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Monday, July 16, 2018

हम भी कभी बच्चे थे !


पहले के घरों में एक आँगन होता था, एक बरामदा होता था और एक गलियारा होता था. दोपहर में क्रिकेट खेलने के लिए गलियारा सबसे अच्छा होता था; बस स्ट्रेट ड्राइव की गुंजाईश. हमारे घर में गलियारे के शोर्ट कवर में जज अंकल का लिविंग रूम था. टेनिस की गेंद उनकी दीवार या खिड़की छूती भर थी और हंगामा शुरू. ऐसा दिन महीने में एक-दो बार ही आता था की शोर्ट कवर पर हंगामाँ गैरहाजिर हो.
60 वर्ष बाद घर के बच्चों को मेरे घर का अगवाडा ही सबसे रास आया दोपहर के क्रिकेट के लिए. मेरे घर की लम्बी-चौड़ी खिड़की बल्ले के स्विंग से 3 फीट दूर है. उसपर यह मेरे आराम का समय होता है. दोपहर को स्कूल से लौट कर बच्चे क्रिकेट के साथ-साथ स्कूल की आपबीती भी गपियाते रहते हैं. खेल तभी ख़त्म होता है जब बच्चे अपने जन्मसिद्ध अधिकार का उपयोग करने लगते हैं; यानी झगडा !
शुरू में एक-दो बार जब बाल खिड़की से टकराई तो मैंने दांत तोड़ लेने की धमकी भी दे डाली. उसकी बाद कुछ दिन तक दारुण सन्नाटा. दोपहर को नींद की झपकी आनी बंद. मालूम पडा मेरे डर से कम बल्कि गेंद फट जाने से खेल बंद है. मैं शाम को बाजार जाकर उनके लिय गेंद ले आया.
अब उनकी बातूनी नोक-जोख से भरपूर क्रिकेट की लोरी क्या गजब की झपकी ला देती है. उसके सामने 2-3 सौ के खिड़की के शीशे की क्या हैसीयत !

Thursday, February 15, 2018

जोन्हा फाल्स : कल, आज और कल !!

कल (1960-65)

