नजर आ रहा है, कुछ भी नहीं महसूस होता है । कभी-कभी तो आप अपना कुछ सीट पर ही भूल जाते हैं । बीते कल की, कागज़ की किश्ती, आज के क्रूज से कही ज्यादा मजा देती है । बार बार हमें अपना कल भूलने की हिदायत दी जाती है । काश, कोई हमें भूलने की अदा न दे ।

बिहार की ग्रीष्मकालीन राजधानी और अब झारखण्ड प्रदेश की राजधानी, तब 1960 के दशक में शहर कहलाने को बेताब दिख रही थी । देखते-देखते लोकल बसों की संख्या दो से बढ़कर सात हो गयी थी । तब रांची की लम्बाई 15 किलोमीटर रही होगी । धुर्वा, हटिया, बरियातू और कांके इसके चारों कोने थे बिलकुल हाथ और पैर पकड़ कर लम्बे किये गए अंग्रेजी के X अक्षर जैसे, जिसके मध्य में डोरंडा प्रखंड स्थित था । डोरंडा के बिलकुल बीचो-बीच मेरा घर जिसके सामने से सभी बस गुजरती थीं । कोई तीन किलोमीटर दूर मेरे घर के बाये तरफ हरे पेड़ों से भरी तराई के ऊपर से गुजरने वाली सड़क से गुजरती सभी गाडियो के पहिये तक दिख जाते थे । मैं रंग-बिरंगी बसों को देख कर ठंडी साँसें लेता था कि मालूम नहीं कब मुझे इन बसों में सफ़र करने का मौक़ा मिलेगा और उससे बड़ी बात की झिझक ख़त्म होएगी ।

मेरी उम्र तब तेरह वर्ष थी और मैं कॉलेज जाता था । जबतक कॉलेज नजदीक था, मैं साइकिल से आता-जाता था । पर बाद में मेरा कॉलेज बरिआतु के निकट चला गया कोई 8 किलोमीटर दूर । मेरी थकान देखकर बस से जाने की अनुमति मिली । अनुमति याने 50 पैसे ।

शनिवार की शाम से लेकर सोमवार की सुबह कैसे गुजरी इसका अंदाजा आप अपने पहले इंटरव्यू की तैयारी से लगा सकते है । पहले से बस यात्रा करने वाले सहपाठियों से बस की टाइमिंग और ठहराव नियत करना, कपडे धोकर, सुखाकर इस्त्री करना, बाटा के टफी जूते की दो-तीन बार पोलिश कर चमकाने से लेकर हेयर स्टाइल और यहाँ तक की कापी, पेन, रूमाल और 50 पैसे की हिफाजत की बार-बार रिहर्सल घर के सभी लोगों में मजाक और कभी-कभी खीज का विषय सा बन गया था ।

अभी भी याद है । वह कलिका बस सर्विस थी । ठीक सुबह 7.45 पर अपने समय पर आयी थी । बस खचाखच भरी थी और क्यों न हो ? वह समय स्कूल, कॉलेज और ऑफिस जाने वालों का हुआ करता था । एक दुबले-पतले गोरे से मुस्कुराते कंडक्टर ने सहारा देकर मुझे ऊपर खींच लिया । अगल-बगल सभी लोग मुझसे लम्बे थे इसलिए मुझे सांस लेने में कठिनाई हो रही थी । तभी कंडक्टर आ गया । बोला- आज पहला दिन है, आदत हो जायेगी । मालूम नहीं उसे कैसे मालूम हो गया कि वह मेरा पहला दिन था । मेरी तरफ टिकट बढाया । उसने मेरी पीछे की कालर सहलाते हुए कहा कि बहुत शानदार कपडे की शर्ट सिलवाई है । पर जैसे ही उसने कालर खींची वह चर्र की आवाज के साथ फट गयी । मेरे पास बस वही एक अच्छी शर्ट थी । मेरा रूआंसा मुंह देखकर किसी ने मुझे हंसकर बताया कि यह कश्मीरी ऐसे ही सबको मुंह से कर्र की आवाज निकाल कर डरा दिया करता है । बगल की सीट पर बैठी सीनियर लड़कियों ने सहानभूति दिखाकर मुझे अपने बगल में जगह बनाकर कर बिठा लिया । तभी मेरे एक सहपाठी ने उनको बताया कि यह कोई स्कूल जाने वाला बच्चा नहीं है बल्कि उनसे एक वर्ष ही जूनियर क्लास में है । पलक झपकते उन बंगाली लड़कियों के लिए मैं अछूत हो गया । मैं खुद ही उठ खड़ा हुआ ।

उस कालिका बस से मेरा आगे की चार वर्षों तक साथ रहा । कभी मैं सोया रह जाता था तो खलासी या कंडक्टर मेरा पड़ाव आने पर जगा दिया करते थे । कभी घर से निकलने में देर होती थी तो हॉर्न बजाकर मुझे सजग कर दिया करते थे । हालांकि मैंने देर न हो उसके लिए बहुत सटीक तरीका खोज लिया था । मेरे बरामदे से करीब ३ किलोमीटर पहले कोई 50 मीटर ऊंची तराई पर से एरोड्रोम की बगल वाली सड़क से गुजरती सफ़ेद पर लाल धारियों वाली बस दिख जाया करती थी और मुझे कम से कम 10 मिनट का समय मिल जाया करता था । बाद में 1966 में हमलोग धुर्वा के ऑफिशियल बंगले में आ गए । तब भी इसी बस को मैं 7 .30 पर पकड़ता था । उस वक्त सभी बस सर्विसेस समय पर चलकर गर्वान्वित रहती थी । केवल एक रांची ट्रांसपोर्ट को समय की तमीज नहीं थी ।

इसी बस में मुझे अपने जीवन का सबसे सुखद कॉम्पलिमेंट मिला, वह भी माँ से । एक दिन लौटते समय बहुत जोर की भूख लग गयी थी । मेरे पास एक बॉन ब्रेड खरीदने का पैसा था । सोचा अभी चार बजे घर जाकर सोती माँ को तंग करने से अच्छा है कि मैं बॉन खा लूं । मैं एक बस-पड़ाव पहले ही उतर गया और दुकान से बॉन खरीद कर बड़े-बड़े कौर में निगलते हुए घर पंहुचा । पर ये क्या । माँ तो दरवाजे पर खड़ी मेरा इन्तजार कर रही थी । मेरे पहुंचते ही उसने मुझे बहुत पुचकारा और मेरे लिए खाना परोसने चली गयी । खाना खिलाते-खिलाते उसने कहा कि वह भी उसी बस से लौट रही थी । माँ ने पिछली सीट से आगे  एक वृद्ध महिला को कुछ पल धक्के खाते खड़ी देखा । उसने यह भी देखा कि एक लड़के ने तुरत खड़े होकर उस वृद्धा को बैठने का आगाज़ किया । माँ ने जब यह देखा कि वह और कोई नहीं उनका बेटा प्रकाश ही है तो आँखे नम हो आयी । माँ ने यह कहकर बड़े प्यार से मेरे सर पर अपना  हाथ सहलाया ।

मेरे लिए वह कॉम्पलिमेंट जीवन भर के लिए आनंद के सबब के साथ मुसीबत भी बन गयी । आनंद और मुसीबत एकसाथ इसलिए कि अब इस उम्र में भी अगर कोई बुजुर्ग(चाहे उसकी उम्र मुझसे कम क्यों न हो)मेरी सीट के पास आकर खड़ा हो जाता है तो मुझमें वही प्रकाश समाने लगता है

Friday, January 9, 2015

हाफपैंट !