1960 के दशक में जोन्हा फाल्स अपनी अछूती सुन्दरता के चरम पर था. रांची-मूरी रेल ट्रैक पर जोन्हा के लिए मात्र बर्धमान पैसेंजर , गौतमधारा स्टेशन 10 बजे सुबह पहुंचती थी और शाम पांच बजे पुनः रांची लौटने को आ पहुचती थी. इसी से सटे लगभग कच्ची रांची-पुरुलिया रोड गौतमधारा रेल  गुमटी को लांघती थी. दोनों हालात में इसी गुमटी पर पहुँच कर 5 किलीमीटर जंगल के ट्रैक पर चलकर जोन्हा फाल्स पहुँचना होता था . पूरे जाड़े लोग इस प्राकृतिक झरने पर पिकनिक करने आते थे. धधकते लाल रंग के टेसू के फूलों से
केंद
सुसज्जित जंगल, अनसुने-अनदेखे पक्षियों का कलरव और चोरी-छिपे झांकती सूरज की किरणे एक दूसरी दुनिया ही सुसज्जित कर देती.  इस मौसम में झाड़ों पर नीले मटर के दाने के बराबर करौंदे की भांति मीठे फल गुच्छो में मिलते थे. शायद उसका नाम कद्वन था .जंगली छोटे बैर से जंगल भरा होता था. गौतम धारा के जंगल में कम बीजों वाला मीठे अमरुद के पेड़ भी अनगिनत थे. एक और फल बहुतायत में मिलता था, पीला, गोल्फ के बॉल जितना , मीठे गूदों के बीच कुछ बीज लिए. उसे लोग केंद कहते थे.   से मछलियों का शिकार करते दीखते रहते थे .अगर कोई खाली हाथ भी आया हो तो उसे पेट भरने को बहुत कुछ मिल जाता था. 5 किलोमीटर की पैदल यात्रा से थकने के बजाय लोग और ज्यादा प्रफुल्लित और वेगवान हो जाया करते थे. ये वन हाथियों का रिहाईशी इलाका था पर पिकनिक के  मौसम में, भीड़ और कोलाहल के चलते हाथी कहीं दूर दूसरी जगह निकल जाया करते थे . बंदरों का झुण्ड पेड़ों पर मस्ती करता दिखता था.
झरने से बहता पानी जगह-जगह पार करना होता था. आदिवासी तीर-धनुष से या फिर नुकीले भाले
जल प्रपात के पास पहुँच कर अधिकाँश सुधिजन सम्मोहित और ठगे-ठगे झरने और उसके चारो ओर फ़ैली प्राकृतिक छटा  को निहारते रह जाते थे. तब सिकदारी जलविद्युत नहीं बना था. इस कारण झरना शरद ऋतू में अपने यौवन पर रहता था. पत्थर काटकर या रखकर 150 के लगभग सीढियां हमलोग आनन्-फानन में तय कर लेते थे. 150 फीट के ऊंचाई से 3-4 झरनों से नीचे पड़े समतल चट्टानों पर पानी गिरता था. इन चट्टानों तक पहुँचने के रास्ते में रेतीली जमीन और उसके बाद जल की सतह एक इंच से बढ़ता हुआ 100 फीट दूर चट्टान तक 2 फीट गहरा हो जाता था. पानी इतना स्वच्छ कि पूरे जमाव के नीचे रेत और पत्थर दीखते थे: एकदम मिनरल वाटर. नहाने, खिलवाड़ और शरारत करने के लिए यह स्थल एकदम दोस्ताना थी.
जोन्हा फाल्स शरद ऋतू में सैकड़ों सैलानियों से भर जाता था. ये रांची शहर के अलावा जमशेदपुर, पुरुलिया और कोलकाता तक से आते थे.  ज्यादा प्रतिशत बंगाली और आदिवासी क्रिस्चियन का होता था. आदिवासी तो पूरे रास्ते गाते, मांदर बजाते और नाचते दूरी तय करते थे . वे पूरे समय थिरकते दीखते थे.
हम 4 साथी 1961-63 में इंटरमीडिएट कर रहे थे . उम्र और उत्साह एकदम सही था नए वर्ष में पिकनिक मनाने का. इन 3 वर्षों में जोन्हा फाल्स जाकर पिकनिक करना सबसे ज्यादा सहज था. बाकी स्थलों में जाने के लिए यातायात की व्यवस्था  आवश्यक थी. जोन्हा के लिए बर्धमान पैसेंजर बिलकुल माकूल थी. 1 जनवरी को तो शायद ही कोई टिकट खरीदता हो. रास्ते भर चेन खीचकर, ट्रेन रोककर सैलानी चढ़ते-उतरते थे. 45 मिनट का सफ़र 2 घंटे में तय होता था. ट्रेन में बैठने या फिर खड़े रहने की सबसे लोकप्रिय जगह फूट-बोर्ड होती थी. हमलोग घर से एक घंटे पहले ही स्टेशन पहुँच कर फूटबोर्ड पर कब्जा करते थे. बारी-बारी से दो जन बैठते थे और दो जन पीछे खड़े रहते थे. ट्रांजिस्टर पर जो भी गाना आता हो उसको गाते-चिल्लाते सफर तय करते थे. तब”सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं” पहली पसंद हुआ करती थी.
हमलोग नव वर्ष के पिकनिक की तैयारी महीने भर पहले शुरू कर देते थे. चारो जन मिलकर 60 रुपये के लगभग इकठ्ठा करते थे. सभी शान्तिनिकेतन झोले में पिकनिक का सामान बाट लेते थे. सामान में काफी, कंडेंस्ड मिल्क, चीनी, बिस्कुट, ब्रेड, जैम, मिक्सचर,बॉयल्ड अंडे और मिठाई होती थी. मनोरंजन के लिए ताश जरूरी था. एक क्लिक-3 कैमरा लाता था तो दूसरा ट्रांजिस्टर. तीसरे के जिम्मे फिल्म का रोल होता था तो चौथा चाय-काफी बनाने का बर्तन और गिलास . सन-ग्लासेज का जोगाड़ निहायत जरूरी हुआ करता था.
जगह चुनने को कैप्चर करना कहते थे. चादर या तौलिया बिछाई जाती थी. बिखरी पड़ी सूखी टहनियों को जलाकर काफी बनायी जाती थी. घुटने तक पैर पानी में डूबाकर काफी की चुसकिया लिया करते थे. एकबार तो सिगरेट की आजमाईश भी हुई थी. उसके बाद चड्ढी पहने पानी में उतर कर झरने के नीचे नहाते थे. घुटने भर पानी में भरपूर अठखेली करते थे. कैमरे से बारह स्नेप बड़ी सावधानी से लेते थे जिससे कि चारों के साथ न्याय हो सके. जितने स्नेप सही डेवेलप होते उनकों पसंद के अनुसार आपस में बाँट लेते. खाने का सामान आधे से ज्यादा बच जाता जिसे निहारते गाँव के बच्चों में बाँट देते. ऐसा सब सैलानी करते. जो पहले से आ रहे होते , वे नियतन ज्यादा खाने की सामग्री लाते. सामिष चूल्हों के पास कुत्तों का जमावड़ा हो जाता और दूर ऊपर 1-2 सियार भी ताकते रहते.
हमलोगों में इस बात पर अनबन हो जाती की ताश खेला जाये, प्राकृतिक छटा निहारी जाये, सैलानियों के सांस्कृतिक कार्यक्रम का लुत्फ़ लिया जाए या फिर झपकी ले ली जाये. हमलोग सभी क्रियाकलापों के साथ न्याय करने का प्रयत्न करते. तीर और नुकीले भाले से मछली का शिकार करते देखना सम्मोहित कर लेता. आदिवासी घंटो मांदर की थाप पर थिरकते रहते.  अगर कोई बंगाली ग्रुप भाव-विभोर हो गया तो रविन्द्र संगीत, बाउल गीत और जात्रा का नैसर्गिक आनन्द मिलता. अंत में जाने से पहले पुनः चाय या काफी बनती. इस समय कोई न कोई बाबू-मोशाय काफी का एक चुम्मा लेने आ ही जाते. गौतमधारा स्टेशन समय से काफी पहले आकर ट्रेन का इन्तजार करना होता. लौटते वक्त फूटबोर्ड खाली मिलता. घर पहुँचते-पहुंचते रात हो जाती.

आज (2018)