1960 के दशक में तबके बिहार की ग्रीष्मकालीन राजधानी रांची २५ वर्ग किलोमीटर में सिमटी हुई बहुत ही मनभावन लगती थी. ऊंची-नीची पगडंडियों जैसी सड़के, हरियाली और तरह तरह के पक्षियों के कलरव से संगीतमय और शायद संसार के सबसे भोले-भाले आदिवासियों से गुलज़ार जो सुबह से रात तक गाना गाने और नाचने के लिए बेताब, भला रांची से अच्छी जगह कौन से हो सकती थी.
उस वक्त वहां दो ही कॉलेज थे. एक मिशनरी संत ज़ेविएर्स और दूसरा रांची यूनिवर्सिटी का रांची कॉलेज. पहले में आदिवासियों को प्रशय दी जाती थी और दूसरे में सरकारी महकमे में कार्यरत लोगों के बच्चों को. मुझे रांची कॉलेज में एडमिशन मिला.
अंग्रेजो के जमाने का लाल ईंटो से बनी दोमंजिली इमारत जिसके चारों तरफ टिन और एस्बेस्टस के छत वाले क्लास रूम बनाए गए थे ज्यादा क्लासेज चलाने के लिए. तब इस कॉलेज का विशाल गेट दक्खिन की तरफ बड़े डाकघर के सामने मेनरोड पर था.
26 जुलाई १९६१ ! मैं बहुत डरते-सहमते कॉलेज के गेट से अन्दर आ रहा था जबकि मुझे मालूम था कि रांची जैसी जगह में किसी ने रैगिंग के बारे में सुना तक नहीं था. कॉलेज कैंपस में उस समय लगभग तीस जन आ-जा रहे थे. उनमें ज्यादातर 16-20 उम्र के लड़के थे और इक्का-दुक्का कॉलेज के स्टाफ जैसे लोग दिख रहे थे. मैं ठिठका. उस एक मिनट के समय में मानो मेरे साथ-साथ पूरा कॉलेज थम सा गया. सभी की भौंचक निगाहें मेरी तरफ लगी थी. और ऐसा क्यों न होता.
उनके सामने एक सफ़ेद हाफ शर्ट और आसमानी निकर(हाफपैंट) पहने 4 फीट 9 इंच ( ) ३२ किलो यानी एक अदना पतला दुबला मात्र १३ वर्ष का लड़का कॉलेज कैंपस में किताब-कोपियों के साथ अवश्य एडमिशन लेकर पढने आ रहा था.
चार-पांच लड़कों का एक ग्रुप बहुत सहमते हुए मेरे नजदीक आया. सहमते हुए शायद इसलिए कि कहीं मैं डरन जाऊं. उन्होंने मुझे “आप” का संबोधन दिया और मेरे बारे में जानकारी हासिल की. मैंने भी सभी से आप के संबोधन के साथ बात की. ये आप का संबोधन पूरे सत्र तक चला. पांच मिनटों के उस इंटरव्यू के खत्म होने के समय भीड़ बढ़कर 15 से जयादा की हो गयी होगी. उसके बाद उनमे से दो लड़कों ने बड़े आदर के साथ मुझे मेरी कक्षा तक पहुँचाया.
कॉलेज में पूरे सत्र मैं आश्चर्य का विषय बना रहा. क्लास में मेरे लिए आगे की बेंच में जगह खाली मिलती. क्लास ख़त्म होते ही मुझे “ लेडीस फर्स्ट” जैसी बेसिस पर पहले निकलने दिया जाता. मेरी देखा-देखी मेरे से थोडा बड़ा किर्तिबस रॉय भी कभी-कभी निकर पहन कर आ जाता.