आज लगभग 50 वर्ष बाद मैं जोन्हा फाल जा रहा था. इतने वर्ष न जा पाने के कई कारण थे. रेलवे गुमटी के बाद 5 किलोमीटर का रास्ता पगडंडियों वाला ही था. अब हिच-हाईक करने की उम्र नहीं रह गयी थी. पूरा इलाका नक्सल प्रभावित माना जाता था. तब दोस्तों के साथ गया था - इस बार पत्नी और बेटे के साथ. इधर दो वर्षों में बहुत कुछ विकास हो गया है. सड़कें बहुत अच्छी बन गयी हैं. झरने तक पहुँचने के लिए टाइल्स की सीढियां बन गयी हैं. अब झरने के ऊपर या नीचे जाना बहुत सहज हो गया है. थोड़ी-थोड़ी दूर पर छतरी वाले प्लेटफार्म बना दिए गए हैं जहां 20 से 50 तक का ग्रुप बैठने और पिकनिक का आनंद ले सकता है. सबसे बड़ी बात कि गाँव के लगभग सभी परिवारों के लिए रोजगार की अच्छी गुंजाईश हो गयी है. भोजन , स्नैक्स और कुछ नहीं तो जंगल में होने वाले फल की खूब बिक्री होती है. झरने की तरफ जाने वाले तीनों रस्ते पर अच्छा-ख़ासा टोल लिया जाता है. जोन्हा पहुँचने में अब 5 की बजाय मात्र डेढ़ घंटे लगते हैं. पूरा इलाका प्लास्टिक मुक्त घोषित किया गया है साथ ही नशा करना वर्जित किया गया है. अभी और भी विकसित होने की बहुत गुंजाईश है. सरकारी डाक बँगला तो है साथ ही पर्यटकों के लिए भी ठहरने और विश्राम की संभावना बनती है. रोपवे आमदनी का एक अच्छा जरिया बन सकता है.
तीर और भाले से मछली का शिकार अब देखने को नहीं मिलता है. मात्र दो-तीन पेड़ टेसू के लाल सुर्ख फूलों से लदे दिखे . पेड़ पर बैर, अमरुद, पियार और कन्द्वन नहीं दीखते हैं वे सब अब बिकाऊ हो गए हैं. मजेदार बात ये है कि अब कोई भी पैदल रास्ता नापते नहीं दिखता है. चार्टर्ड बस, मोटर गाड़ी और बाईक से छुट्टी के दिन पूरा रास्ता गुलज़ार रहता है. एक्का-दुक्का गाँव के लोग पैदल चलते दीखते हैं. अब संवेदनशील जगहों पर बाकायदा पुलिस की चौकसी रहती है.

तब और अब में एक ही समानता दिखी. झरने को देखकर हमलोग पुनः भौचक रह गए. कारण बिलकुल विपरीत था. पानी की एक-दो पतली लकीरे भर ही दिख रही थी. खैरियत इस बात की थी कि 95% आबादी युवा सैलानियों की थी जैसा कि पिकनिक स्पॉट की खासियत है . इन्हें कहाँ मालूम था कि सिकदरी पॉवर प्लांट बनने  के पहले यह जल प्रपात कैसा विशाल हुआ करता था. इसलिए सभी जगह काफी उत्साह और चहल पहल दिखता था. बहुतों ने लाउड स्पीकर-एम्पलीफायर पर संगीत का शोर मचा रक्खा था. एक-दो जगह सैलानी नाच भी रहे थे. आदिवासी समूह भी थे . वे भी आदिवासी नृत्य कर रहे थे. पर मांदर की थाप पर नहीं , ऑर्केस्ट्रा धुनों पर . आदिवासी युवतियां सदी नहीं बल्कि लड़कों की तरह जींस पहने थीं. आदिवासी सैलानी बहुत ज्यादा मेकअप में दिखे. पाउडर, लिपस्टिक, रूज़ , हेयर स्टाइल और पहनावे से लड़के-लडकी में फर्क करना मुश्किल था. आज के युवा सिगरेट सभ्यता से बहुत आगे बढ़ चुके थे.
एक और समानता दिखी. पहले पेड़ों पर इतने फल लदे रहते थे कि जंगल में भटकने पर भूखा नहीं रहना पड़ता. अब भी अगर कोई जाए तो वही सबकुछ खरीद कर  पेट भर सकता था. साथ में तरह-तरह के स्नैक के पाउच और भेल-पूरी जैसी झाल-मूढ़ी भी चाय के साथ मिल रही थी.
हमलोग जिस सीढ़ी से नीचे उतरे उसे छोड़ दूसरी सीढ़ी से ऊपर चढ़े. एक सुखद आश्चर्य भी हुआ. गाँव के बच्चे बची हुई भोजन सामग्री की टोह में इंतज़ार करते नहीं दिखे - जंगली बैर बेचते दिखे. आने-जाने वालों पर मासूम नजरें. हमलोगों ने 10-12 दोने बैर खरीदे. जो बैर दस रुपये दोना था वह लौटते समय पांच का हो गया था. तात्पर्य कि इन्हें भी बिक्री करने का मर्म समझ में आ गया था . हमलोग जोन्हा फाल होकर पांच घंटे में चार बजे तक घर लौट आये.

कल ( 2025)

आज लोग बुलेट ट्रेन और हाइपरलूप की योजना के खिलाफ हाय-तोबा मचा रहे हैं वैसे ही जैसे कंप्यूटर के आगमन पर हुआ था. काश वे समझ पाते कि ये विकास विकसित होते देश की मजबूरी है. ठीक वैसे ही जैसे एक बार भगवान् जगन्नाथ का रथ चल पडा तो रोकना मुश्किल हो जाता है. ये रथ सरकार नहीं खिचती है बल्कि आम नागरिक के संगठित सहयोग और इच्छा शक्ति से होता है. आज का आम नागरिक अब कहाँ STD बूथ पर लाइन में खडा दिखता है ; सभी के पास मोबाइल फोने है. टाइपराइटर की जगह कंप्यूटर ने ले ली है. पिज़्ज़ा और बर्गर अब एक मजदूर भी खाता है. बाइसिकल भी अब कम ही दिखती है.
2025 का जोन्हा फाल रोप वे, लिफ्ट और मॉल से सुसज्जित होगा. पहुचने के लिए रेल और रोड के अतिरिक्त ओवरहेड रेल प्रणाली होगी. हेलीपैड की भी व्यवस्था हो तो अचरज नहीं.शायद तबतक उबेर और ओला फ्लाइंग कैब भी ले आयें. निजी गाडियों पर तो टोल लगेगा ही सैलानियों को भी पास खरीदना होगा.
झरने को भरपूर करने के लिए प्राइम टाइम पर सिक्दरी जलाशय से पानी छोड़ा जाएगा. तरह-तरह के चाट और भोजन के स्टाल दिखेंगे. झरने से गिरते पानी को रोककर जगह–जगह तालाब बनाए जायेंगे जिसपर बोटिंग और तीर-भाले से मछली भेदने का खेल पैसे देकर खेलने को मिलेगा. एडवेंचर खेल जैसे बंगी जम्पिंग का आनंद भी उठाया जा सकेगा. ड्रोन से फोटोग्राफी आम बात हो जायेगी. 
शायद पुनः मांदर की थाप पर अपने बुनियादी लिबास में  थिरकते आदिवासी भी दिखने लगे. सांस्कृतिक विरासत का रीप्ले एक मुनाफे का व्यापार होगा.
जोन्हा के आसपास कुछ ही किलोमीटर दूर और भी मशहूर जल प्रपात हैं- हुन्डरु, दशम, सीता वगैरह. यातायात की इतनी बेहतर सुविधा के चलते पर्यटक एक झरने पर सुबह का नाश्ता, दूसरे पर दिन का भोजन और तीसरे पर शाम की चाय का आनंद लेते हुए उजाला रहते हुए घर वापिस आ सकेंगे. 