मुझे इस तरह का आदर और एक्सपोसर भाने लगा था. मैंने पहले वर्ष की पूरी पढाई निकर पहन कर ही की. अगले वर्ष यानी दुसरे सत्र में मैं पुनः निकर पहन कर ही कॉलेज पंहुंचा. एक और पंजाबी लड़का जो मेरे से ३ वर्ष बड़ा होगा और ऊंचाई भरपूर पौने छ फीट की होगी, वह भी निकर पहने कॉलेज पंहुचा. पर इस बार मेरे पुराने सहपाठियों ने बगावत कर दी. दूसरे दिन से प्रदीप कुमार सोबती तो फुलपैंट पहन कर आने लगा लेकिन मेरे पास तो हाफ पैंट के अलावा कुछ था भी नहीं.
पिताजी को जब तीन दिन बाद मालूम हुआ कि मैं कॉलेज किसलिए नहीं जा रहा हूँ तो वे आनन-फान में अपने टेलर “Royta” ले गए. उस बंगाली टेलर ने मेरे लिए एक २२ इंच मोहरे के फुलपैंट सिल दिया जो फुलपैंट कम और पायजामा ज्यादा लगता था. शाम को सोबती जो पड़ोस में रहता था जब उसे मालूम हुआ तो वह सुबह अपने मामा की काली रोल्स रोयस लेकर आ गया कॉलेज जाने के लिए. वह भी मेरे पैंट को और मेरे चलने के तरीके को देखकर बड़ी मुश्किल से हंसी रोक पा रहा था.
रांची की शायद पहली ऐसी कार जब कॉलेज में दाखिल हुई तो सबलोग रूककर भौचक देखने लगे. और जब उसमें से बहुत ही ढीली-ढाली पैंट पहने मैं उतरा तब तो जैसे भूकंप आ गया. मैं एकदम जोकर लग रहा था और महसूस भी कर रहा था.
लौटते समय मैं सारे  वक्त अपने फुलपैंट के बारे में सोच रहा था. मुझे सिलाई मशीन पर सिलाई आती थी कुछ-कुछ. चुपके से सिलाई मशीन मैं अपने कमरे में ले आया. पेंसिल से निशान लगाकर कटाई-छटाई शुरू की उसे ड्रेनपाइप पैंट में आल्टर करने के लिए. कैंची नहीं मिली तो ब्लेड से सिलाई उधेरने/काटने लगा. गलती से ब्लेड से मेरी  ऊँगली और अंगूठा बुरी तरह कट गया. पूरा पैंट खून से सारोबार हो गया. बहुत धोने पर भी खून के धब्बे नहीं गए और पैंट पर बुरी तरह दीखते रहे. 
अगली सुबह और उसके तीन दिन बाद तक मैं कॉलेज नहीं गया. घर में जो भी अखबार-रद्दी था उन्हें बेचकर ६ रुपये जमा हुए. उससे पैडीग्रीन रंग का  कपड़ा खरीदा गया. उसे कॉलेज के लड़कों के लिए सिलाई करने वाले नौशाद टेलर को दिया गया. उसने दो दिन में ड्रेनपाइप पैंट सिल कर दे दिया.
उस पैंट को मैं पूरे सत्र पहनता रहा. उसकी धुलाई व् इस्त्री छुट्टी के दिनों होती थी. हाँ, पर मैं उसे पिताजी से छिपकर पहनता था. इसके लिए उनसे ज्यादातर हाईड-सीक खेलना पड़ता था.