Monday, January 15, 2018

भोला का लोटा !

अपने बचपन के मित्र भोला के निवास पहुचने पर सब कुछ बदला-बदला नजर आ रहा था. रंग-रोगन और रेनोवेशन ने फ्लैट को नया रूप दे दिया था. पलंग के नीचे अखबारों के बण्डल की भरमार की जगह एक नए बॉक्स बेड ने ले ली थी. टीवी एक आकर्षक टेबल पर विराजमान था. खिड़की-दरवाजों पर मेल खाता पर्दा लगा था. सामने की दीवार पर मोडुलर आलमारी और कैबिनेट पर किताबे और कलाकीर्तियाँ सुशोभित थी . सबकुछ नया-नया था सिवाय एक एंटीक लोटे के .

भोला नाम माता-पिता का दिया हुआ था. अब एक बच्चा बैगन इसलिए नहीं खायेगा कि वह बैगन की तरह काला हो जाएगा तो यह तो होना ही था. स्कूल में उसके साथी भी उसे भोला ही कहते थे कारण कि वह सिनेमा हॉल के बाहर चिपके पोस्टर और फोटो गैलरी को देखकर शेखी बघारता था कि उसने पूरी फिल्म देख ली है. हम कोलेजिया भी उसे इसी नाम से पसंद करते थे . खाने की चीज़ों का वह बराबर बटवारा करता था और सबसे छोटा हिस्सा खुद लेता था. अब आजतक हम सभी उसे भोला ही क्यों कहते हैं यह शायद बताने की आवश्यकता नहीं है. बहुत हाल-हाल तक वह पलंग के नीचे क्विंटल भर पुराने अखबार ठीक तौल कर 2 किलो का बण्डल बनाकर बरसों सहेज कर रखता कि शायद जैसे सभी चीजों का मूल्य लोग्रथिमिक गति से बढ़ रहा है अखबार भी 5 रुपये की जगह 50 का बिकने लग जाए. हमलोग भोला की जगह कब उसे उसके सरनेम से बुलाने लगे याद नहीं आता.

भोला के पास हमलोग इसलिये भी खीचते चले जाते हैं कि उसके पास पुराने संस्मरणों का भोलापेडिया है और उसे एक लेख या कहानी की तरह संचारित कर प्रोफेसरी आक्ख्यान की कला में समेटने की दक्षता है.  चुकी प्रोफेसर के पद से अवकाश-प्राप्त है अतः एक ही एपिसोड वह क्तिनी बार सुना चुकता है इसका उसे अहसास नहीं. कोई रोचक एपिसोड चाहे कितनी बार सुने, समय का सेकंड तक सटीक रहता. इस एंटीक लोटे को भी उसने एक कहानी का नायक बना दिया.


भोला के चाचा कॉलेज की पढाई करने एक जोड़े कपडे और इसी लोटे के साथ रहने आये थे. 5 वर्ष बाद जब पढ़ाई पूरी कर नौकरी में योगदान देने दूसरे शहर जाने लगे तब यह लोटा छोड़ गए या छूट गया. इस लोटे में बहुतेरी अच्छी बाते थीं. यह साधारण लोटों से बड़ा था. इसका पेंदा चिपटा था. लोटे का ऊपरी किनारा ज्यादा फैलाव लिए था जिससे पकड़ने में आसानी होती थी. सबसे खास बात यह थी कि मिटटी या साबुन से रगड़ कर धोने के बाद एकदम चमचमाने लगता था. लोटा कांसे की ढलाई से बना हुआ था. समय के साथ लोटा भी घर के बर्तनों में घुल-मिल गया. भोला की माँ कब उसे अपने निजी व्यवहार में लाने लगी यह किसी को याद नहीं. पूजा और गंगा स्नानं के वक्त यह लोटा माँ के साथ रहता .

लोटे से भोला का सीधा साक्षात्कार मकर सक्रांति पर हुआ. कडाकेदार सर्दी की सूर्योदय बेला में भोला माँ के साथ गंगा किनारे स्नान-दान को पहुंचा. पूजा-पाठ के बाद माँ को चाय पीने की इच्छा हुई. किनारे से ऊपर चाय की गुमटी जाने को भोला तत्पर हुआ तभी माँ ने कहा कि वह बाजार की चाय नहीं पीयेगी. तय हुआ कि कुछ लकड़ी लाकर, आग जलाकर, लोटे में चाय बनायी जाए. माँ इसके लिए चाय पत्ती और चीनी लेकर आयी थी. गाय कुछ दूर में बंधी दिख रही थी. ईंट जोड़कर चूल्हा बना. पेड़ की सूखी टहनियां और पत्तें चुने गए. माचिस तो अगबत्ती-दिया जलाने के लिए लाई ही गयी थी. सब तैयारी होते-होते एक घंटा लगा. जलते-बुझते चाय बनाने में आधा घंटा लग गया. भोला चाय पीते नहीं थे. बिना छाने माँ ने लोटे से ही चाय पी. धो-मांज कर लोटे में गंगा जल भर लिया.

कुछ वर्षों बाद जब भोला कॉलेज के NCC सिग्नल्स के कैंप के लिए पंद्रह दिनों के लिए शहर से 50 किलोमीटर दूर जाने लगा तो बहुत मिन्नत के बाद यह लोटा माँ ने स्नान-ध्यान के लिए भोला को दिया. कैंप में सभी को प्लेट और मग दिए गए थे तब भी यह लोटा हिट हो गया.

उस उम्र में भोला डील-डौल में इकॉनमी साइज़ का था और हिम्मत भी ब्राह्मण ब्रांड थी. घर से बाहर समय बिताने का अवसर पहली बार मिल रहा था. कैंप में दबंगों की दादागिरी का भय भी था. अजीब स्थिति थी रोमांच के साथ दहशत की. ओरिजिन पॉइंट जहां बस से प्रस्थान के लिए इकट्ठा होना था वहीँ भोला ने अपने कद्दावर सहपाठी अजय भाई के साथ मेल-जोल बढ़ा लिया. बस में भोला ने अपने साथ खिड़की वाली सीट अजय भाई को देकर लाजवाब कर दिया. दो घंटे के सफ़र में क्या-कुछ हुआ होगा भोला ने नहीं बताया. कैंप सरकारी स्कूल में ठहरा. दो बड़े हॉल में 50 लड़कों को जगह दी गयी. अजय भाई ने कोने पर बिस्तर लगाया जबकि पाठक उससे दो बिस्तर दूर.

अभी 5 मिनट भी समय नहीं बीता था कि अजय भाई ने जोरदार आवाज में हांक लगाई – “मित्रों ! हम कपडा बदल रहे हैं पर न तो हमने चड्ढी पहनी हुई है और मेरा तौलिया भी तंग है इसलिए हम सभी को खबरदार कर देते हैं. “ अब कौन ताजमहल देखना था सभी ने आँखें फेर लीं और भोला ने भी. भोला उस रात बहुत आश्वस्त होकर सोया. सुबह सबरे झकझोरे जाने पर नींद खुली. देखा अजय भाई सर पर खड़े थे और वही पूजा वाला लोटा मांग रहे थे. कहने लगे, दीर्घशंका के लिए मैदान जाना हैं तुम्हार लोटा बड़ा हैं धोखा नहीं देगा. कोई भी सफाई बहाना न लगे और नयी दोस्ती में दरार न पड़ जाए इसलिए बहुत मन मसोस कर देना पड़ा.

उसके बाद तो हर सुबह जितने अच्छे-खासे, मोटे-ताजे friend-or-foe थे सभी की कतार लग जाती. कोई एक-डेढ़ घंटे बाद भोला जी कुँए के पास जाकर उस लोटे को मिटटी से रगड़-रगड़ कर धोते. भोला जी का लोटा रातो-रात नहीं सुबहो-सुबह चरम  प्रसिद्धि पा गया था . प्रसिद्धि तो सुनील को भी मिली थी और अरुण को भी. ये दोनों रात की गोष्ठी में उस समय का लोकप्रिय गाना बखूबी गाते थे. सुनील “ टूटे हुए ख्वाबों ने हमको ये सिखाया है ....’ और अरुण” बेकरार करके हमें यू न जाईये .....” बहुत अच्छा गाते थे. उसके बाद नींद न आने तक सभी जवान अरुण और अनिल से फरमाईशी सुनते .

आज ५५ वर्षों बाद, न जाने इस भोले लोटे को कितना कुछ देखने-सुनने और सहने के बाद यह प्रतिष्ठित जगह मिली होगी हम जैसों को बैठे-ठाले जोखने के लिए.

अब न तो घाट पर नहाने का संस्कार है और न सफ़र का साथी बनाने की आवश्यकता. वर्ष में एक-आध बार मंदिर तक जल चढाने की यात्रा हो जाती है वह भी तबतक जबतक इस पीढ़ी की जिद बाकी है. .

भोला के घर से लौटते समय उस एंटीक लोटे के भविष्य के बारे में पूछने की इच्छा होते हुए भी चुप रहा. भोला भी कडवा सत्य ही बोलता और goodbye, sad bye हो जाती.

Friday, August 25, 2017

विदेशी तडका - 6 :वे रूसी (Those Russians) !