आज तकरीबन 55 वर्ष बाद ऑस्ट्रेलिया में जहां लोग कम से कम कपडे पहनते हैं जो ज्यादा पर्यावरण मसला लगता है, वहां मुझे फिर से हाफ पैंट पहनने की हिचकिचाहट मिटाने में चार महीने लग गए..पर ज़रा मौके की attitude देखिये , ६ रुपये की रद्दी इन 55 वर्षों में सूद के साथ कितनी ज्यादा appreciate कर गयी.  तकरीबन 600 डॉलर का था. जगह थी दुनिया के दूसरे सबसे महंगे इमारत सिंगापुर, मरीना बे सेंड्स , पर सबसे मंहगा होटल स्काई आन 57 के टेरेस पर !


Monday, June 23, 2014

एक समय रांची में !

फ़र्ज़ किजीये, एक बड़े टोकरे में 10-12 किलो तरह-तरह की सब्जियां एक लुंगीनुमा साड़ी में लिपटी 70 वर्षीय पोपले मुंह वाली आदिवासी महिला आपको मुंह-मांगे दाम पर देने के लिए तत्पर हो और आप शर्मसार होते हुए उसे 50 पैसे दे दें और वह उसे ख़ुशी-ख़ुशी ले ले । या फिर, मात्र 25 पैसे में कोई रिक्शावाला आपको 5 किलोमीटर राजी-ख़ुशी ले जाए । ऐसा ही कुछ व्यापार था 1961 के रांची शहर में जो उस समय बिहार की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी और प्रान्त का चेरापूंजी कहा जाता था ।
तब इस शहर की आबादी कोई 30 हजार रही होगी । ज्यादातार रिहायशी इलाके बंगाली महाशयों ने बसाए थे । साउथ ऑफिसपारा, नार्थ ऑफिसपारा, पीपी कंपाउंड, बर्दवान कंपाउंड, लालपुर, बहु बाजार और भी कई । जाहिर है इस शहर में सबसे ज्यादा धूमधाम से दुर्गापूजा मनाई जाती थी जो आजतक बरकरार है पर अब उसमें कृतिमता का समावेश हो गया है । पूरा शहर 50 वर्गमील में नापा जा सकता था । दूसरी तादाद बिहारी मुस्लिमों की थी जो कांके, हिंद्पिडी, डोरंडा व् कर्बला चौक में रची-बसी थी । 1960 के दशक में रांची में आगमन की जैसे क्रान्ति आ गयी थी ।डोरंडा के मेरे घर से तीन किलोमीटर दूर करीम १५० मीटर की ऊंचाई पर एअरपोर्ट के सामानांतर सड़क पर गुजरती गाड़ियां दिखती थी और मैं अपनी बस को आते हुए दस मिनट पहले ही देख लेता था और समय पर स्टैंड पहुँच जाता था.
1958 में हैवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन की स्थापना रांची को पूरी तरह बदलने वाली थी । 25000 से ज्यादा बहाली होने वाली थी । आलम यह था कि बहुतेरे लोग डरे-डरे रांची आते थे । अफवाह थी कि लोगों को पकड़ कर बहाली कर दी जाती थी । ऐसा हुआ भी था ।
स्कूलिंग का दौर ख़त्म करके, मैंने कॉलेज में दाखिला ले लिया था । सुबह उठने के लिए अलार्म की आवश्यकता नहीं पड़ती थी । ट्रकों में लदी हुईं आदिवासी कामगार जिनमे लड़के-लडकिया बराबर की तादाद में होती थी, बहुत ही मधुर समूह गीत गाते गुजरते रहते थे, कभी-कभी मांदर की थाप भी सुनायी देती थी । बाकी का दैनिक संगीत समारोह हरे-भरे पेड़-पौधों से ढके शहर पर तैरते-झूमते पक्षियों का कलरव पूरा कर देता था । राची पक्षी पर रखे नाम के इस शहर को अंग्रेजों ने 1927 में रांची नाम दे दिया था । डोरंडा जहां मैं रहता था, वह दोरं= संगीत और डाह=जल की संधि से बना था । पास ही स्वर्णरेखा नदी बहती थी । तब पास के ऑफिसपाड़ा मोहल्ले में एक बंगाली बुजुर्ग पियानो बजाया करते थे । पहली बार मैंने पियानो देखा । मैं महान बंगला फिल्मों के निर्देशक ऋत्विक घटक को नहीं जानता था । वे महाशय उनके करीबी थे और ऋत्विक उनके घर आया-जाया करते थे । संगीतमय पर्यावरण कैसा होता है मुझे महसूस होता था ।