1980 का दशक मेरे कार्यकाल का सबसे रोमांचक दौर था । इस समय HEC ने रेलवे के लिए ni-hard कास्टिंग्स और एस०जी० आयरन कास्टिंग भारत में पहली बार विकसित की । कास्ट आयरन, स्टील रोल और फोर्जे रोल में तो पहले से महारता हासिल थी । इसी समय प्राइवेट सेक्टर के भी दिग्गज इन क्षेत्रों में जोर-आजमाईश कर रहे थे पर गंदे तरीके से । वे तरह-तरह का लालच देकर हमारे होनहार इंजिनियर को ले जाते थे । इससे एक तो उन्हें विकसित प्रणाली मिल जाती थी और दूसरे उसे कार्यान्वित करने वाला इंजिनियर भी । हमारा पब्लिक सेक्टर कारखाना बेबस रह जाता था । फैक्ट्री बंद होने के कगार पर आ गयी । उसी दौरान रूस(USSR) को अच्छी गुणवता वाले कास्ट आयरन, स्टील रोल और फोर्जे रोल की सख्त आवश्यकता आन पड़ी । रूस को शायद दुःख भी होता होगा उनके कोलैबोरेशन से बनाए कारखाने का यह हश्र देखकर । रूस के साथ एक बड़े एम०ओ०यू० पर हस्ताक्षर हुए जिसके तहत रूस के विशेषज्ञों की देख-रेख में समय पर गुणवता वाले रोल्स बनाये गए । हमारे कारखाने को कुछ अवधि के लिये काम मिल गया और शायद रूस को सस्ते में सामान ।
इस बार रूस से 10 विशेषज्ञ इस काम को अंजाम देने आये । मेरी भूमिका एस०जी०आयरन कास्टिंग्स और रोल में तकनीकी कोआर्डिनेशन की थी । मिस्टर सोरोकिन 72 वर्ष के 140 किलो के भारी-भरकम लम्बे कद के हसमुख विशेषज्ञ थे जिनके साथ मुझे 1 वर्ष लगातार् काम करना था । विचार-विमर्श में कोई परेशानी न आये इसके लिए दो इन्टरप्रेटर भी आये थे । एक मैडम एलिज़ाबेथ थी(उम्र 55) जिनका नामकरण एलिज़ाबेथ टेलर जैसा रूप-धारण और रख-रखाव के लिए हुआ होगा । दूसरे मिस्टर इवानोव(उम्र 50) थे । ये हॉलीवुड के स्पाई थ्रिलर के नायक जैसा मिजाज रखते थे । मैडम डायरेक्टर मीटिंग में हिस्सा लेती थी जब की इवानोव कार्यक्षेत्र में दुभाषिया की भूमिका निभाते थे ।
सोरोकिन अपनी ताकत से हमलोगों को शर्मिन्दा कर देते थे । भारी ट्राली को धकेलना, पिघले लोहे की 10T भारी बाल्टी को अकेले रोल कर देना उनके लिए मुश्किल न था । एक इंच मोटे लोहे के टेस्ट पीस को हथोड़े से दो टूक कर देना उनके लिए बहुत आसान था । कार्य अवधि में इनलोगों में तनिक भी आलस या बेपरवाही नहीं झलकती थी । हमलोगों ने समय अवधि के अंदर आर्डर पूरा किया ।
सोरोकिन की विदाई का समय भी आ गया । उन्होंने मुझे और मेरे तकनीकी सहयोगी प्रदीप गुहा ठाकुरता को पत्नी सहित अपने हॉस्टल सुइट में डिनर पर आमंत्रित किया । डिनर टेबल पर एलिज़ाबेथ और इवानोव भी थे । हरी मिर्च से बने सुर्ख हरे रंग के वोडका से शुरुआत की गयी । उस समय तक मैंने शराब को कभी हाथ नहीं लगाया था  । उस दिन भी नहीं जिसके चलते मेरी बहुत हंसाई हुई पर किसी ने भी जोर जबरदस्ती नहीं की । खाने पर ताज़े ब्रेड के साथ बीफ, पोर्क, सार्डीन फिश और किसी मवेशी का दो इच लम्बे जीभ का रोस्ट था । हमलोगों से कुछ भी नहीं खाया गया सिवाय ब्रेड के और अंत में डेजर्ट और केक । लौटते समय सोरोकिन की पत्नी ने मुझे एल्बम और श्रीमती को मेकअप पैक दिया ।

अगले वीक-एंड हमलोगों ने सोरोकिन और इवानोव को ठाकुरता के घर पर फेयरवेल डिनर पर आमंत्रित किया । ठाकुरता का फ्लैट हॉस्टल कैंपस से सटा हुआ था । खाने पर हमलोगों ने देशी तरीके से बना मटन, फिश और बिरयानी खिलाई । साथ में व्हिस्की भी थी जो उन दोनों ने पी और ठाकुरता ने शिष्टाचार के नाते जितनी पी उसी से उसको नशा हो गया । सोरोकिन पीते जाते थे और साथ में मुझे खबरदार करते जाते थे की चुकि मैं पूरे होशो-हवास में हू तो मुझे ही उन्हें एक  फरलोंग दूर घर तक पहुचाना होगा ।  विदायी के वक्त हमलोगों ने सोरोकिन और इवानोव को हवाना सिगार और रजनी गंधा पान मसाला भेंट किया । सोरोकिन की श्रीमती को कांच की चूड़ियों का सेट और माथे के टीके का पैकेट भेंट किया गया । उनकी श्रीमती की ख़ुशी देखते बनती थी । उन्होंने मेरी श्रीमती की सहायता से उसी वक्त चूड़ियाँ पहनी और सुर्ख लाल बंगाली टीका अपने ललाट पर लगवाया । सच में वह बहुत सुन्दर लग रही थीं । इवानोव ने उनके काफी सारे फोटो लिए । सोरोकिन को पूरे रास्ते दोनों तरफ से कन्धों का सहारा देकर घर तक पहुंचाया गया ।

Tuesday, August 22, 2017

विदेशी तडका- 5 - फ्रांस के मार्टिन ( F Martin from France) !

जुलाई, 1972 की एक सुबह, फाउंड्री फोर्ज प्लांट की लेबोरेटरी के पार्किंग स्पेस में एक विदेशी कार आकर लगी। कार कुछ-कुछ आज के टोयटा जैसी थी। कार से एक विदेशी नवयुवक निकला और रास्ता पूछकर सीधा चीफ के चैम्बर में चला गया। 10 मिनट बाद मुझे बुलाया गया। चीफ ने उस युवक से मेरा परिचय कराया। वह युवक फ्रांस से विशेषज्ञ की हैसियत से नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ फाउंड्री फोर्ज टेक्नोलॉजी में अपना योगदान दे रहा था। उसे वहां के वैक्यूम स्पेक्ट्रोग्राफ में कुछ परेशानी हो रही थी। समाधान और विशेष जानकारी के लिए उसे मेरे पास भेजा गया था।  
मार्टिन ने मुझसे बहुत कुछ सीखा। परन्तु मैंने उससे जो कुछ भी सीखा वह जीवन पर्यंत मुझे मदद करने वाला था।
हमारी लेबोरेटरी सुबह आठ बजे खुलती थी। मार्टिन के तीन महीने के प्रवास में ऐसा कभी नहीं हुआ की वह आठ बजे से पहले न आ गया हो। एकदम साफ़ सुथरी पोशाक और उसपर वाइट एप्रन। वह सिगरेट पीता था पर अपने कार में बैठकर। मैंने उसे स्पेक्ट्रोग्राफ रूम एक चाभी दे रखी थी  एक सुबह जब मैं आया तो देखता हूँ की वह एक स्टूल पर खडा होकर रोशनदान की खिड़की साफ़ कर रहा था।
मेरी नजर रोशनदान पर पड़ी। लेबोरेटरी के 10 वर्ष की आयु में कभी भी रोशनदान की सफाई नहीं हुई थी। गन्दगी गोंद जैसे चिपकी हुई थी। कुल 6 रोशनदान थे। हमलोगों ने अथक प्रयास कर एक-एक शीशा चमका दिया। उसके बाद दीवाल पर नजर ठहरी। जमीन से पांच फूट ऊपर तक उसे हलके हरे आयल पेंट से शुरू में पेंट किया गया होगा जो अब काई के रंग का दिख रहा था। । हमलोगों ने पैटर्न शॉप के स्टोर से पेंट लाकर उसे भी बिलकुल नया पेंट कर दिया। बहुत लोग ,खासकर सीनियर्स मना करने आये पर मार्टिन यही कहता था अपने घर की सफाई में शर्म कैसी, आलस क्यों और कोई दूसरा क्यों ।
आसपास के विभाग से सबकी नजर इस नज़ारे पर पड़ रही थी। एक फ्रेंच युवक एक्सपर्ट सफाई और पेंटिंग में लगा हुआ था। जो शायद इतना अमीर था की अपने कार तक फ्रांस से रांची तक ले आया था।
भारतवर्ष के कारखानों में हर वर्ष 17 सितम्बर को विश्वकर्मा पूजा मनाई जाती है। इसके लिए 15 दिनों से जोरदार सफाई और गृह व्यवस्था का कार्यक्रम चलता है। इस वर्ष। सभी कोई मार्क ट्वेन के टॉम सॉयर और सफेदी करते उनके दोस्त जैसे ढले दिख रहे थे । खासकर मेरी लेबोरेटरी में जो किसी कॉलेज कैंपस से कम नहीं था। सभी कमरों, बरामदों में सफेदी हुई,पेंटिंग हुई और हर प्रकार के कचरे का सही निष्पादन हुआ। और ये सभी कार्य लैब के लोगों ने मिलकर किया। बुजुर्ग अगर हाथ नहीं बटा पाते तो शाबासी देने और समय-समय पर स्नैक्स का इंतजाम करते रहते।

पिछले वर्ष 2016 में, जब मैं एक वर्ष बाद घर लौटा तो साफ़-सफाई का पर्व मनाने लायक मेरा घर तैयार नहीं था। कम-से कम , एक कमरे की पूरी सफेदी, खिड़की-दरवाजों की पेंटिंग और उस कमरे से एक-एक कचरे का तिनका हटाकर सफाई-धुलाई करने में मुझे न तो कोई संकोच हुआ और न थकान। 

Sunday, August 20, 2017

विदेशी तडका - 4 - चेकोस्लोवाकिया के पान कोडल( Mr Kodl of Checkoslovakia !

इंस्ट्रूमेंटल एनालिसिस में विशेष योग्यता के कारण 1970 में मुझे प्रतिष्ठित वैक्यूम स्पेक्ट्रोग्राफ और हाइड्रोजन गैस अनालिजर का कार्यभार सौप दिया गया और साथ ही प्राहा चेकोस्लोवाकिया(Praha, Czechslovakia) से आये विशेषज्ञ पान(श्रीमान) कोडल को मेरे साथ जोड़ दिया गया । श्वेत, छोटे कद के, नीली आँखों वाले 55 वर्षीय कोडल एक सीधे-साधे काम से मतलब रखने वाले पर हंसमुख वैज्ञानिक थे । पर जब कभी कोई उनके पारिवारिक जीवन से सम्बंधित बात करता तो वे उदास हो जाते और उनकी आँखें भींग जाती । उनका तलाक हो चूका था । उनके बेटी चेकोस्लोवाकिया में डॉक्टर थी । बाप-बेटी में बहुत प्यार था । जब भी क्या ,प्रत्येक 15 दिनों पर बेटी का पत्र आता । बाद में पत्राचार में मुझे भी शामिल कर लिया गया । जब कभी गुड मोर्निंग के साथ कोडल मुझे अपने देश की सिगरेट ऑफर करते मै समझ जाता ।
उस समय स्पेशल स्टील को फोर्ज कर विजयंत टैंक के बैरल का निर्माण होता था । स्टील इंगोट की वैक्यूम डीगेसिंग होती थी । उसके बाद स्टील सैंपल में हाइड्रोजन की मात्रा की जाँच होती थी । हाइड्रोजन बबल स्टील इंगोट में ज्यादा रहने पर फोर्जिंग के समय बम की तरह फूट कर इंगोट में बड़ी दरार कर देता था । इसके उपकरण में लगभग 30 किलो मरकरी का व्यवहार कर वैक्यूम पैदा किया जाता था । मरकरी लोहे से दोगुना भारी होने के कारण उसे ताकतवर मोटर पंप से 2 मीटर सीधी खड़ी शीशे की मोटी नली में चढ़ाया-उतारा जाता था ।
एक बार टेस्टिंग के समय मोटर जैम हो गया । पारा और उसमें लिपटी गन्दगी मोटर के भीतरी ओर्फिस में फंस गयी थी । 24 घंटे के अन्दर विश्लेष्ण रिपोर्ट भेजनी होती थी पर कारखाने के इंस्ट्रूमेंट रिपेयर शॉप ने इतनी जल्दी ठीक करने में अपनी असमर्थता जाता दी । कोडल ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, सिगरेट पिलाई और तब तक उनके साथ रिपेयर में हाथ बटाने का आश्वासन लिया जबतक मोटर ठीक नहीं हो जाती और समय पर रिपोर्ट नहीं भेज दी जाती । हमलोगों ने मोटर के एक-एक पुर्जे को खोलकर साफ़ कर , ओइलिंग कर पहले से बेहतर बना दिया । दूसरे दिन सुबह समय पर रिपोर्टिंग कर हमलोग घर और हॉस्टल लौटे ।
उस दिन मैंने कोडल से दो बातें सीखीं, हिम्मत नहीं हारना । दूसरी सबसे अहम् बात यह की किसी भी सामान को रिपेयर में देने के पहले उसे खुद दुरुस्त करने की तबियत रखना ।
यह सीख मेरे जीवन में बहुत काम आयी । घरेलु उपकरणों जैसे सिलाई मशीन, इलेक्ट्रिक गैजेट्स,,छोटी-मोटी प्लम्बिंग, कारपेंटरी और फिटिंग का काम अब रिपेयर पर्सन की बाँट नहीं जोहता ।