बादल और बारिश के लिए तो जैसे रांची एक पसंदीदा जगह थी । किसी भी महीने, कभी भी बारिश हो जाया करती थी । पर उस दिन सुबह से बादल बरस तो नहीं रहे थे पर उनका गरजना शांत नहीं होता था । 21 अक्टूबर, 1962,शायद रविवार था इसीलिए सबलोग देर से ही सोकर उठे थे । अचानक किसी को महसूस हुआ कि इस तरह का निरंतर गरजना बादलों का नहीं हो सकता था । गौर से देखने पर बादलों के बीच दो-तीन डकोटा प्लेन उड़ते दिखे । उन दिनों सप्ताह में एक बार डकोटा पैसेंजर प्लेन आया करता था । बाहर निकल कर सडक पर देखा तो निसान ट्रक के काफिलों पर बिहार मिलिट्री के गोरखा जवान ज्यादातर 303 रायफल पकडे बैठे जाते दिखे । आठ बजे रेडियो समाचार से पता लगा कि चीन से युद्ध शुरू हो चुका था । जवानों से भरी ट्रकों का एअरपोर्ट की तरफ दौड़ पूरे दिन चली ।
देश के पहले प्रधान मंत्री दिवंगत पंडित जवाहर लाल नेहरु का सबसे मनोरम सपना था हैवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन । वे स्वयम इस कारखाने को देश को समर्पित करने के लिए रांची आये थे । 15 नवम्बर 1963 के तडके हवाई अड्डे जाने वालीं सभी सड़के और गलियाँ जन समुदाय की भीड़ से भर गया था । मैं भी हवाई अड्डे पर लगे बांस के बैरिकेड के खम्बे को पकड़ कर खड़ा था नहीं तो पता नहीं भीड़ मुझे कहाँ धकेल देती । जहाज समय से पहले आकर आकाश में चक्कर लगा रहा था और ठीक समय पर जहाज उतरा । बड़ी ब्यूक कार के खुले हुड पर नेहरूजी बैठे हुए पास में पड़ी ढेरों मालाएं भीड़ पर फेंक रहे थे । कार जैसे ही मेरे समीप आने लगी, मैं बांस के खम्बे पर पैर टिका कर उनकी एक झलक पाने को खड़ा हो गया । एक क्षण को नजर मिली और चाबुक की तरह एक गेंदे के फूलों की माला खम्बे से आकर टकराई । दूसरे ही क्षण उस माला के फूलों की छीना--झपटी हो गयी । मुझे अभी भी याद है नेहरु जी 16 की सुबह उसी तरह हुड पर बैठ कर मेरे घरके सामने से गुजरती सड़क से लौट रहे थे । सफ़ेद गाँधी टोपी, सफ़ेद अचकन और उसके बटन-होल में फंसा सुर्ख लाल गुलाब की कली । मेरी 75 वर्षीय दादी भी मेरे बगल में खड़ी थीं । दादी के नमस्कार का जवाब नेहरु जी ने मुस्कुराकर दोनों हाथों को जोड़ कर दिया था ।
दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे विशाल कारखाने के बनने के बाद रांची बड़ी तेजी से बदलता गया । 60 के दशक के अंत तक आबादी बढ़कर 4 लाख हो गयी । एक नया रेलवे स्टेशन हटिया में बना । हवाई अड्डे का आधुनिकीकरण हुआ । दो और चार पहिया वाहनों की संख्या 30-40 से बढ़कर 25 हज़ार तक पहुँच गयी । नंबर प्लेट BRN से BHV और फिर BHN हो गया । रांची भारत का एक सबसे बड़ा शैक्षणिक हब बन चुका था ।
बहुत कुछ अच्छा हुआ पर कुछ बहुत दुखद भी हुआ । हमलोग पाकिस्तान के विरुद्ध 1967 की लड़ाई तो जीत गए पर तुरंत ही एक बहुत ही दारुण हिन्दू-मुस्लिम दंगे की यंत्रणा झेलनी पड़ी । दशक के अंत में एक और युद्ध का समा बना जिसने पाकिस्तान को दो भागों में बाँट दिया । इसका दूरगामी परिणाम यह हुआ कि आज रांची में सभी दुस्तर कार्य जैसे गाड़ी मरम्मत, भवन निर्माण, फूटपाथ खुदरा बिक्री, ऑटोरिक्शा चालन, मांसाहारी पोषण व् बिक्री जैसे सभी दुस्तर कार्य-व्यवसाय बंगलादेशियों ने सम्हाल रखा है ।
आज रांची दूसरे आम शहरों जैसा हो गया है । अब न पेड़ों की छाँव है और न उनपर चिड़ियाँ चहचहाती हैं, अब तो बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं हैं जो बाहर से एक सन्नाटें में जीवित दिखती हैं; अब आदिवासी युवक-युवतियों का नृत्य डिस्को शैली में 1000 किलोवाट की दिल दहलाने वाली गर्जना की ताल पर होता है । रांची की मासूमियत और शीतलता को मैंने बेबस उधर जाते देखा है जहां से उसका लौटकर आना असंभव है। अब तो रांची जैसे बेशर्मी के साथ शर्माती है अपनी शर्मिन्दिगी पर ! घर से दिखने वाली वह तीन किलोमीटर दूर की सडक कबकी गुम गयी.