कोडल का कार्यकाल दो वर्षों का था । 

विदेशी तड़का -3 - रशियन एक्सपर्ट्स !

१९६६ के अप्रैल माह में हमलोग रांची के हैवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन के विशाल टाउनशिप में रहने गए । कॉलोनी का उत्तरी-पूर्वी कोना रूस और चेकोस्लोवाकिया से आये लगभग 600 एक्सपर्ट्स को आवंटित
किया गया था । ज्यादातर एक्सपर्ट्स अपनी पत्निओं के साथ आये थे, सीनियर को बच्चे लाने की भी अनुमति थी । उस इलाके को रशियन हॉस्टल कहा जाता था जो अब झारखण्ड प्रदेश का विधान सभा और अतिथि आवास बन चुका है । इस भूभाग में स्विमिंग पूल के साथ सभी तरह के खेल और खेलने के मैदान थे । पूरे क्षेत्र के लिए एक टीवी डिश अन्टेना लगा था जिसकी पकड़ पूरे विश्व से थी । एक बड़ा सभागार भी था जिसमें सांस्कृतिक प्रोग्राम और फिल्मों का प्रदर्शन भी होता था । उस समय वहीँ नेहरु जयंती भी मनाई जाती थी । हमलोग उस सभागार में आमंत्रण पर आयोजन देखने जाते थे । मैंने वहां आवारा, अलीबाबा चालीस चोर और Crime and Punishment फिल्मे देखी थीं । यही सभागार आज का झारखण्ड विधान सभा है ।
ये विदेशी ग्रुप या झुण्ड में अपनी पत्नियों के साथ शाम के समय घूमने निकलते थे । उसी समय बाजार से खरीदारी भी करते थे । दूकानदार भी काम लायक विदेशी भाष बोलने लगे थे उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए । शनिवार और रविवार जैसे साप्ताहिक अवकाश के दिनों ये लोग सुबह से रात होने तक बाजार, सडको, पर्यटक स्थलों पर मस्ती करते दीखते थे । भारतियों से इनका व्यवहार बहुत ही मधुर था । हमेशा मुस्कुराना, जानने की उत्सुकता और दोस्ती बढ़ने के लिए एक्टिंग के साथ आवारा और श्री 420 के गाने गाना इनकी फितरत थी । नजदीकी को अमली जामा पहनाने के लिए अपने कैमरों से फोटो लेना इन्हें बहुत रास आता था । लेकिन तभी एक हादसे के बाद इनमें एक सहमाहट आ गयी, संबंधों में ठंडापन दिखने लगा ।
22 अगस्त 1968 को रांची में भारतवर्ष का बहुत बड़ा दंगा हुआ । सैकड़ों की जाने गयी । हमेशा की तरह अल्पसंख्यकों ने अप्रत्याशित तरीके से शुरुआत करके की । चुकी HEC हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र था इसलिए सीमावर्ती क्षेत्रों में यादवों ने कसकर बदला लिया । ये एक्सपर्ट्स कुछ घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी थे ।
1969 में HEC ज्वाइन करने के कोई छह महीने लगे इन विशेषज्ञों से इतनी जान-पहचान बढाने में की हमलोग अब दिल खोल कर बात करने लगे । एक दिन उन्होंने 1968 के दंगों का अनुभव बताया जो किसी को भी क्षुब्ध और चकित कर देता ।

उन्होंने बताया की पिछली सदी में विश्व में उनके रूस के कुछ इलाकों और जातियों को बारबैरियन (बर्बर, खूंखार और जंगली) कहा जाता था । वे अपने दुश्मन का होशोहवास में खाल छील कर उतार लेते थे । पूरे समय दुश्मन इसके लिए मानसिक रूप से तैयार रहता था । अगर इसके बाद भी उसकी मौत नहीं होती थी तो उसका गला काट दिया जाता था । पर उनलोगों ने दंगो के शुरूआती दिनों में सुबह की सैर के समय जो कुछ देखा वह उससे भी भयानक था । नाले के अन्दर छुपे परिवार को पहले दंगाई दुलार- पुचकार कर बाहर निकालते थे और उसके बाद छोटे-छोटे चाक़ू से गोंद-गोंद कर मार डालते थे । एक चार वर्ष के बच्चे को तो उन्होंने पैर पकड़ कर घुमाया और दीवार पर दे मारा । एक आदमी को दौडाते-दौड़ाते पानी से लबालब भरे कूएँ में गिर जाने दिया और जब भी उसका सर ऊपर आता उसे लाठी से पीटकर फिर पानी के अन्दर डूब जाने देते । यह खेल 15 मिनट तक चलता रहा ।  हमलोगों के सर पर जब खून चढ़ता है तो सीधे गोली मार देते हैं । इस सदी में भी ऐसा कुछ होता होगा विश्वास नहीं होता । आपलोग तो हिन्दू हो बुद्ध, महावीर , महांत्मा गाँधी के देश के !

1970 के दशक में एक्सपर्ट्स की संख्या कम होती गयी  । 1980 के दशक में आवश्यक तकनीकी क्षेत्रो में ही उन्हें आमंत्रित किया जाता ।