Monday, June 2, 2014

आम का भी जवाब नहीं !

आम की चोरी
आम ही एक ऐसा फल है जो शायद सबकी पसंद है. मेरी भी है बेहद. मुझे याद है जब मैं तीन वर्ष का था तबकी बात. दोपहर की नीद में छत पर आम टपकने की आवाज आती थी. बिना सीढ़ी और मुड़ेड की १५ फीट ऊंची छत पर चढ़ जाया करता था. हाँ, पहली बार उतरते समय पैर छत से नीचे गेराज की सतह नहीं खोज पा रही थी.
सात-आठ वर्ष का था तब तो हमलोगों की टोली ही बन गयी थी. कोई भी पता करता किसके घर में आम के पेड़ में आम लगे हैं. उसके बाद योजनाबद्ध तरीके से हमला होता. यह दोपहर के दूसरे पहर में हुआ करता जब सब कोई खा-पीकर अलसाए सोये रहते. कभी कुछ बच्चे सामने के गेट पर रिहायीशिओं को बात में उलझाए रखते और दूसरा दल पिछवाड़े से आम तोड़ निकल जाता. एक बार तो सात फूट ऊंची बाउंड्री वाल पर गड़े शीशे के टुकड़ों पर जूट का बोरा रख कर आम चोरी को अंजाम दिया गया.
आम की बगीचे की रखवाली करते माली भी हमलोगों से झांसा खा जाते. एक बार दोस्तों के उकसाने पर मैं ऐसे ही एक बगीचे के पेड़ पर चढ़ गया. थोड़े लालच में आ गया. थैले पूरी तरह भर गया था फिर भी कुछ और. एक आम नीचे गिर गया. आवाज से माली की नींद टूट गयी. वह लट्ठ लेकर नीचे से मुझे ललकारने लगा. दोस्त तो किनारे लग गए. तभी दिमाग की बत्ती जली. मैं एक-एक आम दोस्तों की तरफ फेंकने लगा. माली आम दोस्तों से पहले चुनने दौड़ा. मुझे उतर कर भागने का अच्छा मौका मिल गया. तब भी काफी आम मेरी झोली में बच गए थे.
सबसे अच्छा ज़माना था जब मेरी उम्र कोई दस-इग्यारह की रही होगी. क्या आप विशवास करेंगे कि आज से तकरीबन 450 वर्ष पहले शेरशाह सूरी के शासन  मे लगाये गए आमों का हमलोग लुत्फ़ उठाया करते थे. जी हाँ ! तब हमलोग ग्रैंडट्रंक रोड की पास रहते थे. सड़क के दोनों तरफ आमों के पेड, इतने कि आसमान तक नहीं दिखता था. साइकिल पर बड़े-बड़े थैले लेकर जाते और आम भरकर लौटते. न कोई रोकने वाला ,न कोई टोकने वाला.
उम्र २१ वर्ष. पोस्ट ग्रेजुएट फिजिक्स की पढाई. सभी साथी क्लास ख़त्म होने के बाद जिस रस्ते से लौटते उसपर डिस्ट्रिक्ट कमिश्नर का बंगलो पड़ता. बाहर झूलते कच्चे आमों पर सिक्यूरिटी की नजर बचाकर पत्थर का निशाना जरूर बनाते. जितने भी आम गिरते हमलोग बाँट कर खाते हुए लौटते. हाँ, मूंगफली वाले से पीसी मिर्च-नमक की पुडिया भी लेते.
उसके बाद पड़ता सिख रेजिमेंट का कैंटोनमेंट का प्रवेश द्वार जहाँ ट्रैफिक कण्ट्रोल करने के लिए एक छह फूटा वर्दीदार सिख जवान खड़ा रहता. हमलोगों को भी बस पकड़ने उसके पास ही खडा होना पड़ता. हम सभी वहा खड़े होकर कच्चे आमों की फांक मिर्चीदार नमक के साथ चटखारा लेकर खाते. पर एक बार उसके बाद फिर कभी नहीं. किस्सा यों हुआ कि ट्रैफिक कण्ट्रोल करते-करते सरदार के मुंह से लार टपकने लगी. उसके बाद हमलोगों ने वह फर्राटेदार पंजाबी गालिया सुनीं जो हम आपको बता नहीं सकते. 
ईश्वर की दया से रिटायरमेंट के बाद विरासत में एक आम का पेड़ भी मिला. कच्चा आम भी मीठा लगता है. इस बार पेड़ में बहुत ज्यादा आम आये. मैंने आस-पड़ोस के बच्चों को हिदायत दी कि आंधी तूफ़ान से बहुत आम गिरेंगे उन्हें ही लेना. तोड़ना मत. पकने पर तोड़ना. पर बचपन में न तो मैंने किसी की बात मानी थी न अब मैं आशा करता हूँ. देखते देखते आम गायब होने लगे. दोपहरी में जब झपकी लेने का समय होता तब चढ़ाई होती. मुझे छत पर बच्चों के दौड़ने भागने की पूरी आवाज नीचे मिलती रहती. बच्चे मुडेर पर सामने दिखने वाले आम को छोड़ कर बाकी जगहों पर सेंध मारते. अंत में उन पच्चीस-तीस आमों पर भी हमला होने लगा. सुबह जब मैं छत पर
प्राणायाम करने पहुंचा तो मुश्किल से पांच-छह आम दिख रहे थे. शायद कुछ दिन और मिलता तो पेड़ में ही पक जाते. मैं धर्म संकट में पड़ गया. लग रहा था कि इस बार एक भी आम खाने को नहीं मिलेगा.मैं दोपहर को उन आमों को चोरी छुपे तोड़ कर ले आया. फर्ज कीजिये, एक ६७ वर्षीय वृद्ध अपने ही पेड़ का आम चोरी कर रहा हो.
पर मैं चोरी क्यों कर रहा था ? इसलिए कि बच्चे टोक न दें कि नाना भी आम पकने के पहले तोड़ रहे हैं; या फिर इसलिए कि अभी भी इन सब तृष्णाओं से राग नहीं मिटा था.अच्छा था कहीं से श्री चार्ल्स डिकेंस नहीं देख रहे थे नहीं तो अपनी “ दी रेनबो” की प्रसिद्ध पंक्ति चटखारा लेकर दुहरा देते “ Child is the Father of the Man"  !



Tuesday, January 7, 2014

इति साम्भरायः नमः !!

सबसे पहला डोसा मैंने 1958 में खाया था. तब मैं कोई 10 वर्ष का रहा होऊंगा. हमलोग चारों दोस्त प्रथम श्रेणी के अफसरों की संतान थे पर 30 पैसे का डोसा एक हफ्ते की तैयारी खोजता था.
पटना शहर में अपनी तरह का पहला खुला (ओपन एयर) रेस्तरां “सोडा फाउंटेन” ठीक गाँधी मैदान के पूरब में उस समय के दो प्रसिद्ध सिनेमा हाल “एलिफिस्टन” और “रिजेंट” के मध्य में गाँधी मैदान के सामने स्थित था. उसकी खासियत, यूनिफॉर्म पहने बेयरा और खूबसूरत फूलों से सजे पार्क के बीचोबीच एक यंत्रचालित सतरंगे पानी का फव्वारा था. मद्रासी डोसा और उसके साथ मिलने वाले अनलिमिटेड साम्भर के बारे में अभी तक सुन ही रखा था और अब तो बेयरे वाले ओपन एयर रेस्तरां का आकर्षण भी जुड चुका था.
हमलोग चार दोस्तों ने 50-50 पैसे इकठ्ठा किये. अपने कपड़े खुद धोकर इस्त्री कर, संज संवर कर तीन बजे से सामने फैले गाँधी मैदान में चक्कर लगाकर रेस्तरां खुलने का इन्तजार करने लगे. रेस्तरां चार बजे खुलता था. चार बजे वह खुला तो पर लोगबाग आने शुरू नहीं हुए. पहले पहुँचना मुनासिब नहीं लगता था. कोई साढ़े चार बजे से लोगों का आना शुरू हुआ. हमलोग शर्माते झिझकते कोने वाली टेबल के इर्दगिर्द आसन जमा बैठे. देखते-देखते १५ मिनटों में बाहर जमायीं १०-१२ टेबल भर गयी. पहले जो हमलोगों को लग रहा था कि सबकी निगाहें हमलोगों को घूर रही हैं उससे तो छुटकारा मिल गया पर बेयरे को भी हमलोग दिखाई नहीं पड़ने लगे. खैर बेयरा आया  और हमलोगों ने मेनू को गंभीरता से पढते हुए मसाला डोसा का आर्डर दिया. उसी दिन हमलोगों को मालूम पड़ा कि परीक्षा देते समय अंतिम का १५ मिनट कितनी जल्दी बीत जाता था और डोसा सर्व होने में लगा १५ मिनट कितनी देर लगाता है.
डोसे के प्लेट की सबसे खास बात उसपर रखी कांटे और छुरिया थीं. पहली बार इनसे साबका पड़ा था. हमलोगों ने चोरी-छुपे दायें देखा, बाए देखा और सामने देखा तब समझ में आया कि काँटा बाईं हाथ में पकड़ा जाता है और छुरी या चम्मच दाहिने में. हमलोगों का ज्यादा समय लगा लोगों से छिपा कर डोसे के टुकड़ों का निवाला बनाकर मुंह में घुसेड़ने या धकेलने में. हमलोगों ने मन बनाया था कि एक-दो बार साम्भर मांगेगें जिसका पैसा नहीं लगेगा. पर कांटे-छुरी के चक्कर में सब भूल गए.
डोसा खाते-खाते बेयरा आया और हमलोगों को आइसक्रीम खाने का मशवरा देने लगा. हमलोगों ने पहले ही देख लिया था कि आइसक्रीम की सबसे सस्ती किस्म २५ पैसे की थी इसलिए हमलोगों ने १५ पैसे वाली चाय का आर्डर दिया. भरपूर गर्मी थी तो क्या चाय हमलोगों ने मन से और काफी देर लगाई पीने में. तबतक हमलोग कुछ बेतकल्लुफ हो गए थे और सतरंगा पानी का फव्वारा भी अच्छा दिखने लगा था.
बेयरा बिल लेकर आया एक रुपये अस्सी पैसे का. हममें से जिसने सबसे अच्छा कपडा पहन रख रखा था और पोलिश किया हुआ जूता भी, उसने बड़ी शान से 2 रुपये का नोट निकाल कर ट्रे पर रख दिया. साथ ही हमसब एक साथ तपाक से खड़े होकर निकल पड़े जिससे कि बेयरा यह समझ जाए कि बाकी का 20 पैसा उसकी टिप थी. बेयरा समझदारी की उम्र में पंहुंचा हुआ था उसने जमकर सैल्यूट मारी जिसे शायद हमलोग आज भी पांच सितारा होटलों के डोरमैन के सैल्यूट से कहीं ज्यादा अहमियत देते रहेंगे.
मुफ्त के साम्भर का मजा महमूद ने एक फिल्म में दिया था जब उसकी जेब में सिर्फ 50 पैसे का सिक्का था और वह दो दिनों से भूखा था. उसने चार कटोरें साम्भर पी थी. और मुझे मुफ्त के साम्भर से सामना सिकंदराबाद स्टेशन के सामने वाले होटल में हुआ था. बड़े जोर की भूख लगी थी और पूछने पर लोगों ने उसी होटल में जाने की मंत्रणा दी थी.
पहले तो एक बड़े थाल में चार-पांच लोगों के भरपेट खाने लायक चावल के साथ साम्भर, सब्जियां,पापड और दही मिला. मैंने अपने खाने लायक चावल छोड़कर बाकी निकलवा दिया. खाने के बीच में बेयरे ने टेबल पर एक पांच लीटर की साम्भर से भरी बाल्टी लाकर रख दी. उस दिन के बाद से पांच-छ वर्षों तक साम्भर के तरफ देखने की भी इच्छा नहीं होती थी